प्रेरणादीप
   Date22-May-2020

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देशभक्ति की परीक्षा
प्र ख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोपालकृष्ण गोखले ने देशसेवा के लिए एक संस्था बना रखी थी- भारत सेवक समाज (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी)। उनकी इस संस्था के समर्पण भाव से समाज का हर वर्ग प्रभावित था और उससे जुडऩे की चाहत रखता था। बम्बई म्युनिसिपलिटी में एक इंजीनियर थे, जो इस संस्था से जुड़कर देशसेवा की इच्छा रखते थे। संकोच के नाते उन्होंने गोपालकृष्ण को स्वयं पत्र न लिखकर डॉ. देव से चिट्ठी लिखवाकर अपनी इच्छा प्रकट की। उन्हें शंका थी कि शायद गोखलेजी उन्हें अपनी संस्था में भर्ती नहीं करेंगे, क्योंकि वह नौकरी में थे। इसी कारण उन्होंने डॉ. देव से कहा- पहले मैं सोसायटी को प्रार्थना-पत्र दूँगा। यदि वह मंजूर हो गया तो म्युनिसिपलिटी की नौकरी से इस्तीफा दे दूँगा। पर यदि गोखलेजी ने प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो उस स्थिति में कहाँ-कहाँ नौकरी ढूंढता फिरूँगा, मगर गोखलेजी भी बड़े पारखी थे। वह ठोक बजाकर ही किसी को अपनी संस्था में भर्ती करते थे। सो उन्होंने डॉ. देव से उस इंजीनियर को कहलवाया कि वह पहले नौकरी से इस्तीफा दे दें, तभी उनके प्रार्थना-पत्र पर विचार किया जाएगा। उनकी दृष्टि में इसी कदम से इंजीनियर की परीक्षा होने वाली थी। इंजीनियर भी बड़े देशभक्त थे। गोखलेजी का संदेश मिलते ही उन्होंने नौकरी से तुरंत त्यागपत्र दे दिया। उनके प्रार्थना-पत्र पर विचार करके गोखलेजी ने उन्हें अपनी सोसायटी में सदस्यता दे दी। फिर वह इंजीनियर गोखलेजी के साथ देशसेवा में जुट गए। वह इंजीनियर कोई और नहीं, ठक्कर बापा थे, जिनके योगदान को आज श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।