एक दवा को मंजूरी , दूसरी को ना...
   Date27-Jun-2020

vishesh lekh_1  
भारत में कोरोना संक्रमण के खिलाफ एक दवा को मंजूरी दी गई तो दूसरी दवा के खिलाफ आयुष मंत्रालय की तरफ से प्रतिबंध के स्वर सुनाई दिए...यह दोनों ही स्थितियां किसी विरोधाभास को निर्मित करने के लिए पर्याप्त है...जब कोरोना काल में देश में फार्मा कंपनी द्वारा तैयार दवाइयों को कोरोना के लिए शर्तियां रूप में उपचार हेतु उपयुक्त माना जा रहा है तो पतंजलि द्वारा निर्मित कोरोनिल टेबलेट को अनुमति न देना क्या दर्शाता है..? क्या सरकार कम्युनिस्टों एवं वामपंथी विचारधारा के लोगों के बयानों से विचलित होकर आयुष मंत्रालय के माध्यम से बाबा रामदेव की राष्ट्र सेवा कार्य में मजबूरी में रोड़ा बनना चाहती है..? इसमें कोई दो राय नहीं है कि अभी तक पतंजलि की आयुर्वेदिक से लेकर एलोपैथिक रूप में जितनी भी दवाइयां कोरोना उपचार हेतु सामने आ रही है...उन्हें न तो सिरे से नकारा जा सकता है...और न ही शत-प्रतिशत मान्य किया जा सकता है...लेकिन उपचार के रूप में हर तरह की दवाई की अनुमति जरूरी है...और इसमें किसी भी तरह का भेदभाव या दबाव उचित नहीं है...ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव के आयुर्वेदिक प्रकल्पों से घबराए फार्मा लॉबी का यह एक षड्यंत्र है जिसका हिस्सा बनने से आयुष मंत्रालय को बचना चाहिए..? इसमें कोई दो राय नहीं है कि कोरोना के संकट में हर कोई उपचार को ही प्राथमिकता दे रहा है...अगर ऐसे में बहुसंख्यक आबादी को आयुर्वेद के जरिये बाबा रामदेव भले ही उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की राह कोरोनिल टेबलेट के माध्यम से दिखा रहे है तो इसमें किसी तरह की कोई बुराई नहीं है और न ही किसी को कोई आपत्ति होना चाहिए...यह दवा कोरोना के प्रारंभिक चरण में कारगर हो सकती है और कोरोना मामलों को गंभीर अवस्था में जाने से बचा सकती है...आगामी दो महीने में इस दवा के कारगर होने के संबंध में पुख्ता आंकड़े उपलब्ध हो जाएंगे... चूंकि यह दवा बहुत सस्ती है.., इसका प्रयोग आसान है.., इसलिए भी इसका कारगर होना भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश और पूरी दुनिया के लिए बड़ी बात होगी...भारत में कोरोना संक्रमित कुल मामलों जो कि करीब 5 लाख होने वाले हैं...उनमें से 95 प्रतिशत से ज्यादा मामले हल्के या मध्यम प्रकार के हैं और इनमें भी जिन मामलों में लक्षण स्पष्ट हैं.., वहां यह दवा यदि रामबाण सिद्ध हो जाए.., तो यह भारत के लिए बड़ी सफलता होगी...खास बात यह है कि यह दवा एंटीवायरल है और इन दिनों दुनिया के वैज्ञानिक कोरोना की सीधी दवा या वैक्सीन की बजाय एंटीवायरल दवा बनाने में जुटने लगे हैं...कोरोना से लडऩे में ऐसी और भी दवाओं की जरूरत पड़ेगी...संभव है, विभिन्न चरणों और विभिन्न लक्षणों के लिए अलग-अलग एंटीवायरल दवाएं बनें...लेकिन यह तो मानना ही होगा कि कोई भी कोरोना की सोलह आना पुख्ता दवा नहीं है..,अभी भी शारीरिक दूरी ही सबसे उपयुक्त उपाय है...लेकिन आयुर्वेद के प्रयोगों को भी प्राथमिकता से देश में लागू करना होगा...
दृष्टिकोण
कांग्रेस और चंदे का धंधा...
कांग्रेस अपने आर्थिक स्वार्थ के लिए किस तरह से सरकारी ट्रस्टों यहां तक कि सरकारी कोष में आए धन की हेराफेरी करती रही है...इसके अनेकों सबूत, साक्ष्य और घपले-घोटाले हमारे सामने रह-रहकर सामने आते रहे हैं...इस मामले में जब-जब कांग्रेस की केंद्र में सरकारें रही है उनके काबिना मंत्री इसी तरह की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के कारण न केवल पद गंवाते रहे है..,बल्कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा है...इस मामले में कांग्रेस का चंदे का धंधा जगजाहिर है कि वह उसे बड़े ही शातिरा अंदाज में या कहे कि बहुत ही हाथ की सफाई दिखाते हुए षड्यंत्र रचती है..,लेकिन कहीं न कहीं उसका भांडाफोड़ हो ही जाता है...हेराल्ड मामले में किस तरह से शेयरधारकों और ट्रस्ट को सरकारी पैसा उपलब्ध कराकर उसे निजी तौर पर उपयोग किया गया...यह सबको पता है इस मामले में सोनिया-राहुल जमानत पर चल रहे है...अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा एवं केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर चीन से राजीव गांधी फाउण्डेशन के खाते में 2005-06 में तीन लाख डॉलर (करीब 2 करोड़ 26 लाख) जो चंदारूपी दान यानी डोनेशन प्राप्त किया है...उसकी शर्ते क्या रही है..? क्योंकि किसी पड़ोसी दुश्मन देश की राजनीतिक पार्टी या फिर उसकी सरकार से कोई राजनीतिक दल अपने फाउण्डेशन के लिए या संगठन के लिए डोनेशन कैसे ले सकता है..? और अगर लेता है तो उसके ऐवज में उनका (चीन) का किस तरह से हित संवर्धन किया गया है...यानी डोनेशन पाने की कौन-सी शर्तों का पालन किया गया..? यह कांग्रेस को बताना चाहिए...क्योंकि चंदे के धंधे में कांग्रेस का स्याह चरित्र सबको पता है...चीन के ताजा घटनाक्रम बार-बार सोनिया-राहुल पर चीन के पक्ष में खड़ा होना दाल में कुछ काला होने का संकेत कर रहा है...