कठिनाई में धैर्य पुरुषार्थ की पहचान
   Date28-Jul-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
धै र्य जीवन का एक ऐसा गुण है, जिसके गर्भ से बाकी सब गुण प्रस्फुटित होते हैं। यदि व्यक्ति में धैर्य नहीं है तो उसकी शक्ति, दुर्बलता में बदल जाती है व मेहनत का वो फल नहीं मिल पाता, जिसका वह हकदार है। यदि व्यक्ति में धैर्य नहीं है तो वह जीवन के पूर्ण आनंद से वंचित रह जाता है। जिसमें धैर्य है, समझो उसने काल को भी अपने पक्ष में करने की कला जान ली। विरोधियों की क्या बिसात, दुश्मन भी ऐसे धीर-वीर का लोहा मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं, क्योंकि धैर्य व्यक्ति को सहिष्णु बनाता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन के अभावों, कष्टों, विरोधों और विषमताओं के बीच उसके अंतस् में जल रहा धैर्य का दीपक उसे रोशनी देता है कि समय पर सब ठीक हो जाएगा। परिस्थितियों पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता, लेकिन मन:स्थिति तो बहुत कुछ उसके हाथ में ही है, जिसको धैर्य के बल पर वह संभाले रहता है और अनुकूल दिशा देता है।
धीर-वीर जीवन की विषमताओं एवं प्रतिकूलताओं के बीच अपना धैर्य नहीं खोता, विश्वास बनाए रखता है। धैर्य उसे अनावश्यक प्रतिक्रिया व नकारात्मकता से बचाता है। बजाय इनमें समय बरबाद करने के वह अपने अंदर झाँकता है, घटना के मूल में उतरता है और उसके कारण को खोजकर जड़-मूल से समाधान की राह तलाशता है। परिस्थितियों के भँवर में उलझने के बजाय वह इनसे पार निकलने की राह निकालता है। जीवन के क्षणिक यथार्थ को समझकर इसके पीछे निहित अनंत संभावनाओं को साकार करने की दिशा में बढ़ चलता है।
धीर व्यक्ति जानता है कि बोए बीज का फल समय पर मिलेगा, अत: वह हर पल का सदुपयोग करता है। वह नन्हे-नन्हे कदमों के साथ अभीष्ट लक्ष्य की ओर निरंतर गतिशील रहता है। सच्चिंतन, सत्कर्म व सद्भाव की त्रिवेणी में निरंतर स्नान करता है। सत्कर्म की बोई फसल के फलित होने का इंतजार करता है। वह संत कबीर के द्वारा उस वचन के मर्म को समझता है, जो कहता है -
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कछु होय।
माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय।