चीन के प्रवक्ता बनते राहुल...
   Date22-Jun-2020

vishesh lekh_1  
पूर्वीय लद्दाख में सीमा विवाद को लेकर भारत-चीन के बीच सैन्य अधिकारियों का संवेदनशील मुद्दों के साथ गंभीर बैठकों का दौर चल रहा है... लेकिन इन सब में भारत की तरफ से भारत का ही पक्ष कमजोर करने का खेल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इस तरह से खेल रहे हैं... मानो वे चीन के प्रवक्ता बनकर अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहते हैं... आखिर देश राहुल से भी यह पूछने का अधिकार रखता है कि वे पहले दिन से आज तक चीन को भाने वाली भी बातें और सरकार पर आरोप लगाने के चीन परस्त हथकंडे क्यों अपना रहे हैं..? चीन के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री के इस भरोसे पर विश्वास किया जाना चाहिए कि न तो हमारी सीमा में कोई कब्जा हुआ है और न ही हमारी एक इंच जमीन पर भी कोई आंख दिखा सकता... लेकिन बैठक में विपक्ष खासतौर से कांग्रेस ने सरकार से जो सवाल पूछे, वे देश के हर नागरिक के मन में भी उठ रहे हैं... अच्छी बात यह है कि इस संकट में सरकार का साथ देने की विपक्ष ने जो एकजुटता दिखाई है, उससे एक बार फिर यह साबित हुआ है कि राजनीति में भले कितने मतभेद क्यों न हों, लेकिन राष्ट्रीय संकट के वक्त सब सरकार के साथ खड़े हैं...
पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बीते सोमवार की रात भारतीय सैनिकों पर चीन की ओर से किए हमले के बाद से ही विपक्ष सरकार से इस मुद्दे पर देश के सामने सही तथ्य रखने और सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रहा था... देश की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों पर सभी दलों की भी चिताएं और सरोकार होते हैं और वे भी जनता के प्रति उतने ही जवाबदेह हैं, जितनी कि सरकार... इसलिए वे सरकार से जवाब चाहते हैं... ऐसे में उन्हें वास्तविक स्थिति से अवगत कराना सरकार का दायित्व है... एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह जरूरी भी है कि सरकार सभी विपक्ष दलों को साथ लेकर चले, न कि उनकी उपेक्षा करे... यही जिम्मेदारी विपक्षी दलों की भी बनती है कि अनर्गल और तथ्यहीन बयानबाजी करने के बजाय सरकार के साथ बैठकर बात करें और राष्ट्रीय मुद्दे पर अपने रचनात्मक सुझाव दें... भारतीय सैनिकों पर हमले की घटना के बाद चीन ने गलवान घाटी के क्षेत्र पर जिस तरह से दावा ठोका है, वह भारत के लिए और बड़ी चुनौती बनकर उभरा है... इसलिए अब भारत सरकार उसे माकूल जवाब देने के लिए इस वक्त सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे पर तेजी से काम कर रही है... सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री ने जो आश्वासन विपक्षी दलों के साथ देशवासियों को दिया है, आखिर उसी के खिलाफ माहौल बनाकर राहुल गांधी किसका हित साध रहे हैं..? क्योंकि उन्होंने चीन को सहायता देने वाले बयान देकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलकर जो रणनीति अपनाई है, वह सही मायने में किसी राष्ट्रघाती देशद्रोह से कम नहीं है... राहुल के इस चरित्र पर देशवासी कांग्रेस को भविष्य में कड़ा सबक सिखाएंगे...
दृष्टिकोण
न्यायमंदिर से आस्था की गुहार...
जगन्नाथपुरी में प्राचीनकाल से रथयात्रा का आयोजन होता रहा है... लेकिन इस बार देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर ने कोरोना महामारी के चलते यात्रा में उमडऩे वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए गत दिनों रोक के आदेश दिए थे... लेकिन अब नई याचिकाओं के साथ न्याय मंदिर में आस्था का मामला पहुंच गया है, सोमवार को सुनवाई होना है... आमतौर पर आस्थाओं के निर्वहन के मामले में सत्ता-संस्थानों की ओर से दखल नहीं दी जाती है... लेकिन जब किसी परंपरा या आस्था से जुड़े किसी खास त्योहार या उत्सव की वजह से बहुत सारे लोगों की सेहत और यहां तक कि जान पर जोखिम का सवाल हो, तब न केवल सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए, बल्कि खुद लोगों और समाज को अपनी ओर से इस पर विचार करना चाहिए... इसमें कोई दो राय नहीं कि ओडि़शा के पुरी में जगन्नाथ रथयात्रा की एक प्राचीन परंपरा रही है और यह लोगों की आस्था से जुड़ा एक संवेदनशील विषय है... इसे किन्हीं हालात में बाधित करने या रोकने की कोशिश जानबूझकर कोई नहीं करना चाहेगा, लेकिन कोरोना वायरस के संक्रमण की मार से देश किस तरह परेशान है और यह संक्रमण किन-किन रास्तों से फैल रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है... अगर रथयात्रा के आयोजन की वजह से बड़ी तादाद में लोगों के जीवन पर संकट आने की आशंका हो, तब निश्चित रूप से यह चिंता का विषय है... गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इसी आशय की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह कहा कि अगर रथयात्रा की इजाजत दी गई तो भगवान जगन्नाथ भी हमें माफ नहीं करेंगे..! न्यायालय इस मामले में रथयात्रा को मंजूरी देकर श्रद्धालुओं की संख्या सीमित या एक निश्चित आंकड़ा तय कर सकता है, ताकि आस्था से जुड़े इस विषय पर श्रद्धालुओं की भावनाएं भी आहत न हो और न्यायालय का भी मान बना रहे...