वैश्विक मानचित्र पर चीन की बौने होने की झुंझलाहट
   Date29-Jun-2020

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वि.के. डांगे
दि. 15-16 जून 2020 की रात में 5-6 घंटे तक, लद्दाख में, गलवान नदी की घाटी में जो हुआ, उसकी चर्चा पुन: करना वहां आवश्यक नहीं है, क्योंकि भारतीय व चीनी सेनाओं के बीच जो झड़प हुई, उसका वर्णन समाचार-पत्रों में आ गया है। मूल प्रश्न यह है कि चीन वर्तमान में ऐसा क्यों कर रहा है। यदि इसका उत्तर चाहिए, तो उस उत्तर को चीन के इतिहास में ढूंढना होगा। चीन पर चीनी सम्राटों का एक-छत्र राज्य, अतीत में रहा व साथ में, चीनी सम्राट अतिमहत्वाकांक्षी थे। उन्होंने राज्य विस्तार पर ध्यान देकर विभिन्न सीमांत क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में लाने का प्रयत्न किया। इसका उद्देश्य यह भी था कि बड़े पैमाने पर बाढ़ व अकाल से पीडि़त, चीन की विशाल जनसंख्या हेतु किसी भी तरह से अतिरिक्त भूमि प्राप्त करना-इस इतिहास का वर्धित स्वरूप ही चीन की वर्तमान नीति है। इस तथ्य को पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के ध्यान में अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी ने लाया व चीन से सावधान रहने हेतु चेताया, परंतु नेहरू ने चेतावनी को अनदेखा किया, ऐसा लगता है।
वैसे, गत सदी में भी, चीन की सीमा पर, चीनी सेना की अन्य देशों की सेनाओं के झड़पें हुई हैं। इनमें, चीन-रूस व चीन-वियतनाम सीमाएं मुख्य हैं। जब चीन-रूस सीमा पर 1970 के दशक में झड़पें हुई, तो तब के सोवियत संघ की सेना ने चीनी सेना को पराजित किया-इसी तरह वियतनाम की सेना ने भी, चीनी सेना को उत्तर की ओर हटने को मजबूर किया। चीन के 22 देशों से सीमा विवाद चालू है, ऐसा सूत्रों का कहना है-इसमें, भारत भी एक है। और तो और, सारे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी कर, चीन, दक्षिण चीन सागर पर अपना स्वामित्व कभी नहीं बताया। चीन का भारत से ऐसा व्यवहार क्यों है-इसका स्थायी कारण है, ऐतिहासिक कालीन चीनी विस्तार नीति- इसका एक भाग है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत का प्रभाव कम करना। भारतीय राजनीति में 2004-2024 तक जो ठहराव की स्थिति आई, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में काम करने वाले भाजपा मंत्रिमंडल ने दूर किया व भारतीय विदेश संबंध व अर्थतंत्र को नई दिशा देकर मजबूत बनाया-इसके कारण भारत की वैश्विक छवि दृढ़ होकर ऊंची हुई। भारतीय अर्थतंत्र विश्व का पांचवां बड़ा अर्थतंत्र है व अगले पांच-दस वर्षों में यह दुगना होकर पांच ट्रिलियन डालर (पांच लाख करोड़ डालर का होकर, विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा या इस स्थिति के निकट आएगा। भारत विदेशी पूंजी निवेश हेतु एक भरोसेमंद देश है, यह अब वैश्विक मान्यता बनकर, भारत का वैश्विक राजनीति में कद बढ़ा है- इसका एक प्रमाण, जी-7 समूह की सदस्यता की संभव सदस्यता भी है। इससे चीन भारत से चिढ़ा है, क्योंकि इस समूह में पश्चिम की बड़ी आर्थिक व सैनिक शक्तियां हैं। भारतीय अर्थतंत्र व वैश्विक प्रभाव कछुआ गति से बढ़ रहा है, परंतु चीनी खरगोश उससे इसलिए चिंतित है कि कछुआ गति बढ़ रही है, उसे वाहन में बिठाकर आगे ले जाने वाले, आगे आ रहे हैं (विदेशी पूंजी निवेश), जबकि खरगोश धीरे-धीरे थक रहा है व कोरोना ने उसकी गति कम भी की है व दुनिया की नजरों में वह बदनाम भी हुआ है। (संदर्भ-विश्व स्वास्थ्य संगठन)
