खौफ, संघर्ष और यातनाएं...
   Date26-Jun-2020

vishesh lekh_1  
भारतीय जनता-जनार्दन को एक ऐसे अदृश्य खौफ में जीने को मजबूर किया गया, जिसकी उन्होंने लोकतांत्रिक भारत में कभी कल्पना नहीं की थी... राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों व मीडिया वर्ग को ऐसे संघर्ष की अगुवाई करना पड़ी, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं था और राष्ट्रनिष्ठ लोगों को जेलों में ठूंसकर इस तरह की भयावह यातनाएं दी गई, जिसका उन्हें कभी विचार भी नहीं आया था कि कोई लोकतांत्रिक सरकार रातों-रात तानाशाही रवैया अपनाते हुए पूरे लोकतंत्र का गला घोटकर प्रदर्शनकारियों पर राजनीतिक कुमंशा से कहर बरपाने की पराकाष्ठा को पार कर देगी... जी हाँ, आज से 45 वर्ष पूर्व ऐसा ही दृश्य भारत ने गली-गली, शहर-शहर, गाँव-गाँव, यहां तक कि जेलों से लेकर ट्रेनों और थानों तक में आम होता देखा था... हर किसी के दिलो-दिमाग में इस तरह का तानाशाही सत्ता ने खौफ निर्मित कर दिया था कि वह घूट-घूटकर जीते हुए यह सोचने पर मजबूर थे कि न जाने कब उन्हें बिना किसी अपराध के जेल में डाल दिया जाएगा और बाद में परिवारजनों को जो प्रताडऩा दी जाएगी, वह अलग... क्योंकि भारत में अपने परिवार का राजनीतिक अस्तित्व खत्म होने से भयभीत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्णत: लोकतंत्र विरोधी और तानाशाही रवैया अपनाते हुए संवैधानिक मर्यादाओं को लहूलुहान किया था... 25 जून 1975 की अद्र्ध रात्रि में देश में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की हत्या की गई थी.., लेकिन इसकी अधिकृत घोषणा 26 जून 1975 को सुबह 6.00 बजे केबिनेट की बैठक बुलाकर 8 बजे इंदिरा गांधी ने घोषणा की... इस 19 माह के आंतरिक आपातकाल ने देश की राजनीति एवं सत्ता के समीकरणों, यहां तक कि सत्ता पर परिवार के एकाधिकार और उन तमाम तानाशाही राजनीतिक मंसूबों की पोल खोलकर रख दी थी, जिनके जरिये लोकतंत्र को आंतरिक आपातकाल की भट्टी में झोंकने का दुस्साहस इंदिरा गांधी ने किया था... 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच इन 19 माह में स्वदेश जैसे समाचार पत्र के पूरे संपादकीय विभाग को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया... जिस संचार माध्यम ने सत्ता के खिलाफ बोलने का साहस दिखाया, उसके मुख पर या तो तानाशाही इंदिरा ने ताला लगवाकर उसे बंद करवा दिया या फिर भांति-भांति की यातनाएं देकर पूरे स्टॉफ को सरकार की हाँ में हाँ मिलाने में मजबूर किया गया... इससे भी क्रूर व्यवहार तो उन संघ पदाधिकारियों एवं स्वयंसेवकों के साथ किया गया, जिन्होंने आंतरिक आपातकाल का भूमिगत रहकर न केवल जमकर विरोध किया, बल्कि जेलों में भी बंद रहकर इस तानाशाही रवैये की खुली भत्र्सना की... राष्ट्रनिष्ठों के ऐसे व्यवहार से चिड़कर इंदिरा की चाण्डाल चौकड़ी ने जेलों में भी स्वयंसेवकों, पदाधिकारियों और विपक्ष के जिम्मेदार लोगों को भांति-भांति से प्रताडि़त करने का कोई मौका नहीं गवाया... खौफ, संघर्ष और यातनाओं का यह दौर उस समय खत्म हुआ, जब 1977 में लोकसभा चुनाव में इंदिरा और उनके बेटे संजय दोनों न केवल चुनाव हारे, बल्कि जनता-जनार्दन ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया...