पश्चाताप
   Date31-Jul-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
त पती मरुभूमि में महर्षि उत्तंक समाधि प्राप्ति के लिए तपस्यारत थे, परंतु उनका प्यास से बुरा हाल हो रहा था। तभी उन्होंने एक चांडाल देखा। वह उनसे बोला- 'आप प्यास से विकल हैं महाराज! कृपया यह जल ग्रहण करें।Ó ऊँच-नीच की भेदबुद्धि के संस्कार उनमें गहराई से जमे थे, इसलिए प्यास से निष्प्राण होती हुई अवस्था में भी उन्होंने उसे दूर हटने को कहा। चांडाल चला गया। तभी उन्हें कोमल स्पर्श की अनुभूति हुई। उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा कि भगवान कृष्ण खड़े थे। वे उनसे बोले- 'महर्षि! समता, निर्मलता और प्रेम इनकी अनुभूति के बिना समाधि संभव नहीं है। आपकी विकलता का यही कारण है। चांडाल के रूप में स्वयं इंद्र आपके लिए अमृत लाए थे।Ó यह सुन ऋषि का अंतराल पश्चाताप से भर उठा। उसका कारण अमृत ठुकराना नहीं, बल्कि उनके अंत:करण में उपस्थित भेदबुद्धि से जन्मा क्षोभ था। पश्चाताप ने उनके मन को धो दिया और वे तुरंत समाधि को प्राप्त हो गए।