बौद्धिकता का हृास करती उच्छृंखल कल्पनाएं
   Date29-Jun-2020

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धर्मधारा
बु द्धिमान होने का अर्थ कुतर्क करना नहीं है। बुद्धि तीन तत्वों पर आधारित है-(1) विश्लेषण, (2) विचार और (3) समझदारी। इन तीनों के संयोग-सम्मिश्रण को ही बुद्धि की संज्ञा दी जाती है। बुद्धिमान वही है, जो इन तीनों का सही एवं समुचित उपयोग करना जाने, समझे और सीखे। बौद्धिक क्षमता इन्हीं तीन चीजों की सार्थक उपयोगिता पर निर्भर करती है। इस प्रक्रिया के संचालन से निर्णय एवं दूरदृष्टि का विकास होता है और यही विकास किसी की बौद्धिक क्षमता की ओर संकेत करता है कि यह सच्चे अर्थों में बुद्धिमान है।
बुद्धि के इन तीनों तत्वों में पहला है-विश्लेषण। विश्लेषण उपलब्ध परिस्थितियों का किया जाता है, जैसे कि आज जो हमारे पास है, वह कितना उपयोगी है। परिस्थितियाँ अनकल हैं या प्रतिकल और इन परिस्थितियों में हमारे पास ऐसा क्या है, जिसके आधार पर हम इन परिस्थितियों से पार पा सकें। अगर हमारी परिस्थिति ठीक नहीं है तो उस समय में किए गए कार्य की सफलता संदिग्ध है। यदि कोई हमारे विरुद्ध परिस्थिति का लाभ उठाकर हमें पथ से विचलित करने का प्रयत्न करता है तो हमें शांत रहकर इसका सामना करना चाहिए, न कि उससे उलझना चाहिए। जूझने के लिए परिस्थिति की अनुकूलता का इंतजार करना चाहिए। इससे परिस्थिति विश्लेषण कर सही दिशा तय करने में मदद मिलती है।
बुद्धि का दूसरा तत्व है-विचार। विचार कल्पनाओं को सँवारने, उन्हें व्यवस्थित करने एवं दिशा देने का नाम है। कल्पनाएँ अनर्गल उठती रहती हैं। कुछ भी कल्पनाएँ करना और उन पर खुश हो लेना बुद्धिहीनता है। अगर हम कल्पना करते हैं कि हम मंगल ग्रह पर पहुँच गए हैं और इस कल्पना को हम यथार्थ मान बैठें तो इसका परिणाम और परिणति क्या होगी? कल्पनाओं को सही दिशा में ले जाने का कार्य विचार करना है। विचार, कल्पनाओं की अनियंत्रित उड़ान को नियंत्रित करता है और उसे सही दिशा में ले जाता है। सार्थक कल्पनाओं का होना एवं उन कल्पनाओं को उचित दिशा की ओर मोड़ देना ही बौद्धिक क्षमता है। अन्यथा अनियंत्रित एवं उच्छृखल कल्पनाओं से बौद्धिक क्षमताओं का असीमित ह्रास होता है।
समझदारी-बौद्धिक क्षमता का तीसरा एवं अंतिम महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। समझदारी से औचित्य और अनौचित्य में फरक किया जाता है, उचित एवं अनुचित के बीच विभेद किया जाता है। सच और झूठ की पहचान इसी से की जाती है। यदि हम झूठ को सच मानकर उसका बचाव करते हैं तो यह कितना अनर्थकारी सिद्ध होगा कहा नहीं जा सकता है; क्योंकि झूठ तो कभी सच हो ही नहीं सकता है। जब झूठ सच बनकर सामने आता है तो भ्रम पैदा होता है, संशय और संदेह यहीं से जन्म लेते हैं। इसके अलावा सच को सच नहीं मानकर उसे झूठ मान लेना भी जीवन में भारी अनर्थ पैदा करता है। इससे हम किसी सार्थक कार्य को करने में सर्वथा अक्षम होते हैं। सही-गलत् की पहचान केवल समझदारी के माध्यम से ही संभव है।