राष्ट्रीय एकजुटता का अखंड सूत्र है हिन्दी...
   Date13-Sep-2020

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
ध र्म, भाषा, शिक्षा, संस्कृति और संस्कार किसी भी राष्ट्र के पल्लवन और उत्कर्ष तक पहुंचने का मुख्य आधार है... हिन्दी भाषा में राष्ट्र की एकजुटता का स्थायी भाव समाहित है, जो निरंतर वृहद होता जा रहा है... आजादी के बाद भारत में मैकाले शिक्षा पद्धति लागू रखने का दुष्परिणाम यही रहा कि हमारे यहां अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता ही चला गया... यहां तक तो ठीक था.., लेकिन अंग्रेजियत झाडऩे की परिपाटी या कहें कि अंधहोड़ ने हिन्दी के साथ सबसे ज्यादा खिलवाड़ किया है... अत: भाषा के साथ किसी भी तरह की ज्यादती अक्षम्य अपराध है... हिन्दी ही वह एकमात्र-सर्वमान्य भाषा है, जो हर तरह की भाषाओं को अपने में समाहित करके भी अपने वास्तविक मूल स्वरूप को विद्यमान रखने में सफल रही है... आज हिंगलिशपूरित हिन्दी भी अपनी विशिष्टता को कहीं न कहीं निरंतर प्रकट कर ही देती है... इसलिए हिन्दी को वर्ष में एक बार 14 सितंबर को अथवा पखवाड़े के रूप में याद करने, विस्तार देने की चिंता तो एक जरिया है, हिन्दी तो वर्षभर और 365 दिन 24 घंटे भारतीय जन-जन के दिलो-दिमाग पर विराजमान रहती है...
घरों से लेकर अखबारों तक में भले ही अंग्रेजी मिश्रित संवाद-लेखन का दायरा या कहें चलन निरंतर बढ़ रहा हो, लेकिन हिन्दी के बिना वह भी अधूरा है... अगर कोई यह कहता है कि 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधीÓ की भांति हिन्दी भी मजबूरी की भाषा है या हिन्दी अन्य भाषाओं के कारण घर में ही दासी बनती जा रही है... अथवा हिन्दी का अस्तित्व खतरे में है... वे सभी यह भूल जाते हैं कि दुनिया की हर भाषा का जन्म ही कहीं न कहीं देवभाषा संस्कृत अथवा हिन्दी से ही हुआ है... अत: जन्मदाता या फिर जन्मदात्री का अस्तित्व कभी भी गौण नहीं हो सकता... उस दौर में तो बिल्कुल भी नहीं, जब हिन्दी को नए भारत में नए तरीके से संपर्क-संवाद, विकास-रोजगार, प्रचार-प्रसार यहां तक कि आर्थिक लाभ-हानि का गणित लगाकर तेजी से प्रयोग में लाया जा रहा है... यानी हिन्दी का अपभ्रंस रूप में ही सही यानी हिन्दी आज अंग्रेजी-उर्दू-संस्कृत एवं अन्य बोलचाल में उपयोग होने वाली बोलियों, प्रांतीय भाषाओं के सममिश्रण रूप में ही सही, लेकिन हिन्दी के बिना आज कोई भी एक कदम आगे नहीं बढ़ा सकता... अत: हिन्दी का भविष्य आगे भी उज्जवल है, समृद्ध है... भारत में बड़ी ही प्रचलित कहावत है, कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। ऐसे में हिन्दी की समृद्धि भारत की प्रांतीय भाषाओं और बोलियों पर भी निर्भर है... क्योंकि सन् 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं बोली जाती हैं... उनमें से अब कितनी विलुप्त हुईं, कितनी बची हैं, यह चिंता का विषय होना चाहिए..?
