चीन के लिए चुनौती बनते भारत के रक्षा उपकरण
   Date28-Jul-2020

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अभिषेक कुमार सिंह
वै से तो कोई भी जंग सबसे पहले मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक स्तर पर लड़ी जाती है, लेकिन जब किसी युद्ध से पूर्व आजमाये जाने वाली ये रणनीतियां कारगर नहीं होती हैं और सेनाओं के बीच किसी मसले पर वास्तविक जंग की नौबत आ जाती है तो उसमें जंगी जहाजों, युद्धपोतों, तोप, बम, गोलियां, मिसाइलों जैसे हथियार का इस्तेमाल होता है, लेकिन इधर कुछ समय से हथियारों की इस सूची में ड्रोन एक अनिवार्यता बनने लगे हैं। इस संबंध में एक उल्लेखनीय खबर यह है कि पूर्वी लद्दाख में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के साथ लंबे समय से जारी गतिरोध के बीच भारत ने कम ऊंचाई पर अधिक देर तक उड़ान भरने वाले अमेरिकी सशस्त्र प्रिडेटर-बी ड्रोन खरीदने में रुचि दिखाई है। यह ड्रोन खुफिया जानकारियां जमा करने के अलावा शत्रु के ठिकानों का पता लगाकर उन्हें मिसाइल और लेजर निर्देशित बमों से नष्ट कर सकता है। फिलहाल भारत पूर्वी लद्दाख में इजरायली ड्रोन- हेरोन का इस्तेमाल करता है, जो सिर्फ निगरानी के काम आता है। यह किसी हथियार से लैस नहीं है, लेकिन यहां अहम सवाल यह है कि क्या ड्रोन वास्तव में किसी जंग में इतने मददगार साबित हो सकते हैं कि वे युद्ध का नक्शा ही पलट दें। क्या इनकी मदद से सैनिकों की क्षति कम की जा सकती है और जीत का वह उद्देश्य हासिल किया जा सकता है, जिसके लिए कोई युद्ध लड़ा जाता है।
आज की जंग में ड्रोन कितने जरूरी बन गए हैं, यह बात इससे समझी जा सकती है कि जब अमेरिका ने भारत को चार अरब डॉलर में 30 सी गार्डियन (निहत्था नौसैनिक संस्करण या यूएवी, जनरल एटॉमिक्स द्वारा बनाया गया प्रिडेटर-बी) देने की पेशकश की, तो उधर खबर मिली कि चीन अपने दोस्त पाकिस्तान को चार सशस्त्र ड्रोन की आपूर्ति करने की प्रक्रिया में है। पाकिस्तान को ये ड्रोन चीन दे ही रहा है। वह पाकिस्तान के साथ मिलकर 48 जीजे-2 ड्रोन उत्पादन की योजना भी बना रहा है। ये ड्रोन चीन के डिजाइन किए गए ड्रोन विंग लूंग-2 का सैन्य संस्करण हैं। भविष्य में पाकिस्तानी वायुसेना भी इनका इस्तेमाल करेगी। चीन पहले से ही एशिया और पश्चिम एशिया में कई देशों में स्ट्राइक ड्रोन विंग लूंग-2 बेच रहा है। फिलहाल इसका प्रयोग लीबिया में जारी गृह युद्ध में यूएई समर्थित बलों द्वारा त्रिपोली में तुर्की समर्थित सरकार के खिलाफ किया जा रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के अनुसार चीन सशस्त्र ड्रोन के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में उभरा है। हालांकि इस मामले में चीन की भूमिका काफी आपत्तिजनक है। वह इसलिए क्योंकि अमेरिका जहां अपने ऐसे हथियारों को देते समय एक प्रक्रिया का अनुसरण करता है, जबकि चीन ऐसा कुछ नहीं करता है। जहां तक भारतीय स्वदेशी युद्धक ड्रोन का सवाल है तो कुछ निजी कंपनियां मध्यम रेंज के निगरानी ड्रोन विकसित करने की प्रक्रिया में हैं, लेकिन वे सशस्त्र ड्रोन हासिल करने की क्षमता से अभी दूर हैं। इसके अलावा लद्दाख में किए गए कई प्रयोगों के दौरान तिब्बत के पठार पर उच्च-वेग से चलने वाली हवाओं में खो जाने वाले स्वदेशी ड्रोन कामयाब नहीं हुए हैं। हालांकि देश के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की योजना है कि वह वर्ष 2020 के अंत तक जंगी ड्रोन के शुरुआती संस्करण बना ले, जिनमें जरूरतों के मुताबिक फेरबदल कर देश में ही युद्धक ड्रोन का उत्पादन किया जा सके। सामान्य तौर पर ड्रोन एक मानवरहित विमान होता है। इन्हें उड़ाने की दोस्तरीय व्यवस्थाएं होती हैं। इसमें एक पायलट भी होता है, पर वह ड्रोन में नहीं बैठता, बल्कि वह रिमोट कंट्रोल के जरिए ड्रोन पर नियंत्रण करता है। इसके साथ में एक व्यक्ति परिचालक की भूमिका में होता है, जो इस पर नजर रखता है कि ड्रोन किस दिशा में जा रहा है। ऐसी व्यवस्था आमतौर पर असैनिक उद्देश्यों के लिए काम में लाए जा रहे ड्रोन के लिए होती है। सैन्य भूमिका में काम आने वाले ड्रोन ज्यादा उच्च तकनीक वाले होते हैं।
