सृष्टि की सृजनात्मक ऊर्जा है प्रेम
   Date29-Jul-2020

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धर्मधारा
परमात्मा की बनाई हुई यह सृष्टि प्रेम के बिना अधूरी है। प्रेम प्रकृति के कण-कण में घुला हुआ है, प्रेम के कारण ही इस प्रकृति में जीवन संभव हो पाया है। प्रेम के कारण ही सब एक-दूसरे से बँधे हुए हैं। जैसे ही यह प्रेम कम पड़ता है, विलग होता है, विनाशकारी, विध्वंसक घटनाएं घटने लगती हैं। प्रेम की ही वह पुकार है, जिसके कारण प्रकृति इतनी समृद्ध, सुंदर, सम्मोहक व शृंगारित है, प्रेम का अलगाव होते ही प्रकृति भी अपना भयानक रूप प्रकट करती है। प्रेम से परिपूर्ण होने पर प्रकृति पोषण करती है, संरक्षण देती है और प्रेम से विलग होने पर वही प्रकृति भांति-भांति के विनाश रचती है, विध्वंस करती है।
प्रेम क्या है? प्रेम वास्तव में इस सृष्टि के अंदर निहित सृजनात्मक ऊर्जा का नाम है, जिसके कारण सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। चूंकि प्रकृति में मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पतियां सभी आते हैं, इसलिए इन सबके अंदर भी प्रेम किसी न किसी रूप में विद्यमान है। प्रकृति में एक अनिवार्य तत्व है, इसके बिना जीवन असंभव है, वंशवृद्धि असंभव है। पशु-पक्षी एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, जैसे - पशु अपने प्रेम की अभिव्यक्ति में एक-दूसरे को चाटते हैं, सूँघते हैं, साथ खेलते हैं, खाते हैं, समूह में प्रेम से रहते हैं, अपनी वाणी से एक-दूसरे को बुलाते हैं, एक-दूसरे को भली-भांति पहचानते हैं और अपने किसी साथी का वियोग होने पर दु:खी भी होते हैं। पशु-पक्षी प्रेमवश ही अपने बच्चों का बहुत ध्यान रखते हैं, उन्हें आहार देते हैं, सुरक्षा देते हैं। गाय-भैंस यदि अपने बच्चों को दूध पिलाती है तो पक्षी अपने बच्चों के लिए अपनी चोंच में दाना लाकर उनकी चोंच में डालते हैं, इससे उनके बच्चे अत्यंत प्रसन्न होते हैं और इसकी अभिव्यक्ति करने के लिए वे चहकते हैं।