भारतीय राजनीति के चीरहरण का काला अध्याय 'आपातकालÓ
   Date26-Jun-2020

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रमेश गुप्ता
26 जून 1975 की बात है। भुवन भास्कर भगवान सूर्य पूर्व दिशा में अवतरित होते जा रहे थे। वृक्षों पर पक्षियों की चहचहाट व पत्तों की खडख़ड़ाहट से वातावरण गुंजित हो रहा था। हॉकर समाचार-पत्रों को डालकर जा चुके थे। उठने की बेला प्रारंभ हो चुकी थी। उठकर जैसे ही समाचार पत्रों पर दृष्टि गई पाठकों की आँखें फटी की फटी रह गई। देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया था। जब टेलीविजन तथा रेडियो खोले गए तो समाचार वाचक चिल्ला-चिल्लाकर घोषणा कर रहे थे, देश भारी मुसीबत में चल रहा था, विपक्षी दल देश को आंतरिक विद्रोह में झोंकने की तैयारी कर रहे थे। अत: राष्ट्रपति को देश में आपातकाल घोषित करना पड़ा। यह सुनकर सम्पूर्ण देश सुन्न रह गया था। 25 जून की मध्य रात्रि को देश के विपक्षी नेताओं को, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वयोवृद्ध श्री जयप्रकाश नारायण, श्री मोरारजी देसाई, श्री अटलजी, आडवाणीजी व श्यामनन्दन मिश्रा के साथ-साथ श्री राजनारायण कांग्रेस के ही युवा तुर्क श्री चन्द्रशेखर, श्री कृष्णकान्त और श्री रामधन को कारागार में डाल दिया गया था। इसी मध्य रात्रि को देशभर से सैकड़ों संघ के वरिष्ठ अधिकारियों को भी उठाकर गिरफ्तार कर लिया गया था। कांग्रेस विरोधी समाचार-पत्रों की बिजली काट दी गई, जिससे वे प्रकाशित ही नहीं हो सके। इंदिरा सरकार एक के पश्चात एक कठोर कदम उठाकर देश में अराजकता, अव्यवस्था व अत्याचार करने को उतारू हो गई थी। = प्रेस की स्वतंत्रता हर ली गई और उस पर सेंसरशिप लाद दी गई। = राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ-साथ अन्य 26 संगठनों पर पाबंदी लगा दी गई। अन्य संगठनों को तो नाममात्र के लिए घसीटा गया था, इसमें प्रमुख निशाना संघ ही था। सरसंघचालक मा. श्री बालासाहेब देवरस एवं देशभर के संघचालक, जिला व तहसील कार्यवाहों के साथ-साथ असंख्य सक्रिय स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर जेल में भेज दिया गया। = संविधान में अनेक अवांछनीय संशोधन कर दिए गए। = 20 सूत्रीय कार्यक्रम व जबरन नसबंदी का अभियान चलाकर अपने संजय गांधी व उनकी चाण्डाल चौकड़ी को खुलकर खेलने दिया गया, जिससे देशभर में हजारों निरपराध नागरिक प्रताडि़त किए गए। = संघ कार्यालयों में छापे मारकर झूठ प्रसारित किया गया कि वहां से घातक हथियार बरामद किए गए। = विपक्षी लोगों पर विभिन्न प्रकार के जैसे आयकर बिक्री कर व खाद्य विभाग द्वारा छापे डालकर उन पर झूठे मुकदमे लाद दिए गए। साथ ही उन्हें मीसा व डीआईआर की धारा लगाकर गिरफ्तार किया गया। उन दिनों कानून को संदूक में बंद कर ताला लगा दिया गया। पीडि़त व्यक्ति के लिए न्यायालय के दरवाजे बंद कर दिए गए। स्थिति यह थी- = कोई अपील नहीं = कोई वकील नहीं = कोई दलील नहीं। सर्वत्र तानाशाही का साम्राज्य था। प्रशाकीय मशीनरी इंदिरा सरकार की दासी बन उनकी चाकरी करने में गौरव अनुभव करने लगी थी। इंदौर की सेंट्रल व जिला जेल में स्थान नहीं होने पर भी मीसा व डीआईआर के अन्तर्गत सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर भेड़- बकरियों की तरह ठूंस दिया गया था। सेंट्रल जेल में तो प्राथमिक सुविधाएं तक नहीं थी। जिला जेल में वैचारिक दृष्टि से कहीं भी कोई साम्य नहीं होने वाले दलों की छावनियां सजी हुई थी। जो दल एक-दूसरे को फूटी आँखों से नहीं सुहाते थे, वे यहां साथ-साथ रह रहे थे। सबका अपराध एक ही था, वे इंदिराजी की तानाशाही का विरोध कर रहे थे। इस विरोध ने ही उन्हें साथ-साथ रहना सीखा दिया था। हिन्दी के महाकवि बिहारीजी ने एक दोहा लिखा था, जो यहां सत्य सिद्ध हो रहा था-
'कहलाने एकत बसत, अहि-मयूर-बाघ।
जगतु तपोवन सो कियो, दीरघ दाघ-निदाघ।।Ó
भावार्थ है कि ग्रीष्म ऋतु की भयंकर गर्मी से त्रस्त होकर एक ही स्थान पर वृक्ष की छाया में सर्प, मोर व बाघ एकत्रित होकर विश्राम कर रहे हैं। वस्तुत: यही स्थिति हमें जिला जेल इंदौर में दृष्टिगोचर हो रही थी। इस कारागार में संघ के प्रांत संघचालक माननीय श्री रामनारायणजी शाी, प्रांत प्रचारक मा. कुप्प.सी. सुदर्शनजी व अनेक वरिष्ठ प्रचारकगण थे तो वरिष्ठ पदाधिकारी श्री दिनकररावजी खाम्बेटे, श्री छोटेलालजी नागर आदि थे। भारतीय जनसंघ के सांसद श्री लक्ष्मीनारायणजी पांडे, श्री कैलाशजी जोशी, श्री सुंदरलालजी पटवा, श्री वसंतरावजी प्रधान, अनेक विधायक, वरिष्ठ नेता श्री किशोरीलालजी गोयल, श्री राजेन्द्रजी धारकर, श्री हरूमलजी रिझवानी श्री नारायण धर्म व श्री नारायणदासजी मेहताणी आदि अनेक नेतागण थे। समाजवादी दल से मामा बालेश्वर दयाल, श्री गंगाप्रसादजी तिवारी, श्री ओमप्रकाशजी रावल, श्री रतन पाटोदी, तथा श्री शीलकुमार निगम आदि थे। इस आंदोलन में सर्वोदयी नेताओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। श्री दादाभाई नाइक सर्वमान्य नेता थे, श्री राज गोपालन, शंकरलालजी मंडलोई के साथ-साथ युवा वर्ग में प्रमुख थे श्री अनिल त्रिवेदी व किशोरभाई गुप्ता।
इंदिराजी द्वारा थोपे गए इस आपातकाल का कांग्रेस तथा साम्यवादी दलों को छोड़कर लगभग सभी विपक्षी दलों ने भारी विरोध किया। देशभर में संघ के उन दिनों 1356 प्रचारक कार्यरत थे, उसमें से केवल 189 ही गिरफ्तार हो पाए थे। अत: लोक संघर्ष समिति के नेतृत्व में प्रारंभ हुए सत्याग्रह में बाकी सभी भूमिगत प्रचारक जी-जान से जुट गए। इस सर्वदलीय संघर्ष समिति के महासचिव, भारतीय जनसंघ के श्री नानाजी देशमुख थे। उन्होंने संपूर्ण देश में भ्रमण कर संघ के विशाल नेटवर्क के द्वारा सत्याग्रह को चालना दी। उनके गिरफ्तार होने के पश्चात संगठन कांग्रेस के श्री रवीन्द्र वर्मा महासचिव बनाए गए। उनका साथ देने के लिए रा.स्व. संघ का नेटवर्क जो मा. माधवरावजी मुले (सरकार्यवाह) द्वारा संचालित हो रहा था का पूर्ण सहयोग मिला। संघ की टीम में माननीय मोरापन्तजी पिंगले, श्री दत्तोपन्तजी थेंगड़ी, मा. रज्जू भैया, श्री शेषाद्रिजी व अनेक प्रमुख कार्यकताओं और स्वयंसेवकों का संजाल बिछा हुआ था। यह आंदोलन पूर्ण रूप से अहिंसात्मक चलाने का निर्णय हुआ था। इस ओर विशेष ध्यान दिया गया। सत्याग्रहियों के जत्थे आ-आकर गिरफ्तारियां देते रहे, उनके नारे होते थे - = आपातकाल हटाओ। = प्रेस पर सेन्सर बंद करो। = लोकतंत्र बहाल करो। = मीसाबंदियों को छोड़ो। = संघ से पाबंदी हटाओ।
इस सत्याग्रह में अधिकांश संघ के कार्यकर्ता ही थी। वैसे भी अन्य किसी दल के पास ऐसे त्यागी, तपस्वी, कर्मनिष्ठ व प्राणों को हथेली पर रख चलने वाले कार्यकर्ता थे भी कहां? इन सत्याग्रहियों ने इस प्रकार जन-जागरण का महत आंदोलन चलाया। पुलिस ने इन सत्याग्रहियों को जो अहिंसात्मक आंदोलन कर रहे थे, उनके साथ अत्यंत बर्बरता का व्यवहार किया, जिसकी कुछ बानगी प्रस्तुत है - = इंदौर के सत्याग्रही श्री गोविंद चौरसिया, श्री रतन वैष्णव व श्री यशोधर जैन को बुरी तरह पीटा गया। कँपकपाती सर्दी में उन्हें नंगे शरीर जमीन पर पटक कर उनके बाल नोचे गए। ठंडे पानी के होज में सुलाकर इलेक्ट्रिक करंट छोड़ा गया वे बार-बार बेहोश हो जाते थे, होश आने पर पुन: पिटाई का दौर प्रारंभ हो जाता था। अन्तत: इसी बेहोशी की अवस्था में उन्हें सेंट्रल जेल भेज दिया गया। श्री चौरसिया के तो घुटने ही तोड़ दिए गए, जिसका कष्ट वे आज भी भुगत रहे हैं। = मध्यप्रदेश विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री श्री चम्पालाल यादव को तो रस्सी से बांधकर छत से उलटा लटकाकर डंडों से पिटाई की गई। उनके शरीर के मार्मिक हिस्सों में इलेक्ट्रिक करंट छोड़ा गया। उनकी जेल में अवस्था देखी नहीं जाती थी। = इसी प्रकार भारतीय युवा संघ के प्रादेशिक सचिव श्री तेजसिंह सेंथव के साथ हुए बर्बरतापूर्ण व्यवहार को तो लिखना ही कठिन है। = सोनकच्छ तहसील के ग्राम भुतिया के सात ग्रामीण कार्यकर्ताओं ने तहसील कार्यवाह श्री रामचन्द्र के साथ देवास में आकर सत्याग्रह किया। पुलिस ने उनको वीभत्स यातनाएं दी, पेशाब पिलाया और भयंकर अमानवीय कष्ट दिए।
कारागार में जो मीसाबंदी रह रहे थे, उनकी तो कठिनाइयों का अंत नहीं था। कुच्छेक स्थानों पर इन मीसाबंदियों को दोषसिद्ध व अपराधी कैदियों द्वारा पिटवाया गया। मीसाबंदियों के परिवारों में मौत अथवा दुर्घटना होने पर उन्हें पैरोल देने में प्रशासन निर्दयता का व्यवहार करता था। इसके भी अनेक उदाहरण है - संघ की गौतमपुरा शाखा के स्वयंसेवक व श्री दयानन्द विद्यालय के लोकप्रिय व्याख्याता श्री प्रेमचन्द राठौर के चार वर्षीय पुत्र ज्योतिन्द्र की अपनी बालकनी में खेलते-खेलते पैर फिसल कर नीचे सड़क पर गिरने से मृत्यु हो गई। यह एकल परिवार था, उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मीदेवी के ऊपर तो मानो पहाड़ गिर गया था। उनके पति जेल में बंद थे। कोई सुनने को तैयार नहीं था। इस पर आक्रोशित होकर हमें जेल में भूख हड़ताल करनी पड़ी। अनेक कठिनाइयों के पश्चात उन्हें केवल दो घंटे का पैरोल दिया गया। पुलिस कस्टडी में उन्हें शमसान ले जाया गया और वहीं से उन्हें पुन: जेल में लाकर बंद कर दिया गया। पुलिस एवं प्रशासन ने इस प्रकार राक्षसी व्यवहार कर सम्पूर्ण मानवता को कलंकित कर दिया था। स्वदेश के प्रधान संपादक श्री माणिकचन्दजी वाजपेयी की धर्मपत्नी व जनसंघ नेता श्री छोटेलालजी गुप्ता की धर्मपत्नी के देहावसान पर श्री प्रशासन ने जरा भी मानवता नहीं दिखाई। केवल दो घंटे में ही उन्हें जेल में लाकर बंद कर दिया गया। इस प्रकार की निर्दयता के देशभर में सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े है।
(शेष पृष्ठ 5 पर)
कुछ समय पश्चात तो मीसाबंदियों के परिवारों को पैरोल हेतु भोपाल बुलाना शुरू कर दिया था। यह दोहरी मार थी। एक तो परिवार की आजीविका चलाने वाला मीसा के अन्तर्गत जेल में बंद था, दूसरा परिवार के लोगों को पैरोल हेतु अतिरिक्त खर्च कर भोपाल जाना होता था। यह सब घटनाक्रम एक सत्तालोलूप महिला की हठधर्मी से हो रहा था। जिसके केवल दो ही कारण थे। प्रथम देश की जनता इंदिराजी के सिपाहसालारों के भ्रष्टाचार से त्रासित हो रही थी, इस हेतु आदरणीय जयप्रकाशजी के नेतृत्व में आंदोलन चला रखा था। दूसरा कारण अचानक ही उत्पन्न हो गया था। वह था सन् 1972 के लोकसभा निर्वाचन में रायबरेली सीट से पराजित समाजवादी उम्मीदवार श्री राजनारायण ने उक्त निर्वाचन में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा भ्रष्ट साधनों से विजयी होने पर इलाहाबाद हाइकोर्ट में एक याचिका लगाई थी। इस प्रकरण में दिनांक 12 जून 1975 के दिवस निर्भिक न्यायमूर्ति श्री जगमोहनलाल सिन्हा ने अपना निर्णय देकर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को भ्रष्ट आचरण का दोषी पाकर उनका निर्वाचन अवैध घोषित कर उन्हें अगले छह वर्षों तक निर्वाचन में भाग लेने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। इस निर्णय से श्रीमती गांधी ने कुपित होकर आपातकाल की घोषणा कर दी थी। इस प्रकार 25 जून की मध्यरात्रि को देशभर में आपातकाल लगाकर व विपक्षी नेताओं को रातमरात गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया था और शुरू हो गया था लोकतंत्र की गर्दन मरोडऩा और उसकी निर्मम हत्या का सिलसिला।
यह था आपातकाल लगाने का कारण जेल में निरुद्ध मीसाबंदियों को लालच भी दिया गया, उन्हें क्षमा मांगने हेतु छपवाकर फार्म वितरित किए गए। यद्यपि मीसाबंदियों के परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे थे, परिवार के वयोवृद्धों की बीमारी व बच्चों की पढ़ाई में विघ्न आदि समस्याओं का अंबार था, परन्तु ये बहादुर न तो आतंक से झुके और न ही स्वार्थ आड़े आया। हिम्मत से डटे रहे -
