शांति और सद्भाव पर ग्रहण के मानिंद चीन
   Date22-Jun-2020

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अवधेश कुमार
य ह भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित होने का 70वां वर्ष है। इसे मनाने के लिए दोनों देशों के बीच 70 कार्यक्रम तय हुए थे। ऐसा नहीं है कि भारत चीन की दुर्नीतियों को नहीं समझता है, लेकिन पूरी तरह सतर्क एवं अपनी भूमि की सुरक्षा के प्रति गंभीर रहते हुए अपनी ओर से संबंधों में शांति और विश्वास कायम करना भारत का चरित्र है और यही हम हमेशा प्रदर्शित करते हैं। चीन ने गलवान में जिस तरह से असभ्य व गुंडागर्दी सदृश खूनी जंग को अंजाम दिया, उसका तात्कालिक निष्कर्ष तो यही है कि उसके साथ संबंधों में स्थायी शांति एवं स्थिरता की कल्पना व्यर्थ है। वास्तव में गलवान घाटी में जो कुछ चीन ने किया, दो सभ्य देशों की सेनाओं के बीच उस तरह के झड़प की कल्पना तक नहीं की जा सकती। चीन से वास्तविक नियंत्रण रेखा और सीमा पर निपटते हुए भी भारतीय राजनीतिक नेतृत्व बयानों में हमेशा संयत रुख अपनाता रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन के खिलाफ पहली बार इस तरह का सार्वजनिक वक्तव्य दिया है, जिसका संदेश बिल्कुल साफ है। उन्होंने कहा कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्होंने भारत की नीति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत शांति चाहता है, लेकिन भारत उकसाने पर हर हाल में यथोचित जवाब देने में सक्षम है। इस तरह प्रधानमंत्री ने चीन के सामने अपना विकल्प स्पष्ट कर दिया है कि शांति के प्रयास को हमारी कमजोरी न समझें, हम आपसे हर स्तर पर निपटने में सक्षम हैं और आप नहीं माने तो निपटेंगे। साथ ही इससे सेना को भी स्पष्ट संकेत मिल गया है कि नियंत्रण रेखा एवं सीमा पर परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहार के लिए जो आप करेंगे, सरकार को उसका पूरा समर्थन होगा।
प्रधानमंत्री के इस स्पष्ट बयान के बाद अन्य किसी के बोलने की आवश्यकता नहीं रह जाती। चीन को भी समझ आ गया है कि उसने जो कुछ किया, वह उसके लिए आगे ज्यादा महंगा पड़ सकता है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ फोन पर बातचीत के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि जो कुछ हुआ, उसके लिए दोषी आप हैं। इसके बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं कि भारत किस स्तर पर जाने को मानसिक रूप से तैयार हो चुका है। देश में संदेह प्रकट करने वाले महान विभूतियों को भी समझ लेना चाहिए कि यह बदला हुआ भारत है। वैसे भी मई से जारी विवाद के बीच चीन द्वारा सैन्य लामबंदी को देखते हुए भारत ने अरुणाचल से लेकर लद्दाख तक पूरे क्षेत्र में सैनिकों की संख्या बढ़ा दी थी। वास्तव में अब तक जितनी जानकारी सामने आ चुकी है, उसके अनुसार गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने कब्जे का षड्यंत्र रचकर अंजाम देने की कोशिश की तथा धोखे से भारतीय सैनिकों पर हमला किया। हालांकि हमारे जवानों ने चीनी सैनिकों के साथ बिना किसी हथियार के