वे एक कम्प्यूटरीकृत कंट्रोल के तहत उड़ान भरते हैं और कम्प्यूटर से मिले निर्देश के अनुसार निगरानी और जासूसी करने के साथ-साथ तय की गई जगह पर बम अथवा मिसाइल दागने का काम करते हैं। सैन्य या पुलिस के इस्तेमाल में आने वाले ड्रोन सबसे ताकतवर होते हैं। दुश्मन देश की सीमा के नजदीक या किसी दंगाग्रस्त इलाके की निगरानी वाले ड्रोन की चार या आठ भुजाओं में बैटरी के अलावा वीडियो कैमरे व सेंसर लगे होते हैं। सैन्य ड्रोन में कई और भी इंतजाम करने होते हैं। जैसे ब्रिटेन द्वारा बनाए गए ड्रोन (यूएवी)- प्रिडेटर में तीन किलोवॉट की एक बैटरी होती है, जो इसे चालू करने के लिए आरंभिक ऊर्जा देती है। इसके अगले और पिछले हिस्से में रबर से बने ईंधन टैंक होते हैं, जो अपने साथ करीब 600 पौंड ईंधन ले जा सकते हैं। कुल मिलाकर प्रिडेटर जैसे ड्रोन में बत्तीस उपकरण होते हैं, जो संचालन करने के साथ-साथ सूचनाएं बटोरने, तस्वीर लेने से लेकर हमले तक कर सकते हैं। ड्रोन तकनीक की शुरुआत अठारहवीं सदी से मानी जाती है। दावा किया जाता है कि अठारहवीं सदी में आस्ट्रिया ने जब वेनिस पर बम से भरे गुब्बारों के जरिए हमला बोला था, तो उसमें ड्रोन तकनीक का ही इस्तेमाल किया गया था। प्रथम विश्वयुद्ध के समय भी इस तकनीक से दुश्मन सेनाओं पर कई हमले किए गए, लेकिन आधुनिक ड्रोन के लड़ाकू चेहरे का खुलासा पहली बार बालकन युद्ध में हुआ था। इसके फौरन बाद अफगानिस्तान, इराक और पाकिस्तान में इन्हें आसमानी हमलावरों की तरह ब्रिटेन और अमेरिकी सेना अपने प्रयोग में लाई। अमेरिका की सैन्य इकाई- यूएस एयरफोर्स और खुफिया सीआईए के पास अपने-अपने सशस्त्र ड्रोनों की इकाइयां रही हैं। सीआईए ने पाकिस्तान और दूसरे देशों में आतंकवादियों को मारने के लिए भी ड्रोन आजमाए। इस मामले में ब्रिटेन भी अमेरिका से पीछे नहीं रहा। उसकी सेना ने इराक और अफगानिस्तान में निगरानी रखने और हमला करने के लिए कई तरह के ड्रोन का इस्तेमाल किया।
हजारों किलोमीटर लंबी और भौगोलिक रूप से कई मुल्कों के साथ जमीनी सरहद साझा करने वाले भारत जैसे देश के लिए सीमाओं की निगरानी और शत्रु देशों की गतिविधियों की सतत निगरानी के दृष्टिकोण से ड्रोन एक महती जरूरत बन गए हैं। सुदूर रेगिस्तानी और दुर्गम बर्फीली पहाडिय़ों में आतंकवादियों की घुसपैठ के अलावा विस्तारवादी नीयत से जमीन कब्जाने का इरादा रखने वाले चीन जैसे पड़ोसी देशों की हरकतों के मद्देनजर भी इनकी आवश्यकता है।
ये ऐसी जगहों पर उस दौरान भी काम आ सकते हैं, जब मौसम की कठिनाइयों के कारण वहां सैनिकों की सतत तैनाती संभव नहीं होती है। युद्धक ड्रोन चूंकि वास्तविक जंग में लड़ाकू विमानों के समान ही हमले कर सकते हैं, इसलिए इनके इस्तेमाल में पायलटों की जान और बेहद महंगे लड़ाकू विमान के नुकसान का जोखिम भी नहीं रहता। हालांकि इस मामले में भी स्वदेशीकरण की योजनाएं गंभीरता से लागू करना ज्यादा अच्छा है, क्योंकि उम्दा जंगी ड्रोन की कीमत भी लड़ाकू विमानों की तरह अरबों डॉलर में पहुंच गई है। कोशिश हो कि भारत युद्धक-सशस्त्र ड्रोन बनाने में ऐसी महारत हासिल करे, जिससे वह इनका निर्यात करने की हैसियत में आ जाए। दुनिया में निगरानी करने वाले और जंगी ड्रोन की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए इनका विकास करना और इस तरह हथियार उद्योग में जगह बनाने का यह एक बड़ा अवसर है, जिसका फायदा भारत को उठाना चाहिए।