दायित्व बोध
   Date08-Sep-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
बो धिसत्व एक दिन सुंदर कमल के तालाब के पास बैठे वायुसेवन कर रहे थे। नवविकसित पंकजों की मनोहारी छटा ने उन्हें अत्यधिक आकर्षित किया तो वे चुप बैठे न रह सके, उठे और सरोवर में उतरकर निकट से जलज गंध का पान कर तृप्ति लाभ करने लगे। तभी किसी देवकन्या का स्वर सुनाई पड़ा- 'तुम बिना कुछ दिए ही इन पुष्पों की सुरभि का सेवन कर रहे हो। यह चोरकर्म है। तुम गंधचोर हो।Ó तथागत उसकी बात सुनकर स्तंभित रह गए। तभी एक व्यक्ति आया और सरोवर में घुसकर निर्दयतापूर्वक कमल पुष्प तोडऩे लगा, पर रोकना तो दूर, किसी ने उसे मना तक भी न किया। तब बुद्ध देव ने उस कन्या से कहा- 'देवी! मैंने तो केवल गंधपान ही किया था। पुष्पों का अपहरण तो नहीं किया था, तोड़े भी नहीं, फिर भी तुमने मुझे चोर कहा और यह मनुष्य कितनी निर्दयता के साथ पुष्पों को तोड़ रहा है। तुम इसे कुछ नहीं कहतीं?Ó तब वह देव कन्या कहने लगी- 'तपस्वी! लोभ तथा तृष्णाओं में डूबे संसारी मनुष्य, धर्म तथा अधर्म में भेद नहीं कर पाते। अत: उन पर धर्मरक्षा का भार नहीं है, किन्तु जो धर्मरत है, सत-असत के ज्ञाता हैं, उनका तनिक-सा पथभ्रष्ट होना एक बड़ा पातक बन जाता है। बोधिसत्व ने मर्म का समझ लिया और उनका सिर पश्चाताप से झुक गया।Ó