सफलता का सूत्र शक्ति का सम्यक उपयोग
   Date31-Jul-2020

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धर्मधारा
अ न्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य ज्यादा सामथ्र्यवान एवं ज्यादा शक्ति सम्पन्न है। शारीरिक शक्ति में भले ही वह हाथी, शेर, बैल, घोड़े से थोड़ा कमतर सिद्ध हो, परंतु बौद्धिक बल, सामाजिक बल एवं आत्मिक बल में मनुष्य से ज्यादा शक्तिशाली प्राणी इस सृष्टि में दूसरा नहीं है। इसके अतिरिक्त विज्ञान, तकनीकी, उद्योग, निर्माण इत्यादि न जाने ऐसी कितनी विधाओं का विकास मनुष्य के द्वारा कर दिया गया है कि जिनके कारण उसको लगभग अजेय एवं अपराजेय ही समझा जाना चाहिए। शक्ति के इतने अपरिमित एवं अतुलनीय स्रोतों से जुड़ा होने के बाद भी ऐसा क्या कारण है कि हम अधिकांश मनुष्यों को उनके वैयक्तिक जीवन में दु:खी, परेशान, निर्बल, असहाय-सा पाते हैं? वह इनसान जिसकी बौद्धिक प्रतिभा इतनी है कि वह चाहे तो पूरे संसार की गति मोड़ सकता है और संपूर्ण मानव सभ्यता को एक नई दिशा प्रदान कर सकता है- उसी इनसान को जब हम साधारण-सी कठिनाइयों का निवारण करते समय बच्चों की तरह रोता-चीखता देखते हैं तो शंका अवश्य होती है कि ऐसा क्यों है? कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि क्या विधाता ने पक्षपात किया है? क्या ऐसा हुआ है कि कुछ को ज्यादा तो कुछ को कम शक्ति प्रदान कर दी गई है? सत्य यह नहीं है। ये शंकाएँ पूर्णरूपेण निराधार हैं; क्योंकि प्रकृति ने सभी को इन शक्तियों का लाभ उठाने के पर्याप्त अवसर दिए हैं और प्रत्येक को यह संभावना भी दी है कि वह उस शक्ति का उपयोग स्वयं के उत्कर्ष एवं समाज के कल्याण में कर सके। साधन और परिस्थितियाँ तो महापुरुषों के जीवन में, सामान्य मनुष्य की तुलना में भी कम दिखाई पड़ती हैं। अनेक महापुरुषों ने जीवन में सफलता विपन्नतम परिस्थितियों में पाई है तो यह सोचना और ऐसा कहना कि विधाता ने उनके साथ पक्षपात किया, गलत ही है। सच पूछा जाए तो उनको जीवन में मिली सफलता का मूल आधार-उनको प्रदत्त शक्ति का सम्यक उपयोग करना रहा है। वे शक्तियाँ, जिन्होंने उनको सफलता के शिखर पर आरूढ़ किया, हमें भी प्राप्त हैं, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग उनका समुचित लाभ कुछ कारणों से नहीं उठा पाते।