बाजार छिनने का भय ही चीन को सीधी राह पर लाएगा...
   Date28-Jun-2020

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
ए क तरफ पूरा विश्व चीन के पैदा किए भस्मासुररूपी राक्षस यानी घातक नोवल कोरोना वायरस से दो-चार हो रहा है...विकासशील ही नहीं..,विकसित देशों की अर्थव्यवस्था को भी कोरोना ने रसातल में ले जाकर वैश्विक आर्थिक संकट निर्मित कर दिया है...तो दूसरी तरफ जमीन का भूखा विस्तारवादी खुराफाती चीन अपनी हिंसक आक्रामकता की पराकाष्ठा को गलवान घाटी के जरिए भारत के खिलाफ पाकिस्तान-नेपाल का घृणित गठजोड़ बनाने के मंसूबे स्पष्ट कर चुका है...चीन-पाकिस्तान, नेपाल के घृणित मंसूबों का असर अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजनीतिक, कूटनीतिक, सामरिक या कहें कि परराष्ट्र नीति के मामले में अनेक नए समीकरणों का संकेत कर रहा है...लेकिन हर किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि बाजार तलाशता चीन अर्थात ड्रैगन ऐसा भूखा जिन्न है..,जिसकी आत्मा और प्राण 'बाजाररूपी तोते में ही कैद है...Ó बाजार के लिए वह कब दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बना ले.., अनुमान लगाना आसान नहीं है..? चीन के खिलाफ अमेरिका का रुख बदलना मायने रखता है..,वैसे तो पूरा यूरोप चीन के खिलाफ खड़ा होता नजर आ रहा है..,क्योंकि कोरोना के कारण इटली से लेकर जापान, रूस, ब्राजील, फ्रांस यहां तक कि अरब देशों ने भी चीन के घृणित बाजारू खेल को देख-समझ लिया है...अमेरिका ने अपने यूरोप में सबसे बड़े देश 52,000 में से 25,000 सैनिकों को एशिया में लगाने की तैयारी शुरू करते हुए चीन को घेरने की रणनीतिक जमीन तैयार कर ली है...क्योंकि जर्मनी से सेना बुलाई जा चुकी है...
भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया और दक्षिणी चीन सागर में चीन की कब्जाधारी नीतियां जगजाहिर हो चुकी है...तिब्बत पर बलात् आक्रमण कर उसे गुलाम बनाना हो या फिर हांगकांग में दमनचक्र चलाने का वर्षों से जारी खेल चीन के वास्तविक चाल-चरित्र और चेहरे को उजागर करते हैं...अपने खिलाफ उठी आवाज को चीन तानाशाही जूतों के तले कैसे रौंदता है...यह हमने हांगकांग में देखा है या फिर चीन आर्थिक रूप से गुलाम बनाकर पाकिस्तान, नेपाल जैसे देशों को अपने पक्ष में भौंकने के लिए कैसे विवश कर देता है...यह भी हम देख चुके हैं...पाकिस्तान ने चीन की मदद से ही चार एयरपोर्ट, बंदरगाह और 350 से अधिक बंकर बनाए...नेपाल भी चीन की आर्थिक मदद से अपनी सीमा व सेना को गिरवी रखने के जाल में फंस चुका है...इन सबके बीच अगर गलवान घाटी से चीन अपनी वैश्विक चौधराहट का मुगालता पालकर ताजा अडिय़ल रुख बनाए रखता है तो भारत के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मंच से चीन को करारा सबक सिखाने की जरूरत बहुत गंभीरता से महसूस होने लगी है...चीन के बाजार से विश्व के अनेक देशों का मोहभंग होने लगा है..,क्योंकि चीन विश्वास के योग्य नहीं है...
पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन के बीच जो सीमा रेखा दीवार यानी वास्वतिक नियंत्रण रेखा (एलएसी) वह 1962 में चीन द्वारा खेली गई खूनी जंग का वह घाव है, जो रह-रहकर रिस रहा है...उस समय की चीनी धोखेबाजी एवं भारतीय नेतृत्व का अति आत्मविश्वास भारत के लिए चीनी नासूर के रूप में आएदिन समस्याएं खड़ी करता रहा है...पूरा लद्दाख क्षेत्र पर्वत श्रंृखलाओं से घिरा हुआ एक ऐसी भूल-भुलैया है..,जहां न तो स्पष्ट रूप से कोई सीमा रेखा है, न ही सीमा के करीब कोई पोस्ट...इसी का बेजा फायदा उठाकर आएदिन चीन हर कहीं और हर जगह अपने तंबू गाड़कर अधिकार जताने का दुस्साहस करता रहता है...भारत-चीन के बीच 22 बार सीमा विवाद मामले पर बातचीत हुई...लेकिन नतीजा शून्य ही रहा है...2013 में डेमचोक, चुमार और दौलतबेग ओल्डी (डीबीओ) में चीन गलवान की भांति घुसपैठ का दुस्साहस कर चुका है...गलवान घाटी ही नहीं, हॉट स्प्रिंग्स, पैंगोंग झील, रजांगला, डेमचोक और दौलतबेग ओल्डी के साथ ही अब देपसांग में भी चीनी अतिक्रमण के खतरनाक मंसूबे जगजाहिर हो चुके हैं...जबकि भारत ने तो 1954 में ही अपना अधिकृत सीमा नक्शा जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा यह बताती है कि अक्साई चिन भारत का हिस्सा है...यही नहीं, अरुणाचल से लेकर पूरे लेह लद्दाख और दक्षिणी चीन सागर भी इसी सीमा रेखा के अंतर्गत आते हैं...लेकिन चीन हर बार नक्शों, साक्ष्यों, सबूतों को नकारते हुए अपना कब्जा नए सिरे से और मनमर्जी से तय करने का खेल खेलता रहा है...गलवान घाटी का हालिया घटनाक्रम चीन के दुस्साहस का चरम बिंदु का हिस्सा माना जा सकता है...इसमें कोई दो राय नहीं है कि गलवान घाटी की चीनी हिंसा के बाद भारत ने सभी मोर्चों पर करारा जवाब चीन को दिया है...सेना अपनी सामरिक तैयारी, युद्ध लडऩे के कौशल और अब तक पाकिस्तान, चीन के साथ अनेक निर्णायक युद्ध लडऩे, पाकिस्तान के साथ आएदिन आतंकी हमलों का जवाब देने में अभ्यस्त भारतीय सेना के तीनों अंग चीन के हर वार का जवाब देने को तैयार हैं...सरकार के स्तर पर रणनीतिक, कूटनीतिक रूप से और अंतरराष्ट्रीय दबावों व समझौतों के साथ ही संबंधों के आधार पर चीन की नकेल कसी जा रही है...
जहां तक विपक्ष की बात करें तो वर्तमान दौर में उसका पूरा रुख चीन को अप्रत्यक्ष सहायता करने जैसा दिख रहा है...विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी का, ऐसे में अगर कांग्रेस पर यह आरोप लग रहे हैं कि वह चीन का एजेंडा सेट कर रही है तो इसमें कुछ गलत नहीं है..,क्योंकि वर्ष 2008 में संप्रग-1 के समय कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के बीच जो समझौता हुआ, जिसमें उच्चस्तरीय सूचना और सहयोग के आदान-प्रदान को लेकर सहमति बनी...क्या वह चीन के साथ अपने हाथ कटाने जैसा नहीं था...इसकी जांच होना चाहिए..,क्या चीन के उसी चक्रव्यूह में फंसकर सोनिया-राहुल और कांग्रेस राष्ट्रीय संकट में भी चीन की भाषा बोलने को मजबूर हैं...कारोबार की दृष्टि से सरकार ने गलवान घाटी के बाद 'बायकाट चीनÓ यानी चीन के बाजार-कारोबार के खुले बहिष्कार की पहल कर दी...जिसमें चीनी उत्पादों के बहिष्कार के साथ केंद्र सरकार द्वारा बीएसएनएल, एमटीएनएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों को चीनी उत्पाद उपयोग न करने और हर तरह के निर्माण व तकनीकी अनुबंधों को समाप्त करने की पहल हो चुकी है...कहने का तात्पर्य है कि सरकार ने हर मोर्चे पर चीन पर नकेल कसना शुरू कर दिया है..,क्योंकि वह अपने बाजारहित पर पडऩे वाली करारी चोट के बाद ही सीधे राह आने का नजरिया रखता है...
अब चीन को करारा सबक सिखाने का वास्तविक दायित्व भारत के उन 130 करोड़ देशवासियों का है...जो लंबे समय से मेड इन चाइना के मोहपाश में फंसकर भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करते हुए चीन को आर्थिक मदद कर गुर्राने का राशन मुहैया कराते हैं...इसलिए हमें पतंग का चीनी मांझा, चीनी मिट्टी की मूर्तियां, बर्तन, गुलाल, पिचकारी, दीपावली की झालर, खिलौने जैसी गैर जरूरी चीजों की आयात प्रवृत्ति को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर चीनी उत्पाद के बहिष्कार को पहले पायदान पर रखना होगा...दूसरी तरफ जरूरी चीजों में मोबाइल फोन, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रानिक उत्पादों के कलपुर्जों को भारत में किस तरह से तेजी से निर्मित करने की तकनीक व कौशल विकसित किया जाए या फिर अति आवश्यकता पर चीन से अन्यत्र देश से आयात किया जाए...इसकी रूपरेखा तैयार करनी होगी..,क्योंकि आज भी चीन पर हमारी व्यापारिक निर्भरता बहुत ज्यादा है...दोनों देशों के बीच गत वर्ष लगभग 92 अरब डॉलर का आपसी कारोबार हुआ...जिसमें हमने चीन से आयात ज्यादा किया..,निर्यात कम...गैर जरूरी चीजों का चीनी बाजार खत्म करके हम चीन को चार-पांच बिलियन डॉलर का नुकसान पहुंचाकर यह संकेत दे सकते हैं कि उसके बाजाररूपी तोते के प्राण भारतीय उपभोक्ताओं के हाथों में हैं...