अपने कृत्यों से राजनीतिक विश्वास खोते राजनेता
   Date27-Jul-2020

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 दीपक कुमार त्यागी
अ पनी विस्तारवादी नीति, ओछी चालबाजी, विश्वासघात, पीठ में खंजर घोंपने, धोखेबाजी, झूठ, प्रपंच, कुटिल चाल और कायराना हरकतों के लिए चीन विश्व में प्रसिद्ध है। जिस समय सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके चीन के वुहान में पैदा हुए बेहद घातक कोरोना वायरस महामारी के संक्रमण से मानव सभ्यता को बचाने की बहुत बड़ी चुनौती विश्व के सामने खड़ी है। जिस समय विश्व के हर देश का समस्त सिस्टम कोरोना से अपने लोगों की अनमोल जिंदगी बचाने में व्यस्त है, उस बेहद भयावह आपदाकाल के समय में भी चीन अपनी भूमाफिया वाली ओछी सोच, विस्तारवादी नीति व ओछी कायराना हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। जिस समय सभी देशों को एकजुट होकर कोरोना वायरस के खात्मे के लिए लडऩा चाहिए, उस समय भी मानवता का दुश्मन चीन भारत की सीमा पर जबरन सीमा विवाद उत्पन्न कर रहा है। आपको बता दें कि चीन की सीमा 14 देशों के साथ लगती है, जिनमें से 13 देशों के साथ भूमाफिया चीन का विवाद चल रहा है, 14वां देश पाकिस्तान है, जिसने चीन के सामने पूर्ण रूप से सरेंडर कर रखा है और जिस तेजी के साथ चीन का दिन-प्रतिदिन पाकिस्तान में बहुत तेजी से राजनीतिक व सरकार के सिस्टम के स्तर पर दखल बढ़ता जा रहा है, उसके हिसाब से वह दिन अब दूर नहीं है, जब चीन बहुत जल्द ही पाकिस्तान पर भी अपना कब्जा जमाने का प्रयास शुरू करके उसको चीन का हिस्सा बनाने के षड्यंत्र की रणनीति पर काम शुरू कर देगा।
जिस तरह से कुछ दिन पहले चीन ने अपनी विश्वासघाती नीति व ओछी हरकतों पर अमल करते हुए, चीन की सेना ने 15-16 जून की रात को भारत के लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में एलएसी पर भारतीय सैनिकों की पैट्रोलिंग टीम पर कायरानापूर्ण ढंग से हमला किया है, वह चीन के शीर्ष नेतृत्व व उसकी सेना के गैरजिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। इस घटना के बाद से ही दोनों देशों के बीच जबरदस्त संघर्षपूर्ण स्थिति व बेहद तनाव वाला माहौल लगातार बना हुआ है। भूमाफिया चीन के इस कायराना हमले में भारत की सीमाओं की रक्षा की खातिर देश के वीर जांबाज 20 सैनिकों को अपनी अनमोल शहादत देनी पड़ी थी। चीन की सेना के इस हमले में ही संघर्ष के दौरान हमारे देश के माँ भारती के वीर जांबाज सपूत सेना के बेहद पराक्रमी बिहार रेजीमेंट के वीर जांबाज जवानों ने भी तत्काल ही चीनियों की सेना के 43 लोगों को मारकर मुँहतोड़ जवाब दे दिया था, जिसमें चीनी सेना का शीर्ष कमांडर भी शामिल था। भारत के जांबाज वीर योद्धा सैनिकों ने तुरंत ही मौके पर जबरदस्त जवाबी कार्रवाई करके चीनी ड्रैगन को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भारत की जांबाज वीर सेना उसको हर वक्त विकट से विकट परिस्थितियों में भी उचित जवाब देने में सक्षम है। भारत-चीन के बीच घटित इस घटना के बाद से भारत के आम व खास सभी वर्गों के जनमानस में चीन के खिलाफ बहुत जबरदस्त आक्रोश व भयंकर गुस्सा व्याप्त है। देश में हर तरफ केवल एक ही मांग उठ रही है कि 'देश मांगे चीन से बदलाÓ और 'चीनी सामान का करो बहिष्कारÓ। लेकिन बेहद अफसोस की बात यह है कि देश में इस बेहद गंभीर व ज्वलंत मसले पर भी लगातार पक्ष-विपक्ष के दलों की आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति तेजी से जारी है। गलवान घाटी की इस सैन्य संघर्ष की घटना के बाद से अधिकांश राजनीतिक दलों की कृपा से देश में राजनीति अपने चरम पर पहुंची हुई है, जबकि इस समय विश्व के अधिकांश ताकतवर देश इस बेहद ज्वलंत मसले पर भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारे देश के कुछ राजनेता जिनको इस समय एकजुटता दिखाकर समाज के सामने नायक बनना चाहिए था, वो इस समय भी दलों का आपसी मनमुटाव व अपनी राजनीति को भूलने के लिए तैयार नहीं हैं।
