संस्कार युक्त पीढ़ी संस्कारवान, परिवारों से संभव
   Date30-Jul-2020

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धर्मधारा
सं यम से स्थूल शरीर, सहिष्णुता से सूक्ष्म शरीर एवं सेवा से कारण शरीर का विकास होता है। इसके साथ तृप्ति, तुष्टि एवं शांति जैसे सुफलों से जीवन सुवासित हो उठता है। तप और योग की प्रक्रिया स्वत: सक्रिय हो जाती है। चित्त का परिष्कार गहनतम स्तर पर संभव हो चलता है। संन्यासी बनकर एकांत में जिन जटिल संस्कारों के परिमार्जन में जन्मों लग जाते हैं, गृहस्थ में यह प्रक्रिया तीव्रतम रूप में घटित होती है, कर्मबीजों का जड़-मूल से उपचार-परिष्कार होता है और एक जन्म में ही आशातीत आत्मिक उपलब्धि हस्तगत हो चलती है।
ऐसे संस्कारयुक्त परिवार से ही संस्कारयुक्त पीढ़ी का निर्माण संभव होता है और अनुभवी समाज सेवी तैयार होते हैं, जो क्रमिक रूप में परिपक्व संन्यास आश्रम की व्यवस्था को सुदृढ़ करते हैं। स्मरण रहे, गृहस्थ जीवन भोगी और स्वार्थी-लोभी व्यक्ति के लिए नहीं है। योगी और तपस्वी मनोभूमि का व्यक्ति ही गृहस्थ तपोवन की महिमा को समझ सकता है, इसके आदर्शों को निभा सकता है और इसके लाभों को समुचित ढंग से उठा सकता है। समाज की सच्ची सेवा व राष्ट्र निर्माण एक सद्गृहस्थ ही कर सकता है। युग ऋषि के शिष्य व संतान होने के नाते एक सद्गृहस्थ बनकर हम इस भूमिका में अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं, जो समय की मांग है और युग की पुकार भी।
ऐसे में समाज सेवा एवं लोक कल्याण के महती उद्देश्य पीछे छूट रहे हैं। संन्यास आश्रम भी अपनी गरिमा अक्षुण्ण नहीं रख पा रहा। कितने साधु-संन्यासियों को गृहस्थों सा आचरण करते देखा जा सकता है और आए दिन शर्मसार करने वाले घटनाक्रम उजागर हो रहे हैं। ऐसे में कहना न होगा कि सबल गृहस्थ ही आश्रम व्यवस्था की धुरी बनकर इनके विचलन का उपचार कर सकता है। इंद्रिय संयम जहां एक ओर सदाचार को संभव बनाता है, रिश्तों में वफादारी का चोखा रंग घोलता है, वहीं वाक् संयम अनावश्यक वैमन्सय की संभावनाओं को निरस्त करता है। इसके साथ आपसी विश्वास भी प्रगाढ़ होता है, सामंजस्य बढ़ता है।