इस स्थिति से बचने हेतु चीन, भारत की आर्थिक प्रगति व वैश्विक प्रभाव को घटाने के लिए, भारत को दीर्घावधि के सीमा-संघर्ष में उलझाना चाहता है। भारत-पाक, सीमा पर, कश्मीर में भारत एक दीर्घावधि युद्ध झेल ही रहा है, अब भारत-चीन व भारत-तिब्बत सीमाएं-जो कश्मीर सीमा से लंबी व अधिक दुर्गम है, वहां भी यह सीमा-संघर्ष, लंबा चलकर भारत की आर्थिक गति व वैश्विक प्रभाव को कम करें, यह चीन की मंशा है। चीन ने एक नया मोर्चा, नेपाल का खोला है। डोकलाम प्रकरण में, भूटान द्वारा प्यादेमात खाने पर, चीन ने भारत-नेपाल विवाद, नेपाल को उकसा कर निर्माण किया है। इस तरह कश्मीर, लद्दाख, भारत-तिब्बत, भारत-चीन व भारत-नेपाल सीमा पर चीन ने तनाव निर्माण किया है व वहां, कश्मीर में होने वाली झड़पें हो, ऐसी स्थिति निर्माण करने की तैयारी चीन कर रहा है। आगे उसकी मंशा क्या है, यह समय बताएगा, परंतु चीन, नेपाल को, भारत में भारतीय गोरखा समाज को भारत के विरुद्ध, आंदोलन भड़काने के लिए, उकसा सकता है। विशेष रूप से, भारत को यह सावधानी रखना होगी कि भारतीय सेना के गोरखा सैनिकों में, भारत के विरुद्ध कोई असंतोष न हो। लद्दाख व अन्य मध्य व पूर्वी क्षेत्र में, भारतीय सेना को सतर्क किया गया है। 15-16 जून का चीनी हमला धोखे से रात में किया गया। इसी प्रकार के अन्य हमले भी हो सकते हैं। हवाई हमलों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हिन्द महासागर व द. चीन सागर में भारतीय व चीनी नौसेनाओं के बीच झड़पें हो सकती हैं। इस स्थिति में भारत को क्या करना चाहिए, इसका विचार करे। चूंकि अर्थतंत्र सैनिक तंत्र का आधार है। अत: भारत को चाहिए कि अपना अर्थतंत्र दृढ़ व विस्तृत करे। इस दिशा में केन्द्र व राज्य शासन सक्रिय हैं ही, परंतु मुख्य अड़चन नौकरशाही व लालफीताशाही के कारण है, जो देरी करती है। विदेश सूत्रों से यह कहा गया है कि एक कारखाना बनाने में जितना समय लगाया गया है, उससे अधिक समय उस कारखाने को जमीन, बिजली, पानी, सड़क इत्यादि मिलने में लगता है। फिर नौकरशाही में ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो कारखानों में करोड़ों के आय-व्यय देखकर सोचते हैं- इसमें मुझे क्या मिला? राष्ट्र को क्या मिला, यह सोचन के बजाय वे यही सोचते हैं- यह पम्परा भारत में अंग्रेजों के काल से चल आई है। अधिकारियों का अहम्भाव व तनातनी व विभागों के बीच की तनातनी के कारण कानूनों की दलदल व कागजों के जंगल में, काम व काम करने वाले दोनों ही खो जाते हैं। इस स्थिति को गैर सरकारी संगठनों व विशेष निगरानी दस्तों द्वारा बदलना होगा। हमारी दंड संहिता भी आज इतनी नरम है कि अपराधी व्यक्ति खुले में रहने के बजाय जेल में रहना पसंद करता है। खुले में रहने में श्रम करना पड़ता है, भोजन, दवा, किराया, बिजली, वाहन इत्यादि के लिए खर्च करना पड़ता है, जबकि जेल में रहने पर यह सब मुफ्त में प्राप्त होता है और ऊपर से कोई खास काम नहीं। सश्रम कारावास अब विश्राम कारावास बन गया है। अंग्रेजों के समय, पत्थर तोड़कर गिट्टी बनाना, कोल्हू खींचकर तेल निकालना, नारियल की जटा को पीटकर रेशा निकालना, ऐसे कठिन श्रम बंदियों से करवाए जाते थे। घर से कोई मिलने आने की व्यवस्था थी