लक्ष्मी का वास
   Date30-Jul-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
ए क बार देवताओं की प्रार्थना स्वीकार हो गई। लक्ष्मीजी असुरों का वासस्थान सदैव के लिए त्यागकर देवताओं के लोक पहुंच गईं। देवराज इंद्र ने सविस्मय पूछा - 'देवी! असुरों के पास से हमारे पास चले आने का कारण जानने की हमें प्रबल उत्कंठा है। पहले हमने आपसे अनेकों बार विनती की, परन्तु आपने उसे अस्वीकार किया था। आपकी इस बार की स्वीकारोक्ति के पीछे का कारण क्या है?Ó लक्ष्मीजी अपना वरदहस्त उठाकर बोलीं- 'देवराज! जब किसी राष्ट्र में प्रजा सदाचार खो देती है, तो वहां की भूमि, जल, अग्नि कोई भी मुझे स्थिर नहीं रख सकते। मैं लोकश्री हूं, अत: मुझे लोक-सिंहासन चाहिए। मुझे आलस्य, अकर्मण्यता, फूट, कलह, कटुता आदि पसंद नहीं। जहां लोग धर्मपूर्वक रहते हैं और परिश्रमपूर्वक अपना उद्योग करते हैं- उस स्थान को मैं कभी भी नहीं छोड़ती। इसके विपरीत जहां अकारण वैर, हिंसा, क्रोध, प्रमाद, अत्याचार आदि बढ़ जाते हैं, तो उस स्थान को छोड़कर मैं तुरंत चली जाती हूं। मैं शुभ कार्यों से उत्पन्न होती हूं, उद्योग से बढ़ती हूं और संयम से स्थिर रहती हूं। जहां इन गुणों का अभाव होता है, मैं उस स्थान को छोड़ जाती हूं। असुरों का निवास छोडऩे और देवताओं का आग्रह स्वीकारने के पीछे मेरा यही कारण है।Ó