प्रायश्चित
   Date29-Jul-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
रा जा शर्याति अपने परिवार समेत एक बार वन विहार को निकले। एक सुरम्य सरोवर के निकट पड़ाव डाला गया। बच्चे इधर-उधर खेलकूद, विनोद करते हुए घूमने लगे। मिट्टी के ढेर के नीचे से दो तेजस्वी मणियाँ जैसी चमकती दिखीं तो राजकुमारी सुकन्या को कौतूहल हुआ। उसने लकड़ी के सहारे उन मणियों को निकालने का प्रयत्न किया, किंतु उन चमकीली वस्तुओं को कुरेदने पर उनसे रक्त की धारा बह निकली। सुकन्या को दु:ख भी हुआ और आश्चर्य भी। वह घटना का कारण जानने पिता के पास पहुंची। राजा शर्याति ने सुना तो वे स्तब्ध रह गए। उन्हें ज्ञात था कि समीप के एक टीले के नीचे च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। राजा को लगा कि हो-न-हो, पुत्री से उन्हीं की आँखें फूट गई हैं। वे सपरिवार घटनास्थल पर पहुँचे। देखा, वहाँ च्यवन ऋषि नेत्रहीन होकर कराह रहे हैं। राजा को महसूस हुआ कि उनकी पुत्री से अनजाने में पाप हो गया है। उन्होंने उसके कृत्य के लिए ऋषि से क्षमा माँगी, परंतु ऐसे में राजकुमारी सुकन्या ने अभूतपूर्व साहस दिखाया। वह बोली- 'पिताजी! पाप का प्रायश्चित कर्ता को ही करना चाहिए। मैं आजीवन नेत्रहीन ऋषि च्यवन की पत्नी बनकर उनकी सेवा करूँगी। यही मेरे कर्मों का प्रायश्चित होगा।Ó सुकन्या की घोषणा ने उसके पुण्य को सहस्रगुणित कर दिया।