सबसे बड़े अफसोस की बात यह है कि जिस समय हमारे देश के नायकों को एकजुट होकर भारत के लिए व दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके ड्रैगन चीन को हर मोर्चे पर घेरना था, उस समय भी इन कुछ राजनेता स्वघोषित नायकों के द्वारा देश में एक-दूसरे को चिढ़ाने की राजनीति की जा रही है। जब दुश्मन हमारे देश के रीयल नायक हीरो जांबाज वीर सेना के जवानों को बार-बार अपने ही क्षेत्र में पैट्रोलिंग करने से रोकने का दुस्साहस कर रहा है, सेना के जवानों के विरोध करने पर चीन उनको निशाना बनाकर खूनी झड़प करने का प्रयास तक कर रहा है। आज जब देश की चीन, पाकिस्तान व नेपाल से सटी सीमाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर दुश्मन देश की लगातार ओछी हरकतों से खतरा मंडरा रहा हो और इस बेहद गंभीर मुद्दे पर भी कुछ राजनेताओं के द्वारा आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति की जाए, यह देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए बेहद शर्म की बात है।
आज देश में स्थिति यह हो रही है कि चीन के मसले पर आम जनता को बरगलाने के लिए एक तरफ तो देश के कुछ राजनेता मौजूदा स्थिति पर ध्यान न देकर, वर्ष 1962 की ओट लेकर आज भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुए चीन युद्ध के समय की गई भारत की कार्रवाई पर प्रश्नचिन्ह लगाकर, नेहरू व उस समय की हमारी सैन्य सुरक्षा व्यवस्था को बार-बार कठघरे में खड़ा करने में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ राजनेता गलवान घाटी व चीन के द्वारा अन्य मोर्चों पर लगातार भारतीय सीमाओं पर हो रहे अतिक्रमण के प्रयास की घटनाओं को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल पर प्रश्नचिन्ह लगाकर उनको कठघरे में खड़ा करने में व्यस्त हैं। कोई भी पक्ष या विपक्ष यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि यह कुटिल धोखेबाज चीन से सीमा विवाद का बेहद ज्वंलत मसला है, यह मसला कोई छोटा-मोटा या देश की अंदरुनी राजनीति का मुद्दा नहीं है, जिस पर राजनेताओं को राजनीति का अखाड़ा बनाना बेहद जरूरी है। यह भारत के दुश्मन भूमाफिया चीन के द्वारा भारत को अस्थिर करने के लिए उत्पन्न किया गया बेहद गंभीर सीमा विवाद है। सब देशवासियों को ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें समझाने वाले देश के चंद राजनेता खुद अब भी यह समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि भाई जब देश की सीमाएं सुरक्षित रहेंगी, तब ही तुम देश में चैन से राजनीति कर पाओगे।
मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि अपने ही राजनेताओं के द्वारा देश में अपनी ही बेहद गंभीर समस्याओं व चुनौती के समय मिलकर उस समस्या का समाधान ढूंढऩे की जगह न जाने क्यों उनके द्वारा बार-बार ओछी राजनीति शुरू कर दी जाती है। आज भी देश में एक बार फिर वही स्थिति शुरू हो गई है। आज एक पक्ष देश की सुरक्षा व्यवस्था पर किसी के द्वारा सवाल पूछने पर संतोषजनक जवाब न देकर सेना के पराक्रम की ओट लेकर हर सवाल पूछने वाले व्यक्ति को देशद्रोही घोषित कर देता है, तो दूसरा पक्ष यह देखकर खुश हो रहा है कि 'अब आया ऊंट पहाड़ के नीचेÓ कोई भी पक्ष या विपक्ष यह नहीं सोच रहा है कि यह देश की सुरक्षा का बेहद गंभीर सवाल है, न कि किसी राजनीतिक दल की शह और मात का खेल चल रहा है। आज देश के कुछ राजनेताओं के द्वारा यह जो चलन चल गया है कि वो विदेश नीति को भी मीडिया के सामने तय करना चाहते, यह चलन देशहित में बिल्कुल भी ठीक नहीं है। चीन, पाकिस्तान व नेपाल के मसले पर देश के पक्ष व विपक्ष के कुछ राजनेताओं के आचरण को देखकर अब यह स्थिति बिल्कुल आईने की तरह स्पष्ट हो गई है कि उनको देश, देशहित व देश के आम जनमानस के हितों से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि उनको हर वक्त केवल और केवल अपनी राजनीति चमकाने और अपने राजनीतिक व अन्य तरह के लाभों की चिंता है, चाहे उसके लिए उनको राजनीति व सिद्धांतों के स्तर को कितना भी क्यों न गिराना पड़े। जब संकटकाल में हम सभी देशवासियों को दिल से एकजुट होकर अपनी एकजुटता को विश्व समुदाय के सामने नजीर के तौर पर पेश करना चाहिए था, उस समय भी हमारे देश के कुछ राजनेताओं व स्वघोषित नायकों का व्यवहार बेहद आश्चर्यचकित करता है। देश में जिस तरह से चीन के मसले पर अंदरुनी राजनीति एकजुटता की जगह विवादों के चरम पर है, वह भविष्य में भूमाफिया चीन के साथ सीमा विवादों के निस्तारण के समय में भारत के लिए एक गंभीर समस्या बन सकती है।