कोरोना से राहत और बेचैनी...
   Date08-Sep-2020

vishesh lekh_1  
वैश्विक महामारी कोरोना के कारण जिस तरह की स्थितियां सामने आ रही हैं, उससे इस महामारी को लेकर दो तरफा नजरिया या कहें कि आमजन में मानस बनता जा रहा है... कोरोना को हराने के लिए जो तैयारियां केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक ने निर्बाध रूप से लागू कर रखी है, उससे राहत की उम्मीद बंधी है... यही कि कैसे भी कोरोना को हराने में हम सफल होंगे... लेकिन जो संक्रमितों के मामले लगातार कम से कम प्रतिदिन 10 हजार बढ़ते जा रहे हैं, वह सामान्यजन में बेचैनी भी पैदा करता है... क्योंकि देशभर में जो कोरोना के गंभीर संक्रमितों के लिए उपयोग में लाए जाने वाले वेंटिलेटर की चर्चा होती है तो वह अभी भी हमारे पास अपर्याप्त हैं.. ऐसे में इंदौर में जो ताजा आंकड़े सामने आ रहे हैं कि निजी क्या, सरकारी अस्पतालों तक में अब जगह उपलब्ध नहीं है... फिर उनके लिए वेंटिलेटर की व्यवस्था तो एक अलग ही विषय है... ये कुछ ऐसी बातें हैं, जो कोरोना से लड़ाई लडऩे के बीच बेचैनी बढ़ाने का कारण भी बन रही है... विचार कीजिए कि जब 24 घंटे में देश में 90 हजार से अधिक नए मामले सामने आ रहे हैं तो आने वाले समय में यह स्थिति किस भयावह दृश्य का संकेत कर रही है... इंदौर में 4000 से अधिक सक्रिय मामले हैं... 14 हजार लोग इस कोरोना महामारी की गिरफ्त में आ चुके हैं... और सवा चार सौ से अधिक लोगों की मौत भी हो चुकी है... ऐसे में सितम्बर अंत और अक्टूबर के प्रारंभ में इंदौर में कोरोना वायरस की स्थिति का आंकलन विशेषज्ञ चिंताजनक आंकड़ों के रूप में करते आ रहे हैं... क्योंकि उस मान से हमारी तैयारी अभी भी अपर्याप्त हैं... और इससे भी बड़ी समस्या यह है कि लापरवाही दिनोंदिन शहर में तेजी से पैर पसार रही है... बाजार खुलने या किसी भी तरह की तालाबंदी को खोलने के पीछे शासन-प्रशासन की मंशा यह है कि लोगों को रोजगार, व्यवसाय करने का अवसर उपलब्ध करवाया जाए... लेकिन सड़कों पर बिना मास्क के दोपहिया वाहनों पर तीन-तीन लोगों का घूमना, चाट-चौपाटी की दुकानों पर हुजूम उमडऩा और रविवार को तालाबंदी नहीं, ऐसा विचार करके बाजार की तरफ भीड़ का सैलाब उमडऩा कोरोना के मामले में आ बैल मुझे मार की स्थिति का खुला संकेत है... राहत के रूप में यह तथ्य देखा जा रहा है कि कोरोना नमूनों की जांच का आंकड़ा पौने पांच करोड़ हो चुका है... यानी कोरोना के मामले ज्यादा अब इसलिए आ रहे हैं, क्योंकि जांच का दायरा बढ़ गया है... लेकिन इसे सकारात्मक दृष्टि से देखने के बजाय उस रोग की खतरे की घंटी के रूप में देखना चाहिए और बिना मास्क, दो गज की दूरी का हर स्थिति में शासन-प्रशासन को पालन करवाना चाहिए...
दृष्टिकोण
उपचुनाव की हलचल और मुद्दे...
मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार के भविष्य को तय करने वाले विधानसभा उपचुनाव की हलचल बढऩे लगी है... क्योंकि कोरोना के कारण जो स्थितियां इन चुनाव में रुकावट बन रही थी, उसने अब इस बात के संकेत दे दिए हैं कि चुनाव जल्द होंगे.., लेकिन यह चुनाव बिहार विधानसभा चुनाव के साथ होंगे या इसके पूर्व, इसको लेकर अभी भी असमंजस बना हुआ है... लेकिन जो भी हो, अक्टूबर अंत तक यह तय हो जाएगा कि उपचुनाव के नतीजों ने क्या गुल खिलाया...मध्यप्रदेश में कमल नाथ सरकार का पतन फरवरी में हुआ था... इसके बाद से नई सरकार के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने मुखिया के नाते लगातार कोरोना से निपटने में अपनी सारी ताकत झोंकी... कोरोना का ऐसा असर रहा कि लंबे समय तक तो मुख्यमंत्री को अकेले फिर कुछ गिने हुए मंत्रियों के साथ काम करना पड़ा... लंबे अंतराल के बाद मंत्रिमंडल का पूर्ण तरह से गठन तो हो गया, लेकिन कोरोना के साथ जो समस्याएं किसानों से जुड़ी हुई, व्यापारियों से जुड़ी है और रोज कमाने-खाने वाले संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, श्रमिकों से जुड़ी है, इन सभी को लेकर सरकार को अनेक तरह के सवालों के घेरे से बार-बार दो-चार होना पड़ रहा है... इसमें कोई दो राय नहीं है कि मध्यप्रदेश विधानसभा उपचुनाव में कोरोना से अधिक किसानों का मुद्दा रहेगा, क्योंकि लंबे समय बाद सोयाबीन व अन्य दलहन-तिलहन फसलों की स्थिति बहुत बेहतरीन थी, लेकिन अचानक प्राकृतिक आपदा या कहें बारिश की खेंच और भारी बारिश के कारण जो सोयाबीन फसल चौपट हुई है, उसने किसानों को आक्रोशित कर रखा है... सरकार 2019 के फसल बीमा को जल्द से जल्द किसानों के खाते में डालकर उनकी समस्या का समाधान करना चाहती है, साथ ही वर्तमान फसल के नुकसान का सर्वे कार्य भी शुरू हो चुका है... कुल मिलाकर इस बार के उपचुनाव में किसानों की समस्याओं और उनके समाधान को लेकर चुनावी मुद्दा बनना तय है...