श, शा और शांति का ऐक्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
   Date10-Jul-2020

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डॉ. विकास दवे
उ ज्जैन में एक दिन संघ के स्वयंसेवकों के पास रात्रि 2.00 बजे फोन पर सूचना पहुंचती है कि आपको आधे घंटे में शिप्रा नदी के किनारे स्थित चक्रतीर्थ श्मशान घाट पर उपस्थित होना है। आश्चर्यजनक रूप से आधे घंटे बाद 98 कार्यकर्ता श्मशान घाट पर उपस्थित थे। सभी को पंक्ति में बैठाया गया। सूचना देने वाले व्यक्ति ने अपने अधिकारी को कहा 98 व्यक्ति उपस्थित हैं, जो दो व्यक्ति नहीं आ पाए, उनके बारे में सूचना प्राप्त है कि वह क्यों नहीं आए? प्रथम व्यक्ति इस समय राजस्थान में हैं, इसलिए नहीं आ पाए और दूसरे कार्यकर्ता अपनी माताजी की अस्वस्थता के कारण से अस्पताल में हैं और उनकी सेवा सुश्रुषा कर रहे हैं। सभी कार्यकर्ताओं को एक गीत गाने के बाद पुन: अपने घर जाने के लिए कह दिया गया। न तो किसी कार्यकर्ता ने किसी से यह पूछा कि उन्हें बुलाया क्यों गया था अथवा इस प्रकार अचानक नींद में से उठाकर मध्यरात्रि में बुलाने का क्या अर्थ था? किंतु इन कार्यकर्ताओं की प्रामाणिकता ही वास्तव में संघ के इस विराट महासागर की शक्ति है। यही अनुशासन संघ में उस शब्द युग्म को जन्म देता है, जिसमें कहा जाता है -'जहां अपेक्षित वहां उपस्थितÓ।
संघ में एक और शब्द प्रचलित है -'एक चालकानुवर्तीत्वÓ। शब्द थोड़ा कठिन है, संस्कृत का है, किंतु एक उदाहरण से यह सहज रूप से आपको समझ में आ जाएगा। आप सबको स्मरण करा दूँ कि जिस समय भारत पड़ोसी देश से युद्ध की स्थिति में था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय गोलवलकरजी से आग्रह किया था कि इस समय सेना और पुलिस पूरी तरीके से युद्ध की व्यवस्थाओं में जुटी हुई है, ऐसे में संपूर्ण दिल्ली शहर के यातायात को व्यवस्थित रखना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है। क्या संघ के स्वयंसेवक यातायात को संभालने में सक्षम होंगे?
गुरुजी ने तुरंत कहा- क्यों नहीं, आप जब से कहें, तब से दिल्ली का यातायात हमारी जवाबदारी होगी। नेहरूजी ने उनसे पूछा- आपको पता है इसके लिए लगभग 5000 से अधिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होगी? इतने कार्यकर्ताओं को घर तक सूचना देना और उन्हें बुलाना यह कितने लंबे समय में संभव हो पाएगा?
गुरुजी ने कहा- '1 घंटे में।Ó उनके लिए आश्चर्य का विषय था। इतना बड़ा महानगर और वह युग भी ऐसा था, जब टेलीफोन और मोबाइल जैसे साधनों की सुविधा भी नहीं थी, किंतु आश्चर्यजनक रूप से 1 घंटे में पूर्ण गणवेश में 5000 कार्यकर्ता संपूर्ण दिल्ली की यातायात व्यवस्था को संभालने के लिए प्रत्येक चौराहे पर खड़े नजर आए। यह संभव इसी कारण हुआ कि संघ का सूचना तंत्र व्यक्ति केंद्रित होता है। यहां 'गटनायकÓ जैसे शब्द प्रचलित हैं। जो सामान्य समाज को समझ में नहीं आते। गटनायक का अर्थ होता है 10 कार्यकर्ताओं पर एक नेतृत्वकर्ता, ऐसे अनेक गटनायक मिलकर एक शाखा टोली तैयार होती है। यह सभी शाखा टोली के कार्यकर्ता एक मुख्य शिक्षक के कहे अनुसार कार्यों को संपादित करते हैं। ऐसी अनेक शाखाओं के मुख्य शिक्षक और शाखा कार्यवाह एक नगर की टोली के साथ सहयोगी के रूप में काम करते हैं। यह नगर सामान्यतया 1 जिले का हिस्सा होते हैं, ऐसे अनेक जिले मिलकर एक महानगर अथवा एक विभाग का निर्माण करते हैं। ऐसे अनेक विभागों की टोलियां मिलकर एक प्रांत का हिस्सा होती हैं और अनेक प्रांत मिलकर एक क्षेत्र का निर्माण करते हैं। ऐसे 11 क्षेत्र संपूर्ण भारत में कार्यरत हैं और इस प्रकार यह 11 क्षेत्र अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सहयोगी के रूप में काम करते हैं। अखिल भारतीय स्तर पर संपूर्ण संगठन कार्य सरकार्यवाहजी अर्थात संघ के महासचिव स्तर के एक कार्यकर्ता के नेतृत्व में प्रायोगिक रूप से सम्पन्न होते हैं। इतने बड़े संगठन का प्रत्येक निर्णय परम पूजनीय सरसंघचालकजी की सहमति के बाद ही सम्पन्न होता है। पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय हो सकता है कि संघ का यह सहेक स्नेहिल संपर्क से चलने वाला कार्य किस तरह आकार लेता है? यदि सरसंघचालकजी कोई संदेश भारत के प्रत्येक स्वयंसेवक तक पहुंचाना चाहे तो यह संदेश मात्र कुछ घंटों में ही प्रत्येक कार्यकर्ता तक पहुंचने में सक्षम होता है। इस प्रकार संघ के कार्य को समझना उसकी भाषाशैली को समझ लेने से ही संभव हो सकता है। यह इतना कठिन कार्य भी नहीं है, किंतु दुर्भाग्य से संघ को गाली देने वाले लोग कभी संघ के इन शब्द युग्म और मुहावरों को समझने का प्रयास नहीं करते हैं, क्योंकि इन्हें समझने के लिए संघ की कार्यशैली का हिस्सा बनना होता है और यदि एक बार संघ के कार्यकर्ताओं से किसी व्यक्ति की मित्रता हुई तो उसके बाद वह व्यक्ति संघ के इस मित्रता के दायरे से कभी बाहर नहीं जा पाता। यही कारण है कि संघ में यह कहा जाता है कि 'मैं स्वयंसेवक थाÓ ऐसा कहना संभव ही नहीं है, क्योंकि हम जीवन में यदि एक बार संघ के स्वयंसेवक बने तो उसके बाद हम संघ के दैनंदिन कार्य से जुड़े रहें या ना रहें, किंतु स्वयंसेवक हम मृत्युपर्यंत बने रहते हैं।
विश्व के सबसे बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन में आश्चर्यजनक रूप से न कोई फार्म भरा जाता है और न कोई आईडेंटी कार्ड दिया जाता है, किंतु संघ के संस्कारों को व्यक्ति अपने जीवन में जब उतार लेता है तो वह व्यक्ति उसकी भाषा, उसके आचरण और उसके व्यवहार से ही समाज में अपनी पहचान बनाने लगता है। संघ में ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए एक शब्द युग्म प्रयोग किया जाता है और वह शब्द युग्म होता है - 'देव दुर्लभ कार्यकर्ताÓ। वास्तव में देवताओं को भी जैसे अनन्य सहयोगी सुलभ नहीं हो पाते, वैसे सहज सहयोगी कार्यकर्ता संघ के प्रत्येक कार्यकर्ता को प्राप्त होते हैं। इन कार्यकर्ताओं के अनेक गुण होते हैं, किंतु देव दुर्लभ कार्यकर्ता शब्द को ठीक से समझना है तो केवल इस रूप में समझ लें कि ऐसा कार्यकर्ता संघ कार्य को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानता है। उसके लिए फिर संघ कार्य से बढ़कर कोई दूसरा स्वार्थ, लोभ, मोह हो ही नहीं सकता। यहां तक कि अपने घर परिवार का त्याग करके अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए होम कर देने वाले कार्यकर्ताओं की एक विराट श्रृंखला भी इसी भाव में से तैयार होती है। ऐसे देव दुर्लभ कार्यकर्ताओं के लिए हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं, किंतु केवल एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा।
एक कार्यकर्ता को खंडवा से सरसंघचालकजी द्वारा प्रेषित एक सूचना देकर भेजा गया। उन कार्यकर्ता को कहा गया कि यह सूचना तुरंत टिमरनी में संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता तक पहुंचानी है। वे कार्यकर्ता टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गए, लेकिन जैसे ही ट्रेन हरदा स्टेशन को पार करने लगी, तब साथ के सहयात्री ने उनको बताया कि यह ट्रेन यहां पर रुकती नहीं। उनके लिए सूचना अपने अधिकारी तक तुरंत पहुंचाना इतना अनिवार्य कार्य उस समय था कि उन कार्यकर्ता ने दरवाजे पर पहुंच कर चलती हुई ट्रेन में से छलांग लगा दी। स्वाभाविक रूप से ट्रेन से छलांग लगाने के कारण से घायल भी हुए, किंतु अपने घावों की चिंता किए बगैर पैदल-पैदल ही वहां से अपने इंगित कार्य को सम्पन्न करने के लिए चले गए। वरिष्ठ कार्यकर्ता को वह संदेश दिया। बाद में उनका उपचार भी संभव हुआ और वे अनेक वर्षों तक संघ कार्य भी करते रहे। संभवत: सामान्य व्यक्ति को यह पागलपन लग सकता है, किंतु स्वाभाविक रूप से संगठन कार्य के प्रति अपना सर्वस्व समर्पित कर देने के इसी भाव को प्रत्येक स्वयंसेवक में उत्पन्न करना यह कार्य वही शाखा करती है, जिस शाखा की मजाक तथाकथित विरोधी लोग उड़ाते रहते हैं। वैसे तो संघ की कार्यशैली और उसके मुहावरों तथा शब्द युग्म पर इससे कहीं विस्तृत चर्चा हो सकती है। (समाप्त)