चरित्र और नैतिकता लीलती टकसाली पत्रकारिता
   Date05-Sep-2020

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ञ्च प्रभुनाथ शुक्ल
पत्रकारिता के आगे एक हांसिया खड़ा है ? वह हांसिया उसे कठघरे में खड़ा करता है। पत्रकारिता खुद न्याय की मांग कर रही है। उसकी आजादी और निष्पक्षता प्रभावित हो रही है। वह कराहती, टूटती और बिखरती नजर आती है। उसकी नैतिकता और निष्पक्षता कायम रहे, इसका इलाज वह स्वयं खोजती दिखती है। उसे किस अदालत के सामने दस्तक देनी होगी? उसे कौन न्याय दिलाएगा और वह न्याय क्यों चाहती है ? कौन से ऐसे लोग हैं, जो उसका गला दबना चाहते हैं। पत्रकारिता और पत्रकारों पर अंगुली क्यों उठ रही है। पत्रकार क्या अपने नैतिक धर्म से विमुख हो गए हैं जैसे तमाम सवाल उसे डराते और कचोटते हैं।
हिंदी पत्रकारिता बेहद सबल हुई है। उसकी व्यापकता और स्वीकारता बढ़ी है। पत्रकारिता ने जटिल चुनौतियों को पार किया है। वह तकनीकी रूप से बेहद संवृद्ध और आधुनिक हुई है। पत्रकारिता की गतिमानता, व्यापकता बढ़ी है, लेकिन उसका चरित्र और नैतिकता गिरी है। अब आम के बीच वह खास की बात करती है। वर्चुअल मीडिया ने मूल पत्रकारिता की दुश्वारियां बढ़ा दी हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आगे निकलने की होड़ ने खबरों की गुणवत्ता को निगला है। अब खबरें आम की नहीं, खास की होती हैं। उनके मुद्दे और सरोकार खास के हो गए हैं। अब वह विषेश वर्ग के लिए काम करती है। आज के दौर में इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रिंट के मुकाबले अधिक प्रभावशाली दिखती है। कोरोना संक्रमणकाल ने इस स्थिति को और अधिक बदला है। प्रिंट अब डिजिटल अधिक हो गई है। पूरा का पूरा अखबार पीडीएफ में उपलब्ध है। नंदन और कादम्बिनी जैसी स्तरीय पत्रिकाओं को बंद होना पड़ा है। देश के एक अग्रणी समूह अखबार को टीवी में खुद को पढऩे के लिए विज्ञापन देना पड़ रहा है। कितनी तेजी से वक्त बदल रहा है, जो दूसरों को विज्ञापित करते रहे, वह खुद विज्ञापित हो रहे हैं, क्योंकि अब जहां अखबार नहीं पहुंचते हैं, वहां टीवी उपलब्ध है। आधुनिक मोबाइल की उपलब्धता ने इसकी पहुंच और आसान बना दी है। हिंदी पत्रकारिता में जनपक्ष गायब है। आम आदमी कहीं नहीं दिखता है। उसकी समस्याएं किसी डिबेट का हिस्सा नहीं बनती हैं। पत्रकारिता में सनसनी परोसने का ट्रेंड चल पड़ा है। मीडिया संस्थान सत्ता की खुशामद जरूरत से अधिक करने लगे हैं, जबकि आम आदमी की समस्याएं सिरे से खारिज कर दी गई हैं। टीवी और अखबार में कौन-सी खबर चलनी और छपनी है, उसका एजेंडा तय है। टीवी पत्रकारिता की हालत बुरी है। प्रिंट फिर भी विश्वास के करीब है। पत्रकारिता व्यापार हो गई है। मालिक ने करोड़ों खर्च किया है। संस्थान में काम करने वालों को वह तनख्वाह कहां से देगा। फिर तो उसे समझौता करना ही पड़ेगा। फिर वह जनपक्ष की बात क्यों करेगा, क्योंकि कोई भी सत्ता और सरकार जनकसौटी पर खरी नहीं उतर सकती है। पत्रकारिता में दाल- भांत की नहीं, बिरयानी की बात की जाती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जिस तरह अंगुलियां उठी हैं, वह सवाल खड़े करती है। टीवी चैनलों की आपसी होड़ खुलकर सामने दिखती है। पत्रकारों और पत्रकारिता को सोशल मीडिया में किस तरह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की नामचीन हस्तियों को लोग गालिया दे रहे हैं। टीवी एंकर्स को ट्रॉल किया जा रहा है। जनमानस में घटिया पत्रकारिता को लेकर घृणा है। टीवी एंकर्स पर असंसदीय टिप्पणी की जा रही है। फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह की करीबी रिया के एक साक्षात्कार को लेकर पत्रकारिता की साख और गिर गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी उस घटना की जांच कर रही हो, फिर उस साक्षात्कार की क्या ज़रूरत थी? टेलीविजन पर टीआरपी लेने के लिए स्तरहीन डिबेट का हाल किसी