सेवा, सदाचार और समर्पण का अद्भुत साम्य श्यामजी खरे
   Date08-Sep-2020
 
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रमेश गुप्ता
यूं तो उनका नाम था रामकृष्ण सदाशिव खरे, परंतु संघ क्षेत्र में वे श्याम खरे के नाम से ही जाने जाते थे। शनिवार, 5 सितम्बर को उनका देहावसान हो गया।
श्री श्याम खरेजी से मेरा परिचय सन् 1973 में हुआ था। जब मैं मुंबई से जॉब छोड़कर इंदौर स्वयं का व्यवसाय प्रारंभ करने आना चाहता था। मुझे अर्चना से उनका पता लगा। अत: मिलने हेतु उनके निवासी जूना तुकोगंज में गया। वे मिलने पर प्रसन्न हुए और कहा-सोचना क्या? बस आ जाओ इंदौर। यहां क्वालिफाइड इंजीनियर्स गिने-चुने ही हैं। अत: अच्छा स्कोप है।
उनका यह परामर्श मेरे लिए मार्गदर्शन बन गया। और मैं भी मुंबई से अपना जॉब छोड़कर इंदौर आ गया। वे मुझे सतत इंदौर के तौर-तरीके पर मार्गदर्शन करते रहे और मैं आगे बढ़ता रहा।
सन् 1975 में आपातकाल लगने पर श्री खरेजी, श्री सुरेशजी लोखंडे आदि कार्यकर्ताओं के साथ 11 अगस्त की मध्यरात्रि को मैं भी गिरफ्तार कर लिया गया और हम सभी को सेंट्रल जेल में निरुद्ध कर दिया गया।
हम लोगों ने साथ-साथ सेंट्रल जेल व जिला जेल में 19 महीने मस्ती के साथ गुजारे। श्री खरेजी मस्तमौला तबियत के व्यक्ति थे। वे सदैव हँसते-हँसाते रहते थे। ये 19 महीने ऐसे मस्त साथियों के कारण कैसे व्यतीत हो गए, पता ही नहीं चला।
श्री खरेजी धुन के पक्के थे। उन्होंने जेल मं रहते गीता पाठ मुखाग्र करना शुरू कर दिया। सबेरे प्रात: क्रिया योग व्यायाम के पश्चात उनका यह स्वाध्याय प्रारंभ हो जाता था। जेल की एक दीवार से दूसरी दीवार तक चलते जाना और पाठ करते जाना। बस! अकेले अपनी धुन में मस्त। वे कहा करते थे कि जीवन की आपाधानी में गीता पाठ संभव नहीं हो पाता था, परंतु यहां तो समय ही समय है, अत: आनंद से हो पा रहा है। और यह मेरे जीवन की अनुपम उपलब्धि है। जेल से छूटने के पश्चात प्रतिदिन यह पाठ करना उनके जीवन का क्रम बन गया था। गीता पाठ भी 1 या 2 अध्याय नहीं, संपूर्ण 18 अध्याय उनको मुखाग्र थे।
श्री खरेजी ने इंजीनियरिंग करने के पश्चात अपना जीवन नगर निगम की नौकरी से प्रारंभ किया था। कुछ वर्षों उपरांत उन्होंने नौकरी छोड़कर अपनी प्रायवेट प्रेक्टिस प्रारंभ कर दी थी। वे एक सफल इंजीनियर थे। उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ कॉलोनाइजिंग भी किया तथा अन्नपूर्णा रोड पर भवानीपुर तथा वैशाली नामक कॉलोनियां भी विकसित की, जो मध्यमवर्गीय लोगों के लिए वरदान सिद्ध हुई।
श्री खरेजी बड़े उद्योगशील होकर नवाचार के सतत प्रयोग करते रहते थे। सन् 1974-75 में उन्होंने प्रीकास्ट कांक्रीट के ब्लाक्स बनाने की फैक्ट्री डाली थी, जो तत्समय इंदौर में एक नया ही प्रयोग था। आपातकाल में जेल में रहने से उनका यह नया उद्योग तहस-नहस हो गया था। जेल में वे कहा करते थे कि सत्यानाश हो अथवा सवा सत्यानाश, कोई फर्क नहीं पड़ता है। इस प्रकार जेल में उन्होंने इसकी रंचमात्र भी परवाह नहीं की और मस्ती से जेल जीवन व्यतीत किया।
संघ क्षेत्र में वे रामबाग शाखा के नियमित स्वयंसेवक थे। संगीत में रुचि होने से कार्यक्रमों में अपने मधुर कंठ से संघगीत गाया करते थे। जेल में भी हमने उनके साथ अनेक गीत गुनगुनाये थे।