नहीं। इन सबके कारण अपराधियों के मन में डर रहता था। आज यह सब बंद होकर जेलें आरामगाह बन चुकी हैं। यदि अनुमति दी जाए तो हर बेरोजगार व्यक्ति जेल में रहना पसंद करेगा, ऐसी स्थिति है। हम कम से कम यह ध्यान तो रखें कि पुलिस अदालत व जेल पर होने वाला खर्च, पूरा या आधा इन बंदियों के श्रम में से निकले। अपराधी पर जेल में होने वाला खर्च, निरपराध व कानून मानने वालों द्वारा दिए कर में से हो, यह एक विडम्बना नहीं तो क्या है? शासकीय कोष की यह हानि हमें जल्द से जल्द दूर करना होगी, इस दृष्टि से हमें चीन से काफी कुछ सीखने की मिल सकता है। महिलाओं की समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा। महिलाएं निर्भयता से दफ्तरों, कारखानों, सड़कों व घर में रहकर काम कर सकें, इसलिए हमारी दंड संहिता को संशोधित करना होगा। चीन में महिला के बलात्कार पर फांसी की सजा है, इस कारण महिलाओं का श्रम, वहां सहज प्राप्त होता है। हमारे यहां बलात्कार के इतने प्रकरण व उसके विरुद्ध जनाक्रोश होने पर भी इन प्रकरणों में, दंड संहिता में, मृत्युदंड का कानून हमारे यहां अब तक नहीं बना है। यदि हमें आथिक, सैनिक व कूटनीतिक क्षेत्रों में, चीन के बराबर आना है तो हमें चीन का गहन अध्ययन करके उससे काफी कुछ सीखना होगा। उदाहरण यह कि जब चीन में साम्यवाद व चीन-सोवियत संघ दोस्ती का बोलबाला था, तब भी आर्थिक विकास हेतु चीन ने सोवियत संघ की अंधी नकल न करते हुए मशीनों के बजाय मनुष्य बल पर अपनी लोक निर्माण योजनाएं, रेलमार्ग व सड़कें, बांध व नहरें पूरी की, जबकि हम इन बातों में मशीनों पर अधिक निर्भर रहे, क्योंकि हमें काम पूर्ण करने की जल्दी थी। इन सबके समाज मनोविज्ञान की दृष्टि से मित्र प्रभाव दोनों देशों पर पड़े, जो आज सामने आ रहे हैं।
(शेष अगले अंक में)
यदि कूटनीति व सैनिक नीति का विचार करें तो गत 70 -71 वर्षों (1949-2020) में, चीन की आर्थिक, सैनिक व राजकीय नीति सामने आ चुकी है। उसके मुख्य बिंदु हैं कि सस्ता सामान बेचकर बाजारों पर कब्जा करना, छोटे देशों को बिन ब्याजी या कम ब्याी कर्ज देकर उन पर हावी होकर उनसे सैनिक व संचार/यातायात सुविधा प्राप्त कर के वहां अड्डे बनाना, अपनी सीमाओं का विस्तारक करना व पड़ोसी देशों की सीमा क्षेत्र की जमीनों पर कब्जा करना। आज चीन के कई पड़ोसी देशों से सीमा विवाद चल रहे हैं। जो देश उदाहरण- रूस व वियतनाम, दबंगपन से चीन को जवाब देते हैं उनसे चीन दूर रहता है परंतु भारत जैसे देश जो धैर्यपूर्वक, शांति, मैत्री व सौहाद्र्र की बात करते हैं उन पर चीन हर हालत में आर्थिक व सैनिक दबाव बनाए रखता है।
इस स्थिति में भारत ने यह रणनीति अपनाना चाहिए कि चीन पर हमारी आर्थिक निर्भरता हम कम करें। ऐसा नहीं है कि चीन जो सस्ता सामान हमें बेचता है वह भारत स्वयं निर्माण नहीं कर सकता। आखिर चीनी सामान के साथ चीन से भारत तक सामान लाने का ढुलाई खर्च, तट कर व अन्य खर्च भी शामिल होते हैं फिर भी अगर चीनी माल सस्ता है, तो भारत इससे भी सस्ता माल, भारत में ही व भारतीयों के लिए तैयार कर सकता है, बस जरुरत है कागजों व कानूनों का आधार लेकर अड़ंगे लगाने वाली दफ्तरशाही लालफीताशाही से निपटने व श्रम कानूनों को सरल बनाने की। तब तक हम चीन के बजाय, इलेक्ट्रानिक व कम्प्यूटर सामान, जापान, तैवान व द. कोरिया से क्रय कर अपना काम चला सकते हैं।