रोजगार को पैदा करता उपभोग और उत्पादन का अंतर
   Date22-May-2020

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कमलेश पांडे
वि त्त मंत्री ने कोयला क्षेत्र पर सरकार के एकाधिकार को खत्म करने की घोषणा करते हुए माइनिंग ब्लॉक्स की साझा नीलामी करने, कोल माइनिंग इंफ्रा पर 50 हजार करोड़ खर्च करने की मंशा के अलावा केंद्रशासित राज्यों में बिजली कंपनियों का निजीकरण करने, आयुध फैक्ट्री बोर्ड का निगमीकरण करने, अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी की सुविधा देने, छह हवाई अड्डों की नीलामी करने, पीपीपी मोड पर रेडिएशन तकनीक सेंटर बनवाने तथा अस्पताल एवं स्कूल जैसे सामाजिक बुनियादी ढांचे में निजी निवेश के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग बदलाव की बात कही थी।
इस प्रकार गुजरे महज दो दिनों में ही उन्होंने 48,100 करोड़ रुपए के जिस राहत पैकेज का ऐलान किया है, उसमें गौर करने वाली बात यह है कि रविवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंदाज में चार एल लैंड, लेबर, लिक्विडिटी और लॉ की भी बात की। बहरहाल, केंद्रीय राहत पैकेज में एक साथ बीस लाख करोड़ से अधिक की 51 घोषणाएं, और वह भी बतौर राहत, सुनकर कोई भी सम्मोहित हो सकता है, जबकि इस ढोल की पोल यह बताई जा रही है कि केंद्र सरकार का वार्षिक बजट ही तकरीबन तीस लाख करोड़ रुपए का हुआ करता है और आरबीआई सालभर में करीब पांच लाख करोड़ रुपए जारी करता है। इसलिए, मानकर यही चलिए कि इन्हीं 35 लाख करोड़ रुपयों की बदौलत देश का जीडीपी 6-7 प्रतिशत रहता है। अब जबकि जीडीपी शून्य पर है और निगेटिव की ओर उसके प्रस्थान करने का खतरा उत्पन्न हो गया है, तब 20 लाख करोड़ रुपए हमें कहां खड़ा कर पाएंगे, यह सोचने की बात है, क्योंकि तालाबंदी के कारण दो महीने से देश की सारी गतिविधियां बंद हैं। जिस तरह से आयात-निर्यात, टैक्स रियलाइजेशन, आवागमन, बाजार-व्यापार, होटल-रेस्तरां, पर्यटन-देशाटन-तीर्थाटन, धार्मिक-सामाजिक व्यवहार सब बंद हैं। उसके दृष्टिगत ही जीडीपी के शून्य पर पहुंचने का सबब है। जानकारों के मुताबिक, जब सामान्य परिस्थितियों में 6-7 प्रतिशत जीडीपी पर 35 लाख करोड़ रुपए से देश चलता-फिरता नजर आता है तो शून्य जीडीपी पर 20 लाख करोड़ रुपए से क्या-क्या हो सकता है? दो टूक कहा जाए तो मंदी के दिनों में देश को चलाना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन अभी तो सीधे-सीधे ब्रेकडाउन की स्थिति है। इसलिए वर्तमान और भविष्य दोनों के प्रति आशंकाओं के माहौल में शून्य से प्रारंभ करने की नौबत आन पड़ी है, आप माने या न मानें। फिलवक्त, यह बात भी बहुत सारे लोग भूले नहीं होंगे कि कोविड संक्रमणकाल के पूर्व सालभर के अंदर भी सरकार ने मंदी के दौर में इंफ्रा डेवलपमेंट के लिए सौ करोड़ और रीयल इस्टेट सेक्टर के लिए 25 हजार करोड़ के केंद्रीय राहत पैकेज की अलग-अलग घोषणा की थी, जबकि इनके भुगतान का दारोमदार बैंकों पर था, जिसका उन्होंने जोखिम भी नहीं उठाया। हालांकि, इस बार के भारी-भरकम राहत पैकेज का अधिकांश हिस्सा उन्हीं बैंकों के सिर पर डाला गया है। लिहाजा, यह कुल मिला-जुलाकर फाइनांशियल राहत पैकेज है, जिसके तहत बैंकों को बड़ा हिस्सा बतौर कर्ज देने को कहा गया है, जबकि पावर सेक्टर सहित कुछ अन्य मदों में सरकार की गारंटी की बात कही गई है। सरकार की गारंटी वाले हिस्से का बैंक यदि रियलाइजेशन कर भी दे तो और वह खरा न उतरे तो सरकारी बजट पर बोझ बढऩा तय है। ऐसे भी सरकारी गारंटी वाले कर्जों पर औसतन 15 फीसद के लेनदार कर्ज वापसी से हाथ खड़े ही कर देते हैं। बाकी मसलों पर यह बताने की जरूरत नहीं कि कर्ज का व्यवसाय देनदार और लेनदार के आपसी व्यवहार पर निर्भर करता है।
