कर्मफल
   Date27-Jul-2020
 
prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
आ ठों वसु एक बार सपत्नीक पृथ्वी पर भ्रमण करने हेतु आए। भ्रमण के दौरान वे महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पर पहुँचे। उस समय महर्षि वशिष्ठ वहाँ नहीं थे। आश्रम घूमते समय प्रभास वसु की पत्नी कामधेनु गाय को देखकर उस पर मुग्ध हो गई और अपने पति से बोली कि वे कामधेनु को चुरा लें। प्रभास वसु ने अपनी पत्नी को बहुत समझाया कि चोरी करना उचित नहीं है, परंतु वो नहीं मानी। अतएव उनको गाय चुरानी पड़ी। महर्षि वशिष्ठ जब आश्रम लौटे तो उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि से सब जान लिया और जानने के बाद आठों वसुओं को पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दिया। शाप व्यर्थ नहीं हो सकता था, अत: अष्टवसु देवगुरु बृहस्पति की शरण में गए। देवगुरु ने महर्षि वशिष्ठ से उनकी गलती के लिए क्षमा माँगी तो उन्होंने सात वसुओं को तो जन्म लेते ही मुक्ति का वरदान दे दिया, परंतु अंतिम वसु प्रभास को नहीं। ये आठों वसु क्रमश: शांतनु और गंगा से जन्मे। उनमें से सात की तो तत्काल ही मृत्यु हो गई, परंतु आठवें वसु को भीष्म पितामह के रूप में धरती पर जीवन काटना पड़ा। इस तरह किए गए कर्म का परिपाक प्रत्येक जीवात्मा को करना पड़ता है।