से छुपा नहीं है। इस तरह कि डिबेट जिससे किसी आम आदमी का कोई सरोकार नहीं है। टीवी पर कुछ निर्धारित एजेंडागत खबरें दिखाई जाती हैं। आजकल रात-दिन रिया और सुशांत छाए हैं। देश में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। मौत की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसके बाद भी अनलॉक जारी है। बुजुर्गों के अलावा अब युवा भी इस खतरनाक वायरस की चपेट में आ रहे हैं। निजी अस्पताल जिसके पास पैसा नहीं है, उसे भर्ती तक नहीं कर रहे हैं। देश की विकास दर 40 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी है। विकास दर ऋणात्मक में चली गई है, लेकिन इस पर कोई डिबेट नहीं हो रही है। बेगारी निम्न स्तर पर पहुंच चुकी है। लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हो चुके हैं। सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है। इस तरह के फैसलों पर अर्थव्यवस्था और रोजगार पर क्या प्रतिकूल और अनुकूल प्रभाव पड़ेगा, इस पर चुप्पी है। तालाबंदी में किसान और आम आदमी कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। किसानों को बाजार उपलब्ध नहीं हो रहा है। खेती में लागत घाटा बढ़ रहा है। यूरिया की किल्लत को लेकर किसान परेशान हैं। बाढ़ से तबाही मची है। तकनीकी शिक्षा में भी लोग बेगार हैं। इस हालात में हम आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, लेकिन देश का युवा किस तरह आत्मनिर्भर बनेगा, इस पर कोई बहस नहीं है। पत्रकारिता अपनी खुद की जिम्मेदारी संभालने के बजाय दूसरों की जवाबदेही तय करना चाहती है, लेकिन वह खुद अपनी पटरी से कितना नीचे उतर चुकी है, इसका उसे खुद अंदाजा नहीं है। मीडिया न्यायी की भूमिका में है। वह बेतुकी बहसों से यह साबित करना चाहती है कि वह जो कहती और करती है, वह सच है। पत्रकारिता सनसनी बन गई है। वह दक्षिण और वामपंथ में विभाजित हो चुकी है। वह हिंदू-मुस्लिम में बंट चुकी है। वह देश की बात कम, दल की बात अधिक करती है। वह आम की कम, खास की अधिक बात करती है। वह सत्ता के बजाय विपक्ष को घेरती है। पढ़े- लिखे लोगों के बीच मीडिया विभाजित हो चुकी है। कौन-सा टीवी चैनल और अखबार किस दल का हिमायत करता है, लोग बड़े साफगोई से इस सवाल का जवाब दे सकते हैं। जिनकी बात मीडिया में मुद्दा नहीं बनती, वह टीवी और अखबार देखते भी नहीं हैं। इस तरह का तबका असुविधा को ही जीवन की दिनचर्या बना लिया है। उससे कोई मतलब नहीं है कि कौन-सा अखबार और टीवी उसकी बात को वरीयता देता है या नहीं। आजकल टीवी पत्रकारिता में चिल्लाने का नया दौर चला है। हम चिल्लाने से सच नहीं छुपा सकते हैं। हम चिल्लाकर देश की समस्या का समाधान नहीं कर सकते हैं। हम चिल्लाकर खबरों की कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते हैं। मीडिया में एक कहावत है कि खबरें बोलती हैं। प्रबुद्ध पाठक और दर्शक सबकुछ समझता है। उसे चिल्लाना पसंद नहीं हैं। रिमोट उसके हाथ में, उसे वह बदल सकता है। लोग खबरों के भूखे हैं, लेकिन भड़ास और भाटगिरी उन्हें पसंद नहीं। वक्त तेजी से बदल रहा है। पत्रकारिता की लम्बरदारी करने वालों के दिन लदने वाले हैं। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का नया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है। अब पत्रकारिता वर्चुअल मीडिया के पीछे भागती दिखती है। आम आदमी अपनी बात खुले मन से वहां करता है और लाखों तक पहुंचाता है। पत्रकारिता जनविश्वास की कसौटी और आम आदमी के सरोकार से दूर भागती दिखती है। यही वजह है कि पत्रकार और पत्रकारिता जो कभी आम आदमी के अधिकार की बात करती थी, आज खुद बहस का मसला बनती दिखती है। अब वक्त आ गया है, जब पत्रकारिता और पत्रकारों को अपना विश्वास लौटाना होगा। मीडिया संस्थानों ने अगर इस पर गौर नहीं किया तो भीड़ में उनका टिकना मुश्किल होगा। लोग उसी पर भरोसा करेंगे, जो उनकी कसौटी पर खरा उतरेगा।