नई शिक्षा नीति : नव संकल्पों का सूर्योदय
   Date31-Jul-2020

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 डॉ. मंगल मिश्र
ला खों सुझावों के विशाल सागर का मंथन करते हुए, देश के अत्यंत प्रतिष्ठित शिक्षाविदों तथा विशेषज्ञों के चिंतन, विश्लेषण और परिश्रम से उत्पन्न नई शिक्षा नीति का प्रारूप 1986 की नीति के 34 वर्ष बाद मोदी सरकार द्वारा जारी किया गया। एकात्म मानववाद को अपना कर्म पाथेय मानने वाली मोदी सरकार ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम अब शिक्षा मंत्रालय किया है, क्योंकि समस्त मनुष्यों में एकात्म भाव का दर्शन करना और मानव को तथा मानव के कल्याण को साधन के स्थान पर साध्य मानना ही दीनदयालजी का दर्शन था और मोदीजी का भी दर्शन है।
नई शिक्षा नीति में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह उभरकर आता है कि यह भारत को विश्वगुरु और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस नीति में कुल 27 विभिन्न मुद्दे उठाये गये हैं, जिसमें से 10 स्कूली शिक्षा से संबंधित, 10 उच्च शिक्षा से संबंधित और 7 अन्य महत्वपूर्ण शिक्षा से संबंधित हैं। इस नीति में पहली बार पूर्व प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक संपूर्ण व्यवस्था को समग्र मानकर विचार किया गया है, पहली बार शिक्षा को संकायों के विभाजन से मुक्त करके शिक्षा की समग्रता पर बल दिया गया है। श्रम की गरिमा बढ़ाने के लिए व्यावसायिक कार्यक्रमों के महत्व पर जोर देना आत्मनिभरता बढ़ाने और बेरोजगारी कम करने की दिशा में दीर्घकाल में बड़ा कदम सिद्ध होगा। नई नीति में पांचवीं तक विद्यार्थियों को मातृभाषा में पढ़ाना उनके व्यक्तित्व विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अब सीधे 12वीं में बोर्ड की परीक्षा कराना, जहां एक ओर विद्यार्थियों को तनाव से बचाएगा, वहीं दूसरी ओर स्कूली शिक्षा में सेमेस्टर पद्धति लागू करना, उनके सतत मूल्यांकन पर भी जोर देगा। नई नीति संस्कृत और भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन पर भी आधारित है। अब स्कूलों में रिपोर्ट कार्ड शिक्षकों के साथ-साथ, साथियों द्वारा भी मूल्यांकित होगा, ताकि विद्यार्थी के संपूर्ण विकास का मूल्यांकन हो सके। स्कूली शिक्षा के नए प्रारूप में बस्ते का बोझ समाप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
पूरे देश में उच्च शिक्षा के लिए एक नियामक संस्था बनाने से अनावश्यक विलंब रुकेंगे और शोध के लिए विशेष फाउंडेशन बनाने के कदम द्वारा नए शोध कार्य प्रोत्साहित होंगे। स्नातक स्तर पर बीच में पढ़ाई छोड़ देना भी विद्यार्थी को खाली हाथ नहीं रखेगा। इससे विद्यार्थी के हाथ में रोजगार-स्वरोजगार का एक आधार तो मिल ही जाएगा। पाठ्यक्रम और फीस तय करने के लिए एक नियामक संस्था बनने से मनमानी शुल्क वसूली पर रोक लगेगी। बहुविषयक पाठ्यक्रम व्यवस्था विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के लिए निश्चित रूप से लाभदायक होगी। संस्कार और संस्कृति से जुड़ी हुई शिक्षा, विद्यार्थियों के बहुमुखी व्यक्तित्व को उभारने में साधक होगी। विदेशों के विश्वविद्यालय अब भारत में आ सकेंगे और भारत के अच्छे विश्वविद्यालय विदेशों में अपने संस्थान खोल सकेंगे। विश्व के किसी भी देश में पहली बार इतने लोकतांत्रिक तरीके से विचार-विमर्श करके नई शिक्षा नीति बनाई गई है। सूचना कांति के वर्तमान दौर में उच्च शिक्षा को सूचना क्रांति का अधिकतम लाभ लेने के प्रारूप से जोड़ा गया है। सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को बहुविषयक