शांति से संभव प्रभु चेतना का अनुभव
   Date21-May-2020

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धर्मधारा (भाग-1)
जा पान में कोई दो सौ वर्ष पहले एक बहुत अद्भुत संन्यासी हुआ। उस संन्यासी की एक ही शिक्षा थी कि - जागो! नींद छोड़ दो। उस संन्यासी की खबर जापान के सम्राट को मिली। सम्राट जवान था, अभी नया नया राजगद्दी पर बैठा था। उसने उस फकीर को बुलाया और उस फकीर से प्रार्थना की, मैं भी जागना चाहता हूं। क्या मुझे जागना सिखा सकते है?
उस फकीर ने कहा, सिखा सकता हूं,लेकिन राजमहल में नहीं, मेरे झोपड़े पर आना पड़ेगा! और कितने दिन में सीख पाएंगे, इसका कोई निश्चय नहीं है। यह आदमी की तीव्रता पर निर्भर करता है, एक-एक आदमी के असंतोष पर निर्भर करता है कि वह कितना प्यासा है, तुम्हारी प्यास कितनी है, तुम्हारी अतृप्ति कितनी है, तुम्हारा डिसकटेंट कितना है, उस मात्रा में निर्भर होगा कि तुम कितने जल्दी सीख सकते हो।
और मेरी शर्त है कि बीच से वापस आने नहीं दूंगा, अगर सीखना हो तो पूरी तैयारी करके आना। और साथ में यह भी बता दूं कि मेरे रास्ते अपने ढंग के हैं। तुम यह मत कहना कि यह मुझसे क्या करवा रहे हो, यह क्या सिखा रहे हो, मेरे अपने ढंग हैं सिखाने के। राजा राजी हो गया और उस फकीर के आश्रम पहुंच गया। दूसरे दिन सुबह उठते ही उस फकीर ने कहा कि आज से तुम्हारा पहला पाठ शुरू होता है। पहला पाठ यह है कि मैं दिन में किसी भी समय तुम्हारे ऊपर लकड़ी की नकली तलवार से हमला करूंगा... तुम किताब पढ़ रहे हो, मैं पीछे से आकर नकली तलवार से तुम्हारे ऊपर हमला कर दूंगा। तुम झाड़ू लगा रहे हो, मैं पीछे से आकर हमला कर दूंगा। तुम खाना खा रहे हो, मैं हमला कर दूंगा। दिनभर होश से रहना! किसी भी वक्त हमला हो सकता है, सावधान रहना! अलर्ट रहना! किसी भी वक्त मेरी तलवार-लकड़ी की तलवार- तुम्हें चोट पहुंचा सकती है।
हैरान राजकुमार ने कहा कि मुझे तो जागरण शिक्षा के लिए बुलाया गया था? और यह क्या करवाया जा रहा है? मैं कोई तलवारबाजी सीखने नहीं आया हूं, लेकिन गुरु ने पहले ही कह दिया था कि इस मामले में तुम कुछ पूछताछ नहीं कर सकोगे। मजबूरी थी। शिक्षा शुरू हो गई, पाठ शुरू हो गया। आठ दिन में ही उस राजकुमार की हड्डी-पसली सब दर्द देने लगी, हाथ-पैर सब दुखने लगे। जगह-जगह से चोट! किताब पढ़ रहे हैं, हमला हो गया। घूमने निकला है, हमला हो गाया। दिन में दस पच्चीस बार कहीं से भी हमला हो जाता, लेकिन आठ दिन में ही उसे पता चला कि धीरे-धीरे एक नये प्रकार का होश, एक जागृति उसके भीतर पैदा हो रही है। (क्रमश:)