वास्तव में, कोई भी अर्थव्यवस्था भविष्य के अनुमानों पर ही आश्रित होती है, इसलिए आर्थिक फैसलों को वर्तमान के संदर्भ में देखना अकसर भुलावा साबित होता आया है, जबकि पैकेज में कर्ज, कर्ज और कर्ज की बातें अधिक हैं। यह कड़वा सच है कि लगभग 93.8 लाख करोड़ रुपए बतौर कर्ज बाजार में फेंककर और तकरीबन दस लाख करोड़ रुपए के एनपीए पर बैठे बैंक पहले से ही हांफ रहे हैं। वहीं, कर्ज के भरोसे चल रहे छोटे-बड़े उद्योग भी हैरान-परेशान हैं। इसके बावजूद, राहत के नाम सरकार उन एनबीएफसी और रीयल इस्टेट्स को भी कर्ज देने की बात कह रही है, जिनको बैंक कर्ज देने लायक भी नहीं मानते, क्योंकि वे पहले ही बहुत कुछ डुबा चुके हैं या फिर किसी सोची-समझी चाल के तहत गटक चुके हैं। ऐसे में कौन-सी फर्म एक बार पुन: कर्ज लेना चाहेगी और बैंक उनको किस हौसले से कर्ज देंगे, यह सोचने-विचारने वाली बात है। वो भी तब, जबकि समस्त कारोबार ही चुनौतीपूर्ण भविष्य की ओर इशारा कर रहा है। कोरोना क्राइसिस से निपटने में असमर्थ पाकर सरकार राहत की अधिकतर जवाबदेही बैंकों की ओर मोड़ रही है, जबकि कर्ज बाजार से त्रस्त बैंक हाल-हाल तक लोन राइट ऑफ के कर्मकांड में जुटे हुए थे ताकि उनका बैलेंस शीट साफ-सुथरा हो सके। यही वह कर्ज बाजार और विशाल एनपीए का जमाना है, जिसके कारण बैंक विलयीकरण का विराट निर्णय लेना पड़ा था।
जहां तक बैंकों के समीकरण का सवाल है तो वह कुछ इस प्रकार है। दरअसल, कोविड-19 संकट के प्रवेश के पहले ही रिजर्व बैंक की सख्ती, घाटा और घोटालों के कारण बैंक किसी अन्य जरूरतमंद को भी कर्ज देने में आनाकानी करने लगे थे। लेकिन, ठीक ऐसे ही माहौल में जब कोविड महामारी नामक विश्वव्यापी हलचल का प्रवेश भारत में हुआ तो उसी रिजर्व बैंक ने एनबीएफसी, म्युचुअल फंड आदि के लिए चार लाख करोड़ रुपए जारी कर सस्ते कर्ज का फरमान लाया, लाभांश देने से मना किया, फिर भी कर्ज बाजार परवान न चढ़ा तो बैंकों ने रिवर्स रेपो के बतौर भारी रकम आरबीआई को लौटा दी। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में अचानक राहत पैकेज उभरा। बदहाली के कारण जो सरकार महीनाभर पहले तीन महीने तक उद्योगों से कर्ज वसूली न करने का बैंकों पर दबाव बना रही थी, वही सरकार अब उद्योगों को कर्ज लेने को उकसा रही है। कर्ज, कर्ज और कर्ज का आलम यह कि कोविड संक्रमण के पहले सरकार बैंकों को कर्ज के बोझ से उबारने का उपक्रम कर रही थी, वही सरकार बीच में कर्ज सस्ता कर बैंकों को पुश करने में जुट गई और अब कह रही है नया कर्ज दो। सवाल है कि जो उद्योग दो वर्षों से अपने कर्ज की रिस्ट्रस्कचरिंग की गुहार लगा रहे थे, वे ही अब किस हौसले से कर्ज लेंगे, यह देखने वाली बात होगी। अमूमन जो सामान्य परिस्थिति में कर्ज लेने का हौसला नहीं दिखा रहे थे, वे अत्यंत ही विषम हालात में कर्ज की ओर रुख करेंगे तो उनकी हालत कैसी होगी, समीचीन प्रसंग है? यह एक खुली सच्चाई है कि कर्ज के भंवरजाल के कारण एसबीआई को चार महीने में अपनी एफडी की रेट तीन बार घटानी पड़ी और सेविंग्स अकाउंट का रेट गिराते-गिराते तीन फीसद की हद तक ले आना पड़ा। वास्तव में, इन सम-विषम हालातों से गुजर रहे बैंक एक बार फिर कर्ज बाजार में किस प्रकार उतरते हैं, कितनी तैयारी से उतरते हैं, या फिर पिछली लापरवाही से सबक लिए बिना ही उतरते हैं, यह सब देखना-जानना-सुनना और भी दिलचस्प होगा। वजह यह भी कि जो बैंक जमाकर्ताओं के भरोसे ही चलते हैं, उनके हालात आज ऐसे बन गए हैं कि उनकी गर्दन पर ही दुधारी छुरी चल रही है। आलम यह है कि महंगाई दर छह प्रतिशत के सापेक्ष बचत खाता (सेविंग्स अकाउंट) पर तीन प्रतिशत रिटर्न जमाकर्ताओं की आशाओं पर कितना भारी तुषारापात है, यह तो नहीं चाहते हुए भी समझना ही होगा, और अन्य लोगों को यह समझाना भी पड़ेगा कि इन विपरीत परिस्थितियों में जमाकर्ता (डिपॉजिटर) कहां, कब और कितना रोयें। और, पहले से ही बदहाल बैंक भी आखिरकार करें तो क्या करें, ताकि आम लोगों से लेकर खास लोगों की जिंदगी पुन: पटरी पर लौटे और सम्पूर्ण बैंकिंग व वित्तीय व्यवस्था से उनकी आस्था डिगे नहीं, मतलब कि भरोसा कायम रहे। (समाप्त)