चीन के खिलाफ कूटनीतिक व सामरिक तैयारी से बढऩा जरूरी
   Date27-Jun-2020

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डॉ. सत्येन्द्र किशोर मिश्र
भारत एवं चीन सीमा का उबाल इक्कीसवीं सदी एशिया की होने की संकल्पना को चुनौती दे रहा है। भारत-चीन दोस्ती की कोशिशें चीन की चालबाजी तथा धूर्तता की भेंट चढ़ चुकी हैं। चीन की विस्तारवादी तथा आदतन धोखेबाजी के कारण वर्षों बाद एलएसी पर दोनों देशों की सेनाएं मोर्चाबन्दी बढ़ गई हैं। विश्व के प्रति भाईचारे, शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व तथा वसुधैव कुटुम्बकम् का भारतीय नजरिया बेमानी साबित हो रहा है। हमेशा से रोटी-बेटी का संबंध रखने वाले पड़ोसी देश भी चीन की कुटिल चाल में आकर आंख तरेर रहे हैं। भारत की यह घेराबन्दी तात्कालिक घटनाओं के कारण शायद नहीं है। इसके पीछे चीन की गहरी साजिश के साथ ही भारत की बार-बार उस पर भरोसा जताने की जिद है।
उभरती पड़ोसी शक्तियों में प्रतिस्पद्र्धा स्वाभाविक है, यह गलत भी नहीं है। गलत है चीन का मुख में राम बगल में छुरी जैसा व्यवहार। कम्युनिस्ट चीन अपने जन्म से ही पड़ोसी देशों को हड़पने की विस्तारवादी हसरतों को अंजाम देता रहा है। तिब्बत, सिनजियांग, मंचूरिया को हजम कर चुका है। उसकी हसरते इसके भी आगे है। तिब्बत के निर्वासित मुखिया लोबसंग सांगेय ने चीन की इसी हसरत से सतर्क करते हैं कि वह तिब्बत को हथेली और लद्दाख, नेपाल, भूटान, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को पांच अंगुलियों के रूप में देखते हुए अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा रखता है। चीन की यह दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा दक्षिण-पूर्वी एशिया विशेषकर भारत के लिए सजग रहने का विषय है। इसके लिए चीन लम्बी साजिश करता दिख भी रहा है।
चीन ने डब्ल्यूटीओ, एशियान जैसे संगठनों के बहुपक्षीय चार्टर्स तथा अनेक देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों की कमियों का चालबाजी से उपयोग कर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की। अनेक देशों में आर्थिक मदद, कर्ज तथा निवेश के माध्यम से भीतर तक अपनी पैठ मजबूत कर ली है। आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ ही पड़ोसी देशों की संप्रभुता के लिए खतरा बन रहा है। हलांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के रवैये पर असन्तोष है, परन्तु संगठित विरोध अभी तक दिखा नहीं है। चीन भारत को शुरू से ही दुश्मन मानता रहा है। वह भारत को अपने वैश्विक महाशक्ति बनने की हसरत में बाधा समझता है। इस समय जब दुनिया कोरोना महामारी से परेशान है, चीन को इस संकट में ही मौका दिख रहा है। जिनसे भी उसे आर्थिक तथा सामरिक चुनौती का अन्देशा है, उन सभी के साथ मोर्चा खोल रखा है।
चीन ने सोची समझी चाल के तहत एलएसी पर शान्ति और विश्वास कायम करने के वादे तथा प्रोटोकाल की धता बताई है। हाल के वर्षों में पूर्वी लद्दाख के चुसुल तथा अरुणाचल प्रदेश के डोकलाम में सैनिक टकराव साजिश का पूर्व परीक्षण था। गलवान घाटी में चीन ने सीमा के झगड़ों को शान्तिपूर्वक निपटाने के प्रोटोकाल की हत्या कर दी। एलएसी पर साजिश चीन के अहंकार तथा खतरनाक मंसूबों की नुमाईश है। एलएसी पर शहीद भारतीय सैनिकों के खून से चीन द्वारा खींची गई लाल रेखा एवं गलवान घाटी पर बनावटी दावा वस्तुत: चीन के असली मन्सूबों को बेनकाब कर दिया। भारत-चीन संबंध साठ साल पीछे जाने से भारत को घाव तो मिला परन्तु साथ ही चीन के असली चेहरे को समझने की चेतावनी भी मिली।