न रुके, न झुके, न डिगे-डटे रहे।
प्रकृति का नियम है - काल रात्रि का अंधेरा छटता ही है और पुन: सूर्य देवता उदित होकर चहूँ ओर प्रकाश द्वारा पृथ्वी को नवचैतन्य से भर देते हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी को उनकी विश्वसनीय सलाहकार मंडली व गुप्तचरों ने बताया कि विरोधी दल तो नेस्तनाबूद हो चुके है, किसी में बल नहीं है कि वे आपसे टक्कर ले सके।
इस अवसर का लाभ लेने हेतु इंदिराजी ने 28 जनवरी 1977 को देश में चुनाव कराने की घोषणा कर दी। देशभर में 16 से 20 मार्च तक यह महानिर्वाचन चला। सारी चांडाल चौकड़ी प्रसन्नता के सागर में गोते लगा रही थी, परन्तु देश में तो ज्वालामुखी खदबदा रहा था, जिसका 21 मार्च को महाविस्फोट हुआ और श्रीमती इंदिरा गांधी, उनके लाड़़ले संजय गांधी सभी बड़बोले सिपाहसालार इस विस्फोट में धराशायी हो गए। इस प्रकार देश में पुन: प्रजातंत्र का सूर्य जगमगा उठा। 21 माह की कालरात्रि का अंत हो गया। हमारे देश का इतिहास साक्षी है, जब-जब भी रावण और कंस जैसे दुर्दांत, अत्याचारी व राक्षसी मनोवृत्ति वाले शासक आए, तब उनका नाश करने श्री राम व श्रीकृष्ण जैसे अवतार भी हुए। यही बात गीता में कही गई है, जो शाश्वत सत्य है।
'यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्म संस्थापनाय सम्भवामि युगे-युगे।।Ó
ये बोलते आंकड़े
आपातकाल में तानाशाही से संघर्ष करते हुए जो लोग विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार हुए, उनकी व मीसा में बंद रहते हुए अथवा बाहर बीमारी से अतवा पुलिस की अमानुषिक यातनाएं से ग्रसित शहीदों की संख्या निम्न है -
= मीसा, डीआईआर आदि में गिरफ्तार 1,25,000 (जिसमें 90 प्रतिशत से अधिक संघ परिवार के लोग थे)
= कारागार में अथवा बाहर आने पर बीमारी अथवा पुलिस की मार से शहीद 107।
= संघ के देशभर में कार्य कर रहे 1356 प्रचारक में से 189 गिरफ्तार कर लिए गए थे और शेष 1167 प्रचारक भूमिगत होकर सतत् जनजागरण व कारागार में बंदी कार्यकर्ताओं के परिवारों की देखभाल में लगे रहे।
= जनसंघ के सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी पुलिस को धता बताकर संसद में पहुंचे और वहां से सुरक्षित वापस आकर विदेशों में जाकर विश्व में देश की स्थिति पर सत्य बातें बताने में जुट गए।
= श्री जार्ज फर्नांडीज पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें हथकड़ी-बेड़ी में लाया गया।
= गुजरात में जनसंघ के मंत्री श्री मकरन्द देसाई इंदिराजी की पुलिस को झांसा देकर इंग्लैंड चले गए और वहां से इंदिराजी के दुष्प्रचार का पर्दाफाश करते रहे।
= हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी श्री अहमदाबाद में भूमिगत रहकर देशभर के विपक्षी नेताओं से संपर्क स्थापित कर सत्याग्रह की गतिविधियों को सफलतापूर्वक निर्देशित करते रहे।