कोरोना वैक्सीन पर टकटकी लगाती दुनिया
   Date01-Aug-2020

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प्रमोद भार्गव
कोरोना महामारी का संकट झेल रही दुनिया के लिए रूस ने अच्छी खबर दी है। मास्को के सेचनोव विश्वविद्यालय के निदेशक अलेक्जेंडर लुकाशेव ने कोविड-19 बीमारी का टीका बना लेने का दावा किया है। मनुष्यों पर इसके परीक्षण का काम पूरा हो चुका है। यह टीका कोरोना वायरस से जूझने के लिए शरीर में प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने का काम करता है। मनुष्य के शरीर में इस टीके का असर दो साल तक रहेगा। हालांकि रूस ने यह नहीं बताया कि यह टीका बाजार में कब तक आएगा। कोरोना टीके के निर्माण में करीब भारत सहित डेढ़ दर्जन देश लगे हैं। भारत ने इसी साल 15 अगस्त तक कोविड-19 का स्वदेशी टीका बना लेने की उम्मीद जताई है। अगर भारत इसमें कामयाबी हासिल कर लेता है तो यह दूसरे देशों के लिए भी राहत की बड़ी खबर होगी। दरअसल भारत के लिए टीका बना लेना इसलिए संभव है, क्योंकि भारत के चिकित्सा विज्ञानियों ने दुनिया में दवाओं और बीमारियों की जांच के उपकरण-निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई है। इस टीके- 'कोवैक्सीनÓ का निर्माण भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और भारत बायोटेक ने मिलकर किया है।
इस सिलसिले में दवा का जानवरों पर परीक्षण पूरा हो चुका है और अब मनुष्यों पर भी इसका परीक्षण चल रहा है। हालांकि टीका परीक्षण का काम अत्यंत चुनौती और खतरे से भरा होने के साथ खर्चीला भी होता है। इसलिए दवा कंपनियां टीके के निर्माण की दिशा में पहल नहीं डाल रही हैं। अलबत्ता कोरोना पूरी दुनिया में महामारी का रूप ले रहा है, इसलिए सभी देशों में टीका बना लेने के उपाय सरकारी स्तर पर ही हो रहे हैं। दुनिया का पहला दवा परीक्षण 1747 में जेम्सलिंड ने किया था। उन्होंने अपने परीक्षण में पाया कि खट्टे फल खाने वाले सैनिकों को स्कर्वी रोग नहीं होता। बाद में जैसे-जैसे दवाएं कृत्रिम तरीकों से प्रयोगशालाओं में तैयार की जाने लगीं, वैसे-वैसे दवा परीक्षणों की जरूरत भी बढ़ती चली गई। इसकी पूर्ति के लिए 'संविदा अनुसंधान संगठनÓ (कॉन्टेक्ट रिसर्च आर्गनाइजेशनव यानी सीआरओ) वजूद में आया। दवा कंपनियां अपनी मर्जी के मुताबिक मानदंड तय करके सीआरओ के जरिये दवा परीक्षण कराने लगीं। सीआरओ ने ही पहले दवा परीक्षण की शुरुआत दलालों के माध्यम से चिकित्सा विश्वविद्यालयों से जुड़े महाविद्यालयों में की और अब तो हालात इतने बद्तर हैं कि ये प्रयोग निजी अस्पतालों और निजी चिकित्सकों के माध्यम से भी किए जाने लगे हैं।
एलोपैथी दवाओं का ज्यादातर आविष्कार करते तो अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, चीन और जर्मनी जैसे विकसित देश हैं, किंतु इन दवाओं का वास्तविक प्रभाव-दुष्प्रभाव जानने के लिए भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ्रीका, भूटान और श्रीलंका जैसे विकासशील देशों के नागरिकों का इस्तेमाल किया जाता है। कोरोना टीका परीक्षण के साथ यह अच्छी बात है कि इसके रोगी फिलहाल हर देश में उपलब्ध हैं। नतीजतन इंसान को गिनी पिग बनाने की जरूरत नहीं पड़ रही है। चूंकि दवा पहली बार मरीजों के मर्ज पर आजमाई जाती है, इस कारण इसके विपरीत असर की आशंका ज्यादा बनी रहती है। दवा जानलेवा भी साबित हो सकती है, यह बात दवा कंपनी और चिकित्सक बखूबी जानते हैं। इसीलिए दवाइयों के प्रयोग पहले चूहे, खरगोश, बंदर और छोटे सूअर के बाद अक्सर लाचार इंसान पर किए जाते हैं। परीक्षण के बहाने गुमनामी के ये प्रयोग चिकित्सकों की नाजायज कमाई का बड़ा हिस्सा बनते हैं। एक मरीज पर दवा के प्रयोग के लिए एक चिकित्सक को तीन से पांच लाख रुपए तक दिए जाते हैं। दवा की रोग पर उपयुक्तता तय हो जाने के बाद कंपनियां दवा को विश्वव्यापी बाजार में बेचकर अरबों रुपए का मुनाफा कमाती हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में दवा परीक्षण का कारोबार तीन हजार करोड़ रुपए सालाना से ज्यादा का है। मौजूदा समय में करीब दो हजार विभिन्न प्रकार की दवाओं के परीक्षण भारत में पंजीकृत हैं। पूरी दुनिया का हर चौथा दवा परीक्षण भारत के गरीब व लाचार लोगों पर हो रहा है। संयोग से प्राकृतिक व भौगोलिक वजहों से मनुष्य जाति की सात आनुवांशिक प्रजातियों में से छह की भारत में आसान उपलब्धता है। इन अनुकूल हालात के चलते भारत में हर मर्ज के मरीज सरलता से मिल जाते हैं और दवा की जांच भी अन्य देशों की तुलना में जल्द हो जाती है। नई दवा के परीक्षण की प्रक्रिया चार चरणों में पूरी होती है। पहले चरण में दवा को जानवरों पर आजमाकर देखते हैं। इसके बुरे असर का आकलन किया जाता है। इसी दौरान यह पता लगाया जाता है कि दवा की कितनी मात्रा मनुष्य झेल पाएगा। यह असर चालीस से पैंतालीस रोगियों पर परखा जाता है। दूसरे चरण में सौ से डेढ़ सौ मरीजों पर दवा परीक्षण होता है। तीसरे चरण में नई दवा का एक चीनी (शकर) की गोली से तुलनात्मक प्रयोग करते हैं। इसे प्लेसिबो (भ्रम) ट्रायल कहा जाता है।
यदा-कदा बीमारी विशेष की दवा जो बाजार में पहले से ही मौजूद है, उसके साथ तुलनात्मक अध्ययन-परीक्षण किया जाता है। यह प्रयोग भी पांच सौ, हजार मरीजों पर अमल में लाया जाता है। इन तीनों चरणों की कामयबी तय होने पर इस नमूने को भारतीय दवा नियंत्रक के पास लायसेंस के लिए भेजा जाता है। लायसेंस मिल जाने पर ही दवा का व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है और दवा बाजार में बिक्री हेतु आम मरीज के लिए उपलब्ध कराई जाती है। इसके बाद क्षेत्र विशेष के लोगों पर बड़ी संख्या में दवा का प्रयोग शुरू होता है, जो दवा परीक्षण का चौथा चरण है। क्षेत्र विशेष में दवा का परीक्षण इसलिए किया जाता है, जिससे स्थानीय जलवायु पर रोगी के प्रभाव के साथ दवा के असर की भी पड़ताल हो। इन चारों परीक्षणों के तुलनात्मक आकलन के बाद जब चिकित्सा विज्ञानी दवा की सफलता की अनुशंसा कर देते हैं, तो इसे विश्व बाजार में दवा निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियां उतार देती हैं। दुनिया की दवा निर्माता कंपनियों के पास धन की कोई कमी नहीं है, लेकिन नए रोगाणुओं की नई दवा या टीका बनाने की खोज बेहद खर्चीली, अनिश्चितता से भरी और लंबी अवधि तक चलने वाली होती है। इसलिए दवा कंपनियों को ऐसे अनुसंधानों में कोई रुचि नहीं है।
बीसवीं सदी का मध्य और उत्तरार्ध काल इस नाते स्वर्ण युग था, जब चेचक, पोलियो, टिटनेस, रेबिज, हेपेटाइटिस जैसे रोगों को पहचान कर इन पर नियंत्रण की दवा या टीके बना लिए गए। हालांकि अभी एड्स और बर्ड फ्लू के टीके नहीं बने हैं। 1990 के बाद से बीमारियों के तकनीकी परीक्षण के उपकरण तो बड़ी संख्या में बना लिए गए, किंतु इस दौरान नई दवाएं नहीं बनी हैं। दवा परीक्षण की अपनी अहमियत है, बशर्ते वह नैतिक शुचिता और पेशेगत पवित्रता से जुड़ा हो। एलोपैथी चिकित्सा पद्धति एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें नई दवा की खोज उपचार की तात्कालिक जरूरत से जुड़ी होती है। इसलिए इस चिकित्सा पद्धति को लगातार नए-नए शोधों का हिस्सा बनाकर स्वास्थ्य लाभ के लिए कारगर बनाये रखने के उपाय जारी रहते हैं। इन परीक्षणों के बाद जो दवाएं बाजार में विक्रय के लिए आती हैं, वे आजमाई हुई अर्थात साक्ष्य आधारित दवाएं (एंवीडेन्स बेस्ड मेडिसिन) होती हैं, लेकिन दवा परीक्षण को कुछ चिकित्सक व चिकित्सालयों ने गलत तरीके से मरीजों को धोखे में रखकर अवैध धन कमाने का धंधा बना लिया है। यह एक बड़ा संकट है। दवा परीक्षण के सिलसिले में डॉ. एडवर्ड जेनर दुनिया में एक ऐसी अनूठी मिसाल रहे हैं, जिन्होंने खसरा के टीके का अविष्कार करते समय उसको अपने बच्चे पर आजमाया था। सवाल है कि क्या हमारे चिकित्सकों में इतना नैतिक साहस है?