शांति से संभव प्रभु चेतना का अनुभव
   Date22-May-2020

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धर्मधारा (भाग-2)
व ह पूरे वक्त अलर्ट रहने लगा, सावधान रहने लगा। कभी भी हमला हो सकता है! किताब पढ़ रहा है, तो भी उसके चित्त का एक कोना जागा हुआ है कि कहीं हमला न हो जाए! तीन महीने पूरे होते-होते, किसी भी तरह का हमला हो, वह रक्षा करने में समर्थ हो गया। उनकी ढाल ऊपर उठ जाती। पीछे से भी गुरु आए, तो भी ढाल पीछे उठ जाती और हमला सम्हल जाता। तीन महीने बाद उसे चोट पहुंचाना मुश्किल हो गया। कितने ही अनअवेयर, कितना ही अनजान हमला हो, वह रक्षा करने लगा। चित्त राजी हो गया, चित्त सजग हो गया।
उसके गुरु ने कहा कि पहला पाठ पूरा हो गया; कल से दूसरा पाठ शुरू होगा। दूसरा पाठ यह है कि अब तक जागते में मैं हमला करता था, कल से नींद में भी हमला होगा, सम्हलकर सोना! उस राजकुमार ने कहा- गजब करते हैं आप! कमाल करते हैं! जागने तक गनीमत थी, मैं होश में था, किसी तरह बचा लेता था, लेकिन नींद में तो बेहोश रहूंगा!
उसके गुरु ने कहा- घबराओ मत; मुसीबत नींद में भी होश को पैदा कर देती है। संकट, क्राइसिस नींद में भी सावधानी को जन्म दे देती है। उसने कहा- फिकर मत करो। तुम नींद में भी होश रखने की कोशिश करना।
फिर लकड़ी की तलवार से नींद में हमले शुरू हो गए। रात में आठ-दस दफा कभी भी चोट पड़ जाती है। एक दिन, दो दिन, आठ-दस दिन बीतते, फिर हड्डी-पसली दर्द करने लगी, लेकिन तीन महीने पूरे होते-होते राजकुमार ने पाया कि वह संन्यासी ठीक कहता है। नींद में भी होश जागने लगा। सोया रहता, और भीतर कोई जागता भी रहता। स्मरण रखता कि हमला हो सकता है! रात में नींद में भी ढाल को पकड़े रहता। तीन महीने पूरे होते-होते गुरु का आगमन, उसके कदम की धीमी-सी अवाज भी उसे चौंका देती और वह ढाल से रक्षा कर लेता। तीन महीने पूरे होने पर नींद में भी हमला करना मुश्किल हो गया। अब वह बहुत प्रसन्न था। एक नई तरह की ताजगी उसे अनुभव हो रही थी। नींद में भी होश था। और कुछ नए अनुभव उसे हुए। पहले तीन महीने में,जब वह दिन में भी जागने की कोशिश करता था, तो जितना-जितना जागना बढ़ता गया, उतने-उतने विचार कम होते गए। (क्रमश:)