आश्रम-व्यवस्था में गृहस्थ का विशिष्ट स्थान
   Date27-Jul-2020

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धर्मधारा
आ श्रम-व्यवस्था भारतीय संस्कृति की एक मौलिक विशेषता है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। व्यक्ति के क्रमिक विकास के चार सोपान, जिनमें धर्म, अर्थ और काम, मोक्षरूपी चार पुरुषार्थों के समन्वय के साथ जीवन की चरम उपलब्धि को प्राप्त करने की सुंदर व्यवस्था है। हालांकि आज ऋषिप्रणीत आश्रम एवं पुरुषार्थ-व्यवस्था की चूलें हिल चुकी हैं, लेकिन इनके शाश्वत महत्व एवं वर्तमान प्रासंगिकता को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता।
आश्रम-व्यवस्था में भी गृहस्थ जीवन का अपना विशिष्ट महत्व है। एक स्वस्थ एवं सुसंस्कारित गृहस्थ जीवन नररत्नों की खदान है, समाज व विश्व के लिए एक सुयोग्य पीढ़ी के निर्माण की यह एक सबल प्रयोगशाला है। जीवन की महायात्रा में परम लक्ष्य की ओर बढऩे हेतु गृहस्थ धर्म एक महत्वपूर्ण सोपान है, जिसे यदि विवेकपूर्ण रीति से निभाया जाए तो यह किसी वरदान से कम नहीं। जितने भी महापुरुष, महामानव एवं अवतारी सत्ताएँ इस धरती पर अवतरित हुए, ये किसी-न-किसी रूप में किन्हीं सदगृहस्थों के तप व पुण्य का ही प्रसाद थे। प्राय: गृहस्थ धर्म का निर्वाह करते हुए जीवन के परम लक्ष्य की ओर आरोहण का व्यावहारिक मार्गदर्शन कम ही महापुरुष कर पाए हैं। अधिकांश स्वयं संन्यास धर्म में दीक्षित रहे या गृहस्थ के सांगोपांग अनुभव से रीते रहे। सो ऐसे में खुलकर इसका प्रतिपादन व दिशाबोध प्राय: नहीं कर पाए व गृहस्थ को तपोवन की संज्ञा युगऋषि की एक मौलिक देन है।