संस्थान बनाना, स्वशासी महाविद्यालयों का विकास करना और स्वास्थ्य सेवा में उपलब्ध बहुलवादी विकल्पों को उच्च शिक्षा से जोडऩा वास्तव में स्वागत योग्य है। नई नीति से जुड़े हुए कुछ पेचीदा सवाल भी हैं। देश में स्कूल हो या कॉलेज, सभी के आधारपूर्ण ढांचे बेहद कमजोर हैं। दो तिहाई शिक्षण संस्थान ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, इनमें से अधिकांश मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। यद्यपि नई शिक्षा नीति में जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करना तय है। इससे काफी हद तक राहत मिलेगी, लेकिन यह राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति और नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। आज तो हजारों स्कूल-कॉलेजों में स्वच्छ शौचालय और स्वच्छ पेयजल तक उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में विश्वस्तरीय तकनीकों की बात करना सरकार की संकल्प शक्ति तो दिखाता है, पर क्रियान्वयन की चुनौतियों के प्रति सतर्क भी करता है।
निजी क्षेत्र की अनेक शिक्षण संस्थाएं विद्यार्थियों, अभिभावकों और स्टॉफ के शोषण का बहुत बड़ा अड्डा बनी हुई हैं। ऐसे कई संस्थान हैं, जो समाजसेवा का नकाब पहनकर शिक्षा माफिया के रूप में कार्य कर रहे हैं। ये न तो शिक्षा के नियम मानते हैं और न व्यापार के। ऐसे में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देना और पीपीपी मॉडल को आगे बढ़ाना शोषण के नए रास्ते खोल सकता है। इस पर सरकार को ध्यान देना होगा। कोई भी शिक्षा नीति शिक्षकों के सहयोग के बिना न तो संचालित हो सकती है और न ही सफल हो सकती है। यह देश का दुर्भाग्य है कि शिक्षकों के प्रति संरक्षण के लिए कोई कानून नहीं है। मनरेगा में मजदूर को मिलने वाले वेतन से भी कम वेतन पर स्कूलों-कॉलेजों के शिक्षक कार्य कर रहे हैं। आयेदिन प्रबंधकों द्वारा नौकरी से निकालने की धमकियों के बीच वे बच्चों को पढ़ाते हैं। यदि द्रोणाचार्य का पुत्र दूध पीते राजकुमारों के साथ पढ़कर भी आटे का पानी पीने के लिए विवश होगा तो शिक्षा के उद्देश्य कैसे पूरे होंगे। नई नीति में शिक्षकों के मूल्यांकन एवं प्रशिक्षण पर तो जोर है, लेकिन उनके वेतन, सेवा सुरक्षा और कल्याण के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। पहले तो सरकारी हो या निजी, किसी भी प्रकार की शिक्षण संस्था में स्थायी पद पर शिक्षकों की भर्ती होती नहीं, यदि किसी कारणवश भर्ती हो भी तो हर बार पिछली बार की तुलना में शिक्षकों के लिए आवेदन हेतु और भी अधिक बढ़ी हुई न्यूनतम योग्यताएं निर्धारित की जाती हैं। मांग हमेशा उच्च योग्यता सम्पन्न शिक्षकों की होती है, लेकिन उन्हें वेतन देते समय कई बार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम वेतन मिलता है। देश की किसी भी शैक्षणिक संस्था में 'समान योग्यता-समान काम- समान वेतनÓ का नियम लागू नहीं होता। इसलिए नई शिक्षा नीति में शिक्षकों के वेतन और सेवा शर्तों से जुड़े हुए मुददों पर भी प्रभावी निर्णय आवश्यक है। यह सच है कि कामचोर सभी पेशों में पाये जाते हैं। उन पर नियंत्रण करना भी उतना ही आवश्यक है।
निजी शिक्षण संस्थाओं की मनमानी पर रोक लगाना, शिक्षा माफिया को नियंत्रित करना, शिक्षा को धंधा बनने से रोकना, शिक्षण संस्थाओं के आधारभूत ढांचे का विकास करना और नीति के क्रियान्वयन में राज्य सरकारों, अधिकारियों तथा जमीनी स्तर के व्यक्तियों की प्रभावी सहभागिता सुनिश्चित करना आवश्यक है। अन्यथा इस अमृत कुंभ का स्वाद फिर से राहु-केतु चखेंगे और शिक्षा पर ग्रहण लगता रहेगा।