रोजगार को पैदा करता उपभोग और उत्पादन का अंतर
   Date21-May-2020

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कमलेश पांडे
को रोना संकट के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपए के विशेष आर्थिक पैकेज से किसको क्या फायदा मिलेगा और किसके हाथ खाली रह जाएंगे, इसको लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। एक ओर सत्तापक्ष जहां इसकी खूबियां बताते हुए अघा नहीं रहा है, वहीं विपक्ष पाई पाई का हिसाब गिनाकर इसे एक और जुमलेबाजी करार देने पर तुला हुआ है। मुख्यधारा की प्रिंट, टीवी और वेब मीडिया से इतर सोशल मीडिया पर जो सकारात्मक-नकारात्मक बहस छिड़ी हुई है, उसके दृष्टिगत सबके मन में एक ही सवाल उभर रहा है कि यह पैसा आएगा कहां से, और जाएगा कहां?
इसे स्पष्ट करने से पहले आपको यह एहसास दिलाना जरूरी है कि भारत सिर्फ एक देश ही नहीं है, बल्कि एक समर्थ देश से आगे यह इस पृथ्वी के एशिया महादेश का एक ऐसा उर्वर भूभाग है, जहां सम्पूर्ण विश्व की जनसंख्या का छठां हिस्सा निवास करता है। सच कहा जाए तो यह विभिन्न संस्कृतियों तथा धार्मिक विचारों का एक ऐसा अद्भुत समुच्चय है, जिस पर दुनिया के अन्य तटस्थ देश भी नाज करते हैं। ऐसे सद्भावी भारत द्वारा उत्पादित सकल वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य (जीडीपी-नॉमिनल) जहां इसे विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाता है, वहीं पर क्रय शक्ति क्षमता (जीडीपी-परचेज पावर पार्टिटी) के मामले में यह चीन और अमेरिका के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था समझा जाता है।
आशय स्पष्ट है कि हमारे द्वारा उपभोग किए जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य हमारे द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य से कहीं अधिक है, और उपभोग-उत्पादन के बीच का यह अंतर ही सबसे बड़ा अवसर है, संभावना है, यहां की अर्थव्यवस्था को बड़ा बनाने का, आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों के आकार को बड़ा करने का। प्रधानमंत्री मोदी ने गत दिनों देश के नाम अपने संबोधन में इसी अवसर की बात की थी। जाहिर है कि उपभोग-उत्पादन के अंतर को पाटने के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन बढ़ाने का मतलब ही रोजगार के नए अवसरों सहित अन्य अनेक आर्थिक गतिविधियों का सृजन भी है, जिससे स्वदेशी की अवधारणा भी परिपुष्ट होगी।
देखा जाए तो वैश्विक महामारी करार दिए जाने वाले कोरोना संकट को थामने के उद्देश्य से जारी देशव्यापी तालाबंदी के कारण गत 50 दिन से ज्यादा समय से देश की आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं। लिहाजा, इस तालाबंदी और उससे उपजी परिस्थितियों ने हर आम व खास को विभिन्न तरीकों से प्रभावित किया है। वहीं, सबसे बड़ा आसन्न संकट देश के आर्थिक व औद्योगिक केंद्रों पर कार्यरत प्रवासी मज़दूरों व छोटे-मोटे व्यवसाय से आजीविका अर्जित करने वाले करोड़ों लोगों के समक्ष उत्पन्न हुआ है, जिसको समझे बिना व उसके सम्यक निराकरण के बिना कोई भी उपाय सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता है। सच कहूं तो क्रमवार बीत चुके तीन तालाबंदी और आगामी 31 मई तक जारी इसके चौथे चरण के चलते लगभग थम-सी गई आर्थिक व औद्योगिक गतिविधियों को गतिशील करने और लगभग दो महीने से अधिक समय से करोड़ों लोगों के समक्ष उत्पन्न आजीविका के संकट से पार पाने के उद्देश्य से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपए से अधिक के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है, जो देश की वर्तमान जीडीपी का तकरीबन 10 प्रतिशत के समतुल्य है। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के पैकेज में पूर्व में रिज़र्व बैंक व वित्त मंत्रालय द्वारा घोषित लगभग आठ लाख करोड़ रुपए का प्रावधान भी शामिल हैं। इस तरह से यह पैकेज लगभग 12 लाख करोड़ का रह जाएगा। कहना न होगा कि यदि पूर्व में घोषित रियायतें इसमें शामिल नहीं की जाती हैं तो नि:संदेह यह पैकेज महीनों से ठप पड़ी आर्थिक गतिविधियों के लिए संजीवनी साबित होंगी। जहां तक सवाल उठ रहा है कि कोरोना संकट से उत्पन्न परिस्थितियों से निपटने के लिए यह 20 लाख करोड़ आएगा कहां से और इससे लाभ किसे मिलेगा? तो उसके सापेक्ष यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि 20 लाख करोड़ रुपए का यह पैकेज भौतिक रूप में किसी को दिया ही नहीं जाना है। लिहाजा, वह आएगा कहां से, यह प्रश्न ही बेमानी हो जाता है। वस्तुत: यह पैकेज करों में लंबे समय के लिए छूट, ब्याज देनदारियों में छूट, ऋ ण माफी यथा- कृषकों तथा कुटीर उद्योगों, स्वयंसेवा समूहों, सूक्ष्म व लघु उद्यमियों का तथा नई आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों को शुरू करने के किए वित्तीय सहायता के रूप में है।
नि:सन्देह, मोदी सरकार द्वारा घोषित कोविड राहत पैकेज से देश के 135 करोड़ लोगों को क्या मिला, क्या नहीं, इसका वाजिब फलितार्थ जानने-समझने के लिए हमें पीएम मोदी की गत 12 मई की घोषणा के साथ साथ उसपर केंद्रित केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की पंचदिवसीय व्याख्या को समझना होगा, जिसमें उन्होंने परिश्रम पूर्वक बहुत सारी बातें स्पष्ट करने की सार्थक कोशिशें की हैं। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंतिम दिन गत 17 मई को पता चला कि इसका सेंसेक्स 20 लाख करोड़ से उछलकर 20.97 लाख करोड़ रुपए पर रविवार को बंद हुआ है।
इस प्रकार देखा जाए तो जहां कोविड तालाबंदी के दौरान बहुत सारे उद्योग-व्यापार संघ बजट से सीधे अर्थव्यवस्था में दस लाख करोड़ रुपए बतौर राहत पैकेज डालने की मांग कर रहे थे, वहीं सरकार ने बीस लाख करोड़ से अधिक की घोषणा की और हिसाब दे दिया 20.97,053 लाख करोड़ का। भला और क्या चाहिए किसी को? अब तो कोई भी दुकान, प्रतिष्ठान न तो बंद होना चाहिए, न ही बैंकों के समक्ष आर्थिक धर्मसंकट उत्पन्न होना चाहिए, और न ही हम भारत के लोगों को हैरान-परेशान होना चाहिए, बशर्ते कि यदि सबकी नीयत साफ हो, स्वदेशी हो और राष्ट्रवादी भी। लेकिन कर्ज लेकर गटक जाने और खुद को नंगा घोषित कर कारोबार बदलकर उसे गुप्त निवेश से व्यक्तिगत व गुटगत गुलछर्रे उड़ाने वाली आर्थिक संस्कृति में जो पले बढ़े हैं, उनके गले यो पीएम मोदी के प्रयास कभी नहीं उतरेंगे और शायद ऐसे ही लोगों को नंगा करना उनका सियासी मकसद भी हो सकता है। बेशक, हमारे देश में लोकतंत्र है, इसलिए यह सवाल तो उठाया ही जाना चाहिए कि क्या ऐसा ही होगा? शुभेच्छा व्यक्त भी की जानी चाहिए कि ऐसा ही हो। लेकिन इस बहुप्रचारित राहत पैकेज के ढांचे की परतें उधेडऩे पर प्रथम दृष्टया ऐसा कतई नहीं लगता, उनकी नजरों से, जिनकी फितरतों को समझाने के लिए कुछ बातें यहां कुरेदता हूं। मसलन, पहले यह समझ लेना होगा कि राहत पैकेज की प्रधानमंत्री द्वारा 12 मई को की गई घोषणा के पहले एक लाख 92 हजार 800 करोड़ रुपए की घोषणाओं को, और फिर 22 मार्च से दी गई टैक्स रियायत की वजह से हुए 7,800 करोड़ रुपए के राजस्व क्षति की प्रतिपूर्ति तथा रिजर्व बैंक द्वारा की गई अलग-अलग घोषणाओं के आठ लाख करोड़ रुपए भी इसी में शामिल हैं। हालांकि, सरकार ने 56 दिनों में 20.97 लाख करोड़ रुपए के केंद्रीय राहत पैकेज की जो घोषणा की है, उनमें से विगत पांच दिनों में 11 लाख करोड़ रुपए का ही ऐलान हुआ है। मतलब उन पांच दिनों में की गई पांच प्रेस कॉन्फ्रेंसों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने जो अपने साढ़े सात घंटे लगाए और 51 घोषणाएं कीं, उसके गहरे निहितार्थ हैं। अंतिम दिन की 8 घोषणाओं ने तो सबके मन को छू लिया। क्योंकि ये सभी घोषणाएं मनरेगा, स्वास्थ्य, कारोबार, कंपनी एक्ट, ईज आफ डूइंग बिजनेस, पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज और राज्य सरकारों को लेकर थीं। मसलन, इसमें सबसे बड़ी बात यही कही गई कि स्ट्रैटजिक सेक्टर को छोड़कर बाकी पब्लिक सेक्टर अब प्राइवेट सेक्टर के लिए भी खोल दिए जाएंगे और यदि कोरोना तालाबंदी की वजह से किसी कंपनी को नुकसान हुआ है तो एक साल तक उस पर दिवालिया की कार्रवाई नहीं की जाएगी। (क्रमश:)