शिक्षा नीति और नवाचार...
   Date30-Jul-2020

vishesh lekh_1  
शिक्षा किसी भी समाज-राष्ट्र की उन्नति का मुख्य आधार है... क्योंकि जैसी शिक्षा देशवासियों को मिलेगी, वे उसी के मान से अपने व्यक्तिगत, सामाजिक एवं राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का प्रदर्शन करते नजर आएंगे... इसके लिए इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि राष्ट्रीय चरित्र से ही किसी देश की मजबूती का प्रमाण मिलता है... प्रत्येक नागरिक का एक राष्ट्रीय दायित्व है जो उसके राष्ट्रीय चरित्र निर्वाह के जरिये परिलक्षित होता है... इस पूरे कार्य में भाषा, वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन, विचार-व्यवहार का जो सम्मिलित रूप रहता है, वह शिक्षा के जरिये परिष्कृत होता है और उसी के मान से व्यक्ति का राष्ट्रीय भाव जाग्रत होता है... करीब साढ़े तीन दशकों बाद देश में एक ऐसी व्यवहारिक, राष्ट्र उन्नत एवं आत्म अनुशासित बनाने वाली शिक्षा नीति की पहल हुई है, जिसकी लंबे समय से मांग की जा रही थी... 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति पर काम शुरू किया था... तब इस कार्य की शुरुआत में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने पहल की थी... करीब 6 साल की अवधि बीतने के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को नई शिक्षा नीति पर मुहर लगा दी है... इसके पहले एक मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं नई शिक्षा नीति (एनईपी) के मसौदे पर विस्तृत समीक्षा की थी... क्योंकि इस मसौदा समिति का अध्यक्ष इसरो के पूर्व प्रमुख के. कस्तूरीरंगन को बनाया गया था... उनकी विशेषज्ञ समिति ने इस नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार किया है... शिक्षा के क्षेत्र में बहुत व्यापक रूप से बदलाव आ रहे हैं... तीन-चार दशकों पहले जो शिक्षा और उसका क्रियान्वयन के साथ ही परिणाम सामने था, अब उसमें जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है... कोरोना काल में ही शिक्षा के एक नए वैकल्पिक माडल को सामने रखा है... ऐसे में शिक्षा नीति लगातार आ रहे परिवर्तन को देखते हुए नई शिक्षा नीति का निर्माण देश की बदली परिस्थितियों विशेषकर प्रौद्योगिकी में आए बदलाव, तकनीकी क्रांति, डिजिटल शिक्षा और तमाम तरह के नवाचार, शोध को इसमें शामिल करने की पहल हुई है... इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिक्षा का पहला लक्ष्य न केवल उपाधि प्रमाण-पत्र बांटना हो, बल्कि उनमें कौशल विकास के साथ ही उनके अनुभव, दक्षता को परिष्कृत करना भी होना चाहिए... किताबी के साथ ही व्यापक रूप से प्रायोगिक एवं शोधपरक विश्लेषण के अलावा तकनीकी दक्षता एवं इतिहास का सही ज्ञान होना भी चाहिए... भारत में कुल जीडीपी का 4.4 फीसदी शिक्षा पर खर्च होता है... जिसे 6 फीसदी करने की पहल हुई है... इससे भविष्य में बेहतर शिक्षा के रूप में आगे बढऩे का मौका मिलेगा... राजीव गांधी सरकार के समय लाई गई नई शिक्षा नीति के बाद यह मोदी सरकार द्वारा बड़ा बदलाव है, जो करीब साढ़े तीन वर्ष बाद देश की तस्वीर और तकदीर बदलने का आधार नई शिक्षा नीति के जरिये संभव है...
दृष्टिकोण
बढ़ते बाघ अच्छा संकेत...
भारत को नैसर्गिक रूप से ऐसी अनेक संपदाओं के अथाह भंडार मिले हैं, जिनका संरक्षण-संवर्धन और उचित दोहन हो, तो उनमें न तो कभी कमी आ सकती है और न ही कोई उसके अभाव में अपने को मजबूत मान सकता है... क्योंकि हमारी पृथ्वी जिसकी जैसी जितनी जरूरत है, उसकी भरपाई करती है... जरूरत पडऩे पर उसको संतुलित करने हेतु अपना रोद्र रूप भी दिखाती है... अगर पर्यावरण, वन्य एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2018 की बाघों की गणना पर विस्तृत रिपोर्ट जारी करते हुए यह स्वीकार किया है कि देश में बाघों की संख्या सालाना 6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ बढ़ रही है तो यह हमारी प्रकृति एवं पर्यावरण में तेजी आ रहे और उस सुधार का संकेत है, जिसके लिए हमने अलग-अलग स्तर पर अभियान छेड़ रखे हैं... क्योंकि 2018 में 2967 बाघ थे, जो कि दुनिया के 70 फीसदी बाघ भारत में पाए जाते हैं... ऐसे में शिवालिक की पहाडिय़ों और गंगा के मैदानी भागों में बाघों की संख्या 12 वर्षों में 297 से बढ़कर 646 होने का यही सार निकलकर आता है कि पर्यावरण के प्रति के संतुलन को बनाए रखने के लिए एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित है, जिसको बनाए रखने की जिम्मेदारी हर किसी पर है... उसके लिए एक किसान, मजदूर, उद्योगपति और कलकारखाने से लगाकर सरकार व समाज भी बराबर की जवाबदेह है... क्योंकि जब हम अपनी इस नैसर्गिक संपदा चाहे वह खनिज हो, कोयला हो, वन्य जीव, लकड़ी और जल हो या फिर तमाम तरह की जड़ी-बूटियां और औषधियां हो... इनका निरंतर संरक्षण-संवर्धन हमने एक बेहतर पर्यावरण के निर्माण में सहायक बनाता है... बाघों के संरक्षण से इस संदेश को हमें समझना चाहिए...