संघर्ष किया और वीरतापूर्वक लड़ते हुए उनको भी मारा तथा वीरगति को प्राप्त हुए। निस्संदेह, 20 जवानों का बलिदान सामान्य घटना नहीं है। यह साफ है कि वार्ता में चीनी फौज पीछे हटने पर सहमत दिख रही थी, लेकिन अंदर ही अंदर उन्होंने गलवान और श्योक नदी के संगम के पास प्वाइंट-14 चोटी पर कब्जे की साजिश रच रखी थी। चीनी सैनिक पहले से पत्थरों, हथौडिय़ों, लोहे के राड, कंटीले तारों आदि के साथ तैयार थे। सोमवार यानी 15 जून को दोपहर से भारतीय सेना के कमांडिंग ऑफिसर के साथ 10 सैनिक पैट्रोल पॉइंट-14 के पास चीनी सैनिकों के लौटने की निगरानी कर रहे थे। चीनी सैनिकों को यहां से हटना था, लेकिन जब वे अपनी जगह से नहीं हटे तो झड़प शुरू हो गई। यह भी देखा गया कि चीनी सैनिक कब्जे के लिए तारबंदी कर रहे हैं। इसे रोकने की कोशिश स्वाभाविक थी। चीनी सैनिकों ने अचानक भारतीय कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू पर लोहे की राड से हमला बोल दिया। अगर आठ घंटे तक खूनी भिड़ंत चलती रही तो इसका मतलब साफ है कि चीनी सेना ने हर हाल में कब्जा करने की योजना बना रखी थी, जिसे वे किसी कीमत पर साकार करना चाहते थे। यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि 14 हजार से ज्यादा फीट की ऊंचाई पर और शून्य से भी कम तापमान के बीच जहां ठीक से खड़ा होने की भी जगह नहीं, वहां पहले से योजना बनाकर तैयार चीनी सैनिकों ने बिना पूर्व तैयारी के किस तरह सामना किया होगा कि अपनी से दोगुनी संख्या में उनको मारा तथा घायल भी किया। विदेशी एजेंसियों की खबरें बता रही हैं कि 20 भारतीय जवानों के मुकाबले उनके चीन 43 सैनिकों को जान गंवानी पड़ी और कुछ घायल भी हुए। अब तो अमेरिका ने भी पुष्टि कर दी है कि चीन के कम से कम 35 सैनिक अवश्य मारे गए हैैं। अगर हताहतों की संख्या ज्यादा नहीं होती तो चीनी सैन्य हेलिकॉप्टरों को मृत जवानों के शवों व घायल जवानों को एयरलिफ्ट करने की नौबत नहीं आती। जो लोग बिना सोचे-समझे अपनी सरकार और देश को कोस रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि चीन ने हमारी करीब 45 किलोमीटर क्षेत्र को कब्जा करने की कोशिश की थी, जिसे हमने नाकाम किया है। 1962 में हमने 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन गंवाई थी।
अपने जवानों के खोने का गम हमारे अंदर अवश्य है, पर सच कहा जाए तो 2017 में डोकलाम के बाद चीन को भारत की ओर से यह दूसरा करारा जवाब दिया गया है। जून, 2017 में जब चीन ने जबरन यहां सड़क निर्माण का काम शुरू किया तो भारतीय सैनिकों ने उसे रोक दिया था। चीन को कल्पना भी नहीं थी कि भारत इस सीमा तक अपने जवानों के साथ डट जाएगा। भारत ने उनकी एक न चलने दी। दोनों की सेनाएं 75 दिन से ज्यादा वक्त तक आमने-सामने डटी रहीं और चीन को पीछे हटना पड़ा। चीन को उसी समय समझ जाना चाहिए था कि यह बदला हुआ भारत है, जो उसकी धौंस-पट्टी में तो नहीं ही आएगा, आवश्यकता पडऩे पर सीधे सैन्य मुकाबला भी कर सकता है। इसके बावजूद उसने गलवान में गलती कर दी। ऐसा करके चीन ने अपने ही समझौतों को तोड़ा है। जिस तरह की लिखित