कोरोना संकट और आर्थिक विकास...
   Date11-Sep-2020

vishesh lekh_1  
कोरोना महामारी के कारण जिस तरह से सारी आर्थिक गतिविधियां लंबे समय तक बंद रही, उसका कहीं-न-कहीं पर असर दिखना ही था और दिख भी रहा है... लेकिन मायूस होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने का काम देश की उस बड़ी आबादी पर निर्भर है, जो कृषि से जुड़ी है... भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ समय से जिस तरह के संकटों का सामना कर रही है, उसमें आर्थिक वृद्धि को झटका लगना ही था... खासतौर से पिछले चार महीनों के दौरान कोरोना संकटकाल में तो अर्थव्यवस्था बहुत नीचे चली गई... इस महीने के शुरू में आर्थिक वृद्धि को लेकर सरकार ने जो आंकड़े जारी किए, वे एक चौपट अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश करते हैं... चार दशक के बाद पहली बार ऐसा हुआ, जब देश का जीडीपी चौबीस फीसद नीचे चला गया... ऐसे में अब वैश्विक और घरेलू रेटिंग एजेंसियों की उम्मीदें भी पहले से और धुंधली पड़ गईं और चालू वित्त वर्ष (2020-21) के लिए प्रमुख एजेंसियों ने भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर अपने अनुमान और कम कर दिए... हालांकि रेटिंग एजेंसियों का अपना आकलन होता है... किसी को संभावनाएं ज्यादा अच्छी नजर आती हैं, तो उसी समय में किसी रेटिंग एजेंसी का अनुमान विपरीत भविष्यवाणी करता दिखाई देता है... चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2020) के आंकड़े आने के बाद न्यूयार्क की रेटिंग एजेंसी फिच ने इस साल भारत के जीडीपी में साढ़े दस फीसद तक की गिरावट का अनुमान व्यक्त किया है, जबकि पहले यही अनुमान पांच फीसद तक का था... इंडिया रेटिंग ने भारत के जीडीपी में 11.8 फीसद की गिरावट की बात कही है... निवेश बैंकों को तो हालात इससे भी बुरे नजर आ रहे हैं... अमेरिका के निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने चालू वित्त वर्ष में भारत के जीडीपी में 14.8 फीसद तक की गिरावट की आशंका जता दी है, जबकि पहले यही बैंक 11.8 फीसद तक की गिरावट आने की बात कह रहा था... आने वाली तिमाहियों में हालात सुधरेंगे, इसके आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे... रेटिंग एजेंसियों के आकलन के जो पैमाने होते हैं, उनमें जीडीपी का आंकड़ा काफी महत्व रखता है... इसके अलावा शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भूमिका बड़ा कारक होता है... हालांकि इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देश भयानक मंदी का सामना कर रहे हैं... लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था तो पिछले दो साल से मुश्किलों से जूझ रही है... ऐसे में वैश्विक रेटिंग एजेंसियों को भारतीय अर्थव्यवस्था में जल्दी सुधार की उम्मीदें लग नहीं रहीं... भारत में जीडीपी में अभी जो चौबीस फीसद की गिरावट आई है, वह असंगठित क्षेत्र के आंकड़े आने के बाद और ज्यादा हो सकती है... असंगठित क्षेत्र ही भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज मंदी की मार सबसे ज्यादा यही क्षेत्र झेल रहा है... कृषि के कार्य से जुड़े मजदूर, श्रमिक, किसान, व्यापारी यहां तक उद्योगपति इन सभी का संयुक्त योगदान अर्थव्यवस्था को पुन: गति देगा...
दृष्टिकोण
कृषि से जुड़ी उम्मीदें व प्रयास...
कृषि और कृषकों की दशा-दिशा का भारत की अर्थव्यवस्था पर सदैव सकारात्मक और नकारात्मक असर दिखाई दिया है... जब-जब कृषि-कृषक संकट में आते हैं तो अर्थव्यवस्था में भी मंदी के संकेत देखने को मिलते हैं... लेकिन यह पहली बार हो रहा है, जब कोरोना जैसे वैश्विक संकट के कारण जब देश की पूरी अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही हो, तब भारतीय कृषि ही वह क्षेत्र है, जो कहीं-न-कहीं हमारी विकास दर को थामने का आधार बन रहा है... इस दिशा में यह कहना न्यायोचित होगा कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने छह वर्षों में कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने के लिए अनेक अभियान छेड़े हैं... इसलिए इस दिशा में कुछ सकारात्मक बदलाव ही नजर आ रहा है... किसानों के लिए उचित समर्थन मूल्य का निर्णय हो या फिर गन्ना किसानों को उनके पुरानी बकाया राशि की भरपाई हो अथवा खाद-बीज की गुणवत्ता व पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यूरिया को नीम कोटिंग करना हो या फिर बीज की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने की पहल हो... ये सभी बातें कृषि के विकास का आधार बनी... अगर केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर यह दावा कर रहे हैं कि पांच साल में देश में 100 लाख हेक्टेयर भूमि पर सूक्ष्म सिंचाई का लक्ष्य तय किया गया तो इससे खाद्यान्न उत्पादन के साथ ही कृषकों की आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा... इस सूक्ष्म सिंचाई योजना से देश की अर्थव्यवस्था या कहें कि विकास दर को भी नया आधार मिलना तय है... क्योंकि सूक्ष्म सिंचाई के जरिये किसान नकदी फसलों के रूप में फल, फूल, सब्जी व अन्य मौसमी फसलों का उत्पादन बढ़ाकर अपनी ही आमदनी नहीं बढ़ाएंगे, बल्कि अर्थव्यवस्था में भी सहयोगी बन सकेंगे...