श्राद्ध पक्ष में पंचबली का विशेष महत्व
   Date11-Sep-2020

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धर्मधारा
ग रुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने व महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को पितृ पक्ष का विधिवत महत्व बतलाया था कि श्राद्ध पितृ कृपा के दिन माने जाते हैं। इन दिनों श्रद्धा से पुण्यतिथि पर जो कुछ भोजनादि दिया जाता है, उससे पितरों की तृप्ति होती है और वे सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान कर पुन: पितृ विसर्जनी अमावस्या को पितृ लोक लौट जाते हैं। पितृ पक्ष में दिवंगत परिजनों की पुण्यतिथि पर श्राद्ध करने का विधान है। श्राद्ध से तात्पर्य श्रद्धा से है। इसमें ब्राह्मण भोजन के पूर्व पंचबली अर्थात गाय, श्वान (कुत्ता), कौव्वा, देवादि बलि, चींटी आदि को भोजन का भाग दिया जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है, सीधे पितरों को प्राप्त होता है। शहरीकरण के चलते इसका प्रभाव हमारे पशु-पक्षियों पर भी पड़ रहा है, जिससे ये शहरों से पलायन कर गांवों की ओर विमुख हो रहे हैं। आज गाय, श्वान, कौव्वा व छोटे चींटी आदि जीव-जंतु ढूंढे नहीं मिलते, ऐसे में श्राद्धकर्ताओं को बड़ी मशक्कत करना पड़ती है। ऐसी मान्यता है कि इनकी तृप्ति के बिना पितरों की तृप्ति नहीं होती। पंचबली का धर्मशास्त्रीय महत्व प्रतिपादित करते हुए बताया गया है कि- गाय पृथ्वी, कौव्वा वायु, श्वान जल, चींटी अग्नि व देवता आकाश तत्व के प्रतीक बताए हैं। हम पंचबली के माध्यम से इनका आभार ही व्यक्त करते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये पितरों को प्राप्त होती है। गाय को वैतरणी नदी से पार लगाने वाली माना गया है, गाय के निमित्त भोजन का अंश पत्ते पर रखा जाता है। गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। अथर्वेद में गाय को समृद्धि व सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है। गरुड़ पुराण की मान्यता है कि गाय ही वैतरणी नदी से पार लगाने वाली है। गौमाता को श्राद्ध भोजन का भाग प्रदान करने से सभी देवगण तृप्त होते हैं, इसीलिए सर्वप्रथम गाय को भोजन दिया जाता है। यमराज का पशु माना जाता है श्वान को, दूसरी बली श्वान के निमित्त दी जाती है। श्वान को यम के पशु होने की मान्यता भी प्राप्त है। पुराणों की माने तो श्वान बली देते समय यमराज के मार्ग का अनुसरण करने वाले श्याम व शबल का स्मरण अवश्य करना चाहिए। इस बली को कुक्कर बलि के नाम से जाना जाता है। इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है। यमराज का संदेशवाहक है कौव्वा, तीसरी बलि काक बली के नाम से जानी जाती है। यह बली कौव्वों के निमित्त जमीन अथवा छत पर दी जाती है। इसमें सभी भोज्य पदार्थों को मिश्रित कर श्राद्ध का भाग कौवों को दिया जाता है। पुराणों की मान्यता है कि कौव्वा यमराज का संदेशवाहक व शुभाशुभ का संकेत करने वाला है। तीसरी बलि यमराज की प्रसन्नता हेतु दी जाती है। श्राद्ध का भोजन काक बली के रूप में कौव्वों को प्रदान करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। देवताओं के निमित्त अग्नि को भोजन का भाग दिया जाता है, बली देवताओं के निमित्त दी जाती है। गाय के गोबर से बने कंडों को एक सकोरे में रख उन्हें प्रज्ज्वलित कर पांच आहुतियां भोज्य पदार्थ की अग्नि को समर्पित करने से पितरों के साथ देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है। सोलह दिनों के देवता भगवान विष्णु, नारायण, जनार्दन हैं। यह बली पत्ते पर से अग्नि को दी जाती है। इसे देवादि बली कहा जाता है। इससे भगवान जनार्दन की कृपा प्राप्त होती है। पांचवीं बली चींटियों के निमित्त पिपीलिका की दी जाती है। श्राद्ध में भोजन का एक भाग चींटियों के निमित्त भी पत्ते पर रख दिया जाता है। उपर्युक्त पंचबली देने के बाद ब्राह्मण भोजन का संकल्प कर यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों की तृप्ति होती है व सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।