व्यवस्थाएं दोनों देशों की सहमति से बनी थी, उनमें बार-बार घुसैपठ, कब्जा, झड़प आदि की कोई गुंजाइश ही नहीं है, किंतु जो देश वचन में कुछ और अंतर्मन में कुछ का चरित्र रखता हो, वह कभी भी पलट सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से चीन के साथ संबंधों को बेहतर करने की जितनी कोशिश हो सकती थी, की है। वे पांच बार चीन की यात्रा कर चुके हैं। अलग-अलग मौकों पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी 18 बार मुलाकात हो चुकी है। अपनी ओर से मोदी ने पूरी कोशिश की कि एशिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच विश्वास कायम रहे ताकि हम शांति से विकास के रास्ते अग्रसर हों। मोदी के सार्वजनिक संबोधन में दिखी आक्रामकता इसी कारण है कि शी जिनपिंग अपने वायदे के अनुरूप व्यवहार नहीं कर रहे हैं। हालांकि ऐसा नहीं था कि मोदी उनके भुलावे में आ गए। मोदी को मालूम है कि चीन से एक-एक इंच जमीन लेने का संसद का संकल्प है और स्वयं भाजपा के घोषित सिद्धांतों में यह शामिल है, किंतु तत्काल विवादों पर बातचीत का एक मैकेनिज्म चलाते हुए अन्य अंत:क्रियाएं चलती रहे, यह भारत की नीति थी, जिसे थोड़े परिवर्तन के साथ मोदी ने आगे बढ़ाने की पहल की। इसका एक परिणाम यह तो है ही कि दुनिया के प्रमुख देश मान रहे हैं कि भारत ने चीन के साथ शांति, विश्वास एवं सहयोग की हरसंभव कोशिश की है, लेकिन चीनी नेतृत्व हर हाल में भारत के उत्थान को बाधित करने तथा सीमा क्षेत्रों के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर धोखे से कब्जा कर अपनी स्थिति ज्यादा मजबूत करने की गंदी नीति पर चल रहा है।
भारत का पक्ष अब साफ है-आप अगर शांति नहीं चाहते हैं तो आपकी भाषा में जवाब दिया जाएगा। चीन की सेना और हथियारों की संख्या पर मत जाइए। जब भारतीय जवानों ने बिना हथियार के उनकी साजिश को विफल कर दिया तो आगे उनको सफल होने दिया जाएगा, ऐसी कल्पना मूर्ख ही कर सकते हैं। यह मत सोचिए कि चीन के साथ यदि संघर्ष हुआ तो भारत कमजोर पड़ जाएगा। 1962 की जंग हम अपनी गलतियों से हारे थे। अगर वायुसेना का उपयोग किया जाता तो संभव था युद्ध का परिणाम दूसरा होता, किंतु उसके पांच वर्ष बाद 1967 में ही भारतीय जवानों ने चीन को बुरी तरह पराजित किया। सच कहा जाए तो चीन ने गलवान से अपने महिमा कमजोर होने तथा पतन की शुरुआत स्वयं कर दी है। 1962 के बाद हमने जितने युद्ध लड़े, सबमें विजय पाई है, जबकि चीन ने एक भी सीधा युद्ध लड़ा नहीं है। वास्तव में हमारे 20 सैनिकों ने जान देकर इतिहास का ऐसा अध्याय लिख दिया है, जहां से चीन की विश्व शक्ति के उदय के दौर पर विराम लग सकता है। भारत आर्थिक, कूटनीतिक एवं सैन्य तीनों स्तरों पर चीन का सामना करने के लिए कमर कस चुका है। चीन को सबक सिखाने में हमारे सामने जितनी भी परेशानियां और चुनौतियां आए, उनको सहने तथा झेलने की तैयारी हर भारतीय की होनी चाहिए। चीन से सीमा विवाद वैसे भी बातचीत से सुलझने वाली नहीं, यह साफ हो चुका है। तो भारत को भविष्य का ध्यान रखते हुए आक्रामकता के साथ तीनों मोर्चा पर आगे बढऩा चाहिए।