1977 में जेल से छूटने के पश्चात उन्होंने अपनी प्रेक्टिस छोड़ दी थी और संपूर्ण रूप से अपने को 'वनवासी कल्याण परिषदÓ के कर्य में झोंक दिया था। वनवासी छात्रों हेतु होस्टल्स, विद्यालय तथा अनेक चिकित्सालयों का निर्माण कराया था। उज्जैन का संघ कार्यालय तथा अनेक शिशु मंदिरों का निर्माण उनके मार्गदर्शन में हुआ था।
'वनवासी कल्याण परिषदÓ के तो वे पूर्ण सेवावृत्ति बन गए थे। जशपुर तथा डांग (गुजरात) में वर्षों तक कार्य करते रहे। डांग में स्वामी असीमानंद के साथ उन्होंने अनेक गतिविधियां संचालित की। इंदौर में मिलने पर वे वन्य जीवन के अपने अनुभव सुनाया करते थे।
एक समय था, जब श्री मधुकररावजी चितले, श्री शशिकांतजी शेन्दुर्शीकर व श्री श्यामजी खरे की त्रिपुटी वनवासी कल्याण परिषद में विभिन्न दायित्व निभाकर सक्रियता से कार्य करती रही। उन्हीं दिनों इंदौर से 'वनपुत्रÓ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। श्री चितलेजी ने आर्थिक पक्ष सम्हाला तो श्री शशिकांतजी ने सम्पादन तथा उसमें श्री खरेजी के प्रवास तथा परिषद की गतिविधियों पर आलेख प्रकाशित होते थे।
श्री श्यामजी खरे सेवाभावी, कुशल इंजीनियर तो थे ही, वे बड़े कलावंत भी थे। संगीत में उनकी रुचि थी और उन्होंने संगीत में एम.ए. की डिग्री भी प्राप्त की थी। कुशल गायक के साथ-साथ वे अच्छे लेखक भी थे। हिन्दी व मराठी में उन्होंने अनेक लेख लिखे थे। उनके हिन्दी व मराठी में हायकू भी प्रकाशित हुए हैं। उनकी एक पुस्तक 'अंधेरे के पारÓ हिन्दी कविता संग्रह है, जिसकी सराहना श्री सूर्यकांतजी नागर तथा प्रसिद्ध कवि श्री सदाशिव कौतुक ने भी की है।
गत् 18 अप्रैल 2019 में उनके निवास पर भेंट करने गया था, तब उन्होंने अपनी यह पुस्तक मुझे भेंट की थी। जो मेरे संग्रह का अविस्मरणीय अंग बन गई है। पश्चात वे अपने पुत्र के साथ थाणे (महाराष्ट्र) में रहने चले गए थे, परंतु हमारी उनसे दूरभाष पर साहित्य चर्चा चलती रहती थी। स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के पश्चात भी वे आग्रह करके 'जहाज को पंछी फिरी जहाज पर आवेÓ के अनुसार कुछ माह पूर्व पुन: इंदौर आ गए थे। परन्तु कोरोना के कारण वे सम्पूर्ण रूप से अलग-थलग पड़ गए थे। न कोई आने वाला और न कहीं जा सकते थे। हम सभी मित्रगण भी अपने-अपने घरों में दुबक गए थे। उनका स्वास्थ्य सतत बिगड़ता गया और वे कमजोर पड़ते गए। उनकी आयु 86 वर्ष की हो चुकी थी, परंतु मनोबल बहुत बढ़ा हुआ था।
गत् शनिवार 5 सितम्बर को इस मूक सेवावृत्ति ने अपने प्राण विसर्जन कर दिए और छोड़ गए एक अनंत असीम सेवापथ।
श्यामजी आप अपने मित्रों में, संघ स्वयंसेवकों में और वनवासी बंधुओं में सतत स्मरण किए जाते रहोगे।
ऊँ शांति शांति शांति :।
भारत माँ
हाड़-मास की यह काया
तेरे अन्न से पुष्ट हुई
मेरा इस पर अधिकार कहां?
इस काया का दीप बना लूं
जलाकर निज लहू से बाती
तेरा मंदिर दमक उठे माँ
यह है मेरी अभिलाषा।
माँ तेरे चरणों की धूली
लेने मैं बार-बार आऊंगा
नहीं चाहता प्रभु के दर्शन
जन्म-मरण का है जो फेरा
मेरे लिए वरदान बनेगा।
बनकर तेरी सेवा का साधन
मेरी कर दो चंदन काया
गुणों की सुगंध से भर दो
वाणी में विद्या का घर हो
आंखों में पवित्रता की ज्योति
बुद्धि पर दो संयम का अंकुश
सुरभित फूलों-सा मन हो
जीवन ऐसा हो तुझे समर्पित।
- श्याम खरे
(अंधेरे के पार से साभार)