ग्रामीण भारत में आज भी बोलियों का ही बोलबाला है... लेकिन शहरी भारत में घरों से लेकर रोजगार तक में मुख्य भूमिका हिन्दी की है... क्योंकि घर में मातृभाषा में होने वाली चर्चा-संवाद में भी हिन्दी शामिल रहती ही है... इससे बढ़कर यह भी हिन्दी का सबल पक्ष है कि शहरी भारत में असंख्य लोग जो कि हिन्दी को ही बोलते-लिखते-पढ़ते हैं... उन्हें इसी राष्ट्रभाषा के जरिये रोजगार की प्राप्ति हो रही है... तकनीक की दृष्टि से देखे तो हिन्दी ने अंग्रेजी, जापानी, फ्रेंच व चीनी भाषा से इतर तेजी से अपनी भूमिका को प्रभावी किया है... हर तरह की तकनीकी सफलता और निर्माण-संधान में हिन्दी का हस्तक्षेप या कहे कि सर्वस्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है... इसलिए यह हिन्दी के पक्ष में ही जाता है कि वह घर से लेकर रोजगार और तकनीक को मजबूती देने के द्वार निरंतर खोल रही है... आर्थिक पक्ष पर चर्चा करें तो आज भी देशभर में टीवी, रेडियो, समाचार-पत्रों में दिखाए जाने वाले, प्रकाशित किए जाने वाले या फिर सुनाए जाने वाले विज्ञापनों में भी हिन्दी का ही वर्चस्व स्थापित रूप से नजर आता है... कितने ही होर्डिंग्स, बैनर पर नजर दौड़ाएं तो महंगे, मल्टीनेशन कंपनी के विदेशी ब्रांड की भी मार्केटिंग या बाजार प्रतिस्पर्धा हिन्दी के जरिये ही की जा रही है... यह हिन्दी की ताकत नहीं तो और क्या है... फिल्मों, सीरियलों में भी भले ही अंग्रेजी का दखल बढऩे लगा है, लेकिन इनके प्रचार-प्रसार और लोकप्रियता का आधार भी हिन्दी ही है... हमने देखा है कि दक्षिण भारत में बनने वाली फिल्म का जब तक हिन्दी रूपांतरण नहीं आता, तब तक वह चर्चित नहीं होती... सोशल मीडिया के जरिये तकनीकी संवाद की पहल हो, फिर चाहे वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम से लगाकर वे सभी संचार व संपर्क के माध्यम जो कि भले ही विदेशों द्वारा संचालित हो, लेकिन उनका भी काम बिना हिन्दी के नहीं चलता... धार्मिक, सांस्कृतिक गतिविधियोंं, श्रीराम कथा, भागवत गीता भी हिन्दी के जरिये ही लोकप्रियता के चरम पर हैं... साहित्य लेखन और उसकी समृद्धि, किताबें, कवि सम्मेलन, नाटक, सेमिनार से लेकर अब वेबिनार तक सब जगह हिन्दी के बिना कोई आगे नहीं बढ़ पाया...
हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए सरकार की अग्रणी भूमिका रही है और होना भी चाहिए... इस दिशा में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के जरिये केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने हिन्दी को व्यापक रूप से बढ़ावा देने की भूमिका तैयार कर दी है... इसके जरिये प्रांतीय भाषाओं, क्षेत्रीय बोलियों का विकास भी होगा, लेखन, साहित्य में रुचि बढ़ेगी और नया सृजन भी होगा... यानी नई शिक्षा नीति अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व को ध्वस्त करने की राह दिखा रही है... 1964 में गठित कोठारी शिक्षा आयोग ने तब नैतिक शिक्षा पर बल दिया था... अगर उस समय पूर्ण रूप से वह लागू होता तो आज हिन्दी भाषा ही नहीं, देश की दशा-दिशा भी कुछ और होती... नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर तक मातृभाषा में अध्ययन की अनिवार्यता का लाभ यह होगा कि अन्य प्रांतीय भाषाओं को भी मजबूती मिलेगी... क्योंकि इस नई नीति में संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल भाषाओं के लिए अलग-अलग आयोगों के गठन से सभी भारतीय भाषाओं के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया प्रारंभ होगी... यानी भारतीय भाषाओं के जरिये एक बेहतर सहज-साहचर्य स्थापित होगा... यह शिक्षा नीति संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना का संकेत भी करती है... यानी संस्कृति की ताकत संस्कृत एवं हिन्दी ही है... अगर अधिक से अधिक विधाओं के संस्थानों को जोड़कर संस्कृत शाों में उपलब्ध ज्ञान के भंडार को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बनकर क्षेत्रीय बोलियों, प्रांतीय भाषाओं का संयुक्त मिलन हिन्दी की समृद्धि का और मजबूत आधार बन सकता है... अत: इसमें समाज के प्रत्येक अंग की आवश्यकता है...
जब देश में कर एकीकरण का श्रीगणेश करते हुए 'एक देश-एक करÓ व्यवस्था आमजन द्वारा स्वीकार व सफल हो चुकी है, सरकारी योजनाओं में सामान्यजन की भागीदारी बढ़ाने, तुरंत सहायता उपलब्ध कराने के लिए 'एक देश-एक राशन कार्डÓ को अमलीजामा पहनाया जा चुका है... यही नहीं, देश में राष्ट्रीय एकता व अखंडता को बढ़ावा देने के लिए 'एक देश-एक प्रधान-एक निशान-एक संविधानÓ का अभियान छेड़कर बेजा प्रावधानों (अनुच्छेद 370, 35ए) के जाल से मुक्त हुआ जा चुका है... तब 'एक देश-एक भाषाÓ की अनिवार्यता से हिन्दी का गौरव क्यों नहीं लौटाया जा सकता..? जब एक मराठी, गुजराती, मालवी परिवार घरों में अपने मातृभाषा का उपयोग करके हिन्दी-अंग्रेजी पर समान अधिकार रख सकते हैं, तब संपूर्ण देश की बोलियां, प्रांतीय भाषाओं और संस्कृत के सहयोग से हिन्दी की समृद्धि का नया अध्याय क्यों नहीं लिखा जा सकता..? समाज और राष्ट्र के लिए हिन्दी हर हाल में अनिवार्यता है...