चीन अहंकार में खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने लगा है। भारत को दुश्मन देश तथा अपनी दबंगई में बाधा मानता है। नि:संदेह चीन की आर्थिक तथा सामरिक ताकत बढ़ी है। वह दुनिया में अपनी बादशाहत देखना चाह भी रहा है। एशिया, अफ्रीका तथा अमेरिका महाद्वीप के अनेक देशों को भीतर आर्थिक एवं तकनीक मदद के रूप में भीतर तक घुसपैठ बना चुका है। यूरोशिया तथा अफ्रीका समेत दुनिया की आधे से अधिक आबादी को प्रभावित करने हेतु अपनी महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना के माध्यम से चीन ने अपने मन्सूबों को पूरा करने की कोशिश भी कर चुका है। पड़ोसी देशों सहित आस्ट्रेलिया, जापान, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, रूस जैसे देशों पर धौंस दिखाता रहता है। अमेरिका जैसी महाशक्तियों से प्रतिद्वन्दिता रख रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक गणराज्य है वहीं चीन तानाशाही एवं निरंकुश देश है। एक पड़ोसी देश के रूप में भारत की प्रगति हमेशा से चीन की नफरत का विषय है। उसकी समझ है कि भारत चीन की अपेक्षा कभी भी ताकतवर नहीं हो सकता। परन्तु भारत की लोकप्रियता एवं विश्वसनीयता दुनिया भरत में निश्चित ही बढऩे की राह पर है। भारत में वैश्विक स्तर पर चीन से आगे जाने की संभावनाएं भी हैं। भारत की संभावनाओं को चीन हमेशा खतरा मानता है। यही चीन की महत्वाकांक्षाओं का पीछा भी करती हैं।
चीन के गुरूर के कारण भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के प्रति उसका नजरिया बदला है। उभरते भारत से तो उसे परेशानी थी ही, भारत तथा अमेरिका का करीब आना चीन की चिन्ता बढ़ा रहा है। भारत को अपनी बादशाहत के रास्ते में चुनौती मान रहा है। चीन महाशक्ति बनने एवं अमेरिका से प्रतिद्वन्दिता में भारत को रास्ते का रोड़ा समझता है। वैश्विक पटल पर भारत के बढ़ते रूतबे ने चीन को बेचैन कर दिया है। वह अमेरिका को नजरअंदाज कर सकता है और आगे बढ़ सकता है। लेकिन चैतीस सौ अ_ासी किलोमीटर की सीमा वाले पड़ोसी देश का बढ़ता रूतबा चीन के लिए नफरत का सबब है। साथ ही एलएसी पर पीएलए की साजिशों से सतर्क एवं सजग भारत, चीन के लिए चुनौती है। चीन फौरी तौर पर भारत को अपना खौफ दिखाना चाहता है। चीन का तिलिस्म भी है कि बहुतेरे उसकी ताकत उसकी औकात से भी बहुत ज्यादा मानते हैं।
भारत को विश्वास है कि अमेरिका तथा अन्य वैश्विक ताकतें विश्वशक्ति बनने में उसकी मददगार होंगी। चीन भारत के पड़ोसियों को अपने तिलिस्म में उलझाकर घेराबन्दी की साजिश में लिप्त है। लेकिन भारत को भी इस भ्रम में नहीं रहना होगा कि चीन कभी भारत का हितैषी हो सकता है। कतिपय कारणों से भारत का अपने सबसे पुराने तथा भरोसेमन्द साथी रूस से थोड़ा फासला अवश्य है। फिर भी भारत को आगे बढ़कर चीन के विरूद्ध बन रहे वैश्विक माहौल में चीन की कूटनीतिक एवं सामरिक घेराबन्दी में भूमिका निभानी चाहिए। चीन से लगने वाले सत्रह सीमावर्ती देशों में भी मौके तलाशने की जरूरत है। हांगकांग, ताईवान तथा तिब्बत के मुद्दे पर भी खुलकर सामने आना ही होगा।
प्रधानमंत्री का बयान कि देश की संप्रभुता एवं अखण्डता सर्वोच्च है, भारत को कमतर समझने का भ्रम किसी को भी नहीं होना चाहिए। भारत को चीन के तिलिस्म से बाहर आना चाहिए कि चीन के साथ मैत्री, भाईचारा एवं विश्वास का संबंध निभाया जा सकता है। चीन को इल्म नहीं है कि इसके लिए उसे कितनी कीमत चुकानी पड़ सकती है। चीन शायद यह देखने में भी नाकाम है कि आज भारत बहुत बदल चुका है। भारत को अपनी संप्रभुता तथा अखण्डता के सम्मान के लिए कूटनीतिक, राजनयिक एवं सामरिक तौर पर मजबूती से आगे बढऩा ही होगा।