मनुष्य क्रिया नहीं, कर्म करता है
   Date25-Jun-2020

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धर्मधारा
क्रि याओं से कर्मबंधन नहीं होता है। जिन अवस्थाओं में, जिन योनियों में केवल क्रियाएं होती हैं, कर्म नहीं बनते, उन्हें भोग योनियां कहते हैं। इन योनियों में भ्रमण कर जीव केवल अपने प्रारब्ध भोग पूरे करता है। वहां उससे नए कर्म नहीं बन पड़ते। शेर की योनि में शेर अपने नियत प्रारब्ध को भोगने आता है। वह प्राणियों को मारकर खा जाता है तो उसे कोई पाप नहीं लगता, वह तो अपनी क्षुब्धा मिटाने के लिए वह कार्य करता है, यह हिंसा नहीं है, यह उसके लिए एक क्रिया है, परंतु मनुष्य जब हिंसा करता है तो उसे उस हिंसक कर्म के कारण कर्मफल के विधान से गुजरना पड़ता है। शेर न तो पाप करता है और न ही पुण्य ही करता है, वह बस, क्रिया करता है। मनुष्य योनि के कर्म सिद्धांत अति सूक्ष्म, गहन एवं जटिल हैं। यहां प्रारब्ध भोग भी पूरे होते हैं और नए कर्म भी बनते हैं। जैसे किसी का प्रारब्ध भोग उसके विवाह के रूप में आता है तो उसका विवाह तो होगा। प्रारब्ध के अनुसार विवाह की दिशा-दशा तय होती है, सुखद या दु:खद इसी पर निर्भर होता है। विवाह से भोग तो कट जाएगा, परंतु विवाह में प्राप्त सुख से यदि आसक्ति बढ़ती है तो यह आसक्ति बांधने वाली होती है। दूसरी ओर विवाह से उपजी कटुता से यदि वैमनस्य पैदा होता है तो यह वैमनस्य, द्वेष बनकर एक नया कर्म जोड़ता है। विवाह तो प्रारब्ध के अंतर्गत भोगवश हुआ, परंतु इस भोग से प्राप्त राग-द्वेष भविष्य के लिए नए कर्म का बीज बो देते हैं, जिसे फिर से भोगना पड़ता है और यह क्रम अनवरत चलता रहता है। नाम मनुष्य योनि में कर्म का स्वरूप बड़ा गहन होता है। मनुष्य क्रिया नहीं करता है, वह कर्म करता है। क्रिया केवल जड़ता के तल पर होती है, फिर वह पदार्थ हो या शरीर, परंतु कर्म-जड़ एवं चेतन, दोनों ही तल पर एक साथ सम्पन्न होता है, परंतु इसमें भी सामान्यजनों एवं योगियों, ऋषियों के जीवन में एक भेद है। सामान्य जनों को इच्छा एवं भावना के साथ क्रिया करनी पड़ती है, तब कर्म पूर्ण होता है। उन्हें कर्म करने के लिए इच्छा और भावना करनी ही पड़ती है, परंतु योगियों, ऋषियों की विचारचेतना या भावचेतना इतनी संवेदनशील ऊर्जा से भरी रहती है कि हलकी-सी सकारात्मक या नकारात्मक तरंग उठते ही स्वत: ही वह स्फुरणा, बाह्य प्रकृति में घटना बन जाती है।