दोनों पहलुओं पर चिंतन जरूरी...
   Date18-May-2020

vishesh lekh_1  
किसी भी समाज-राष्ट्र की स्वास्थ्यगत चिंता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है उस समाज-राष्ट्र की आर्थिक सक्रियता या कहें कि मजबूती...कोरोनाकाल के इस महामारी संकट में समाज-राष्ट्र दोनों ही स्वास्थ्यगत और आर्थिक रूप से विचलित नजर आ रहे हैं... और केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार रह-रहकर दोनों के उपचार के अनथक प्रयासों को आगे भी बढ़ा रही है... इसके लिए भारत ही नहीं, बल्कि अन्य देशों की सरकारें भी मन बना रही हैं, तो यह पहल स्वागतयोग्य है... दिल्ली की प्रदेश सरकार को ही लोगों ने पांच लाख से ज्यादा सुझाव दिए हैं, तो अन्य राज्यों को भी निश्चित ही बड़ी संख्या में सुझाव मिले होंगे... यह बहुत जरूरी है कि राज्य सरकारें अपने सजग बहुमत के साथ आगे बढ़ें... जहां तक उद्योगों-कारखानों को खोलने का सवाल है, तो इस पर सरकारें पहले ही सहमत हैं... अब आगे सार्वजनिक परिवहन और बाजारों को खोलने की मांग सबसे बड़ी है... हमारे समाज की ये दोनों जरूरतें बहुत महत्वपूर्ण हैं... सरकारों को अच्छे से पता है, बाजार खोलने का अर्थ है, भारत के विशालकाय रिटेल सेक्टर को खोलना... भारत की जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र से आता है और लगभग चार करोड़ लोगों को इस क्षेत्र से सीधे रोजी-रोटी नसीब होती है... एक अनुमान के अनुसार, इन चार करोड़ लोगों में से बमुश्किल 10 प्रतिशत ही अभी अपने काम में सक्रिय हैं... हालांकि राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में अनेक जरूरी रिटेल स्टोर्स को खोल दिया गया है... आश्चर्य नहीं कि लोगों के सुझाव के बाद दिल्ली सरकार भी बाजार को खोलने के पक्ष में दिखती है... बाजार में मांग बढ़ेगी, तो जाहिर है, तमाम तरह की वस्तुओं की मांग बढ़ेगी, कल-कारखाने आपूर्ति के लिए बाध्य होंगे और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगेगी... हालांकि बाजार को खोलने से भी ज्यादा जरूरी है सार्वजनिक परिवहन को मंजूरी देना... इसके चालू होते ही न केवल बाजारों और कल-कारखानों में मजदूरों की उपस्थिति बढ़ेगी, बल्कि जो लोग आज पैदल चलने को मजबूर हैं, उन्हें भी राहत का एहसास होगा... यह समझना कठिन नहीं कि बाजार और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अगर एक चौथाई भी खोल दिया जाए, तो मजदूरों को अपनी-अपनी जगह रुकने की वजह मिल जाएगी, वे फिर कामकाज में सक्रिय हो जाएंगे... लेकिन सावधान, अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोलते जाने की दिशा में बढऩे की बुनियादी शर्त है शारीरिक दूरी सुनिश्चित करना... लोगों को साधन, स्थान और परिवेश ऐसा देना होगा कि वे शारीरिक दूरी रख पाएं... साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि व्यक्ति की स्वास्थ्यगत सुधारों की चिंता करते हुए उसके आर्थिक पक्ष को भी कहीं-न-कहीं आवश्यक राहत या कहें आक्सीजन मिलती रहे, ताकि उसके कारण राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी निर्बाध बनी रहे... इसी तरह के प्रयासों से कोरोना संकट से मुक्ति मिलेगी...
दृष्टिकोण
सड़कों पर दम तोड़ती जिंदगियां...
अपने घरों को लौटते प्रवासी मजदूरों के साथ रह-रहकर जो सड़क हादसे हो रहे हैं और जिस तरह से उनकी जीवन लीलाएं खत्म हो रही हैं, वह समाज व सरकार के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण है और होना भी चाहिए... क्योंकि जिस कोरोना के संकट से बचने के लिए लोग पलायन कर रहे हैं, अन्य दूसरा संकट उनके प्राणों के हरण करने का कारण बन रहा है... जिस पर प्रशासनिक सक्रियता से रोक संभव है... घर लौटते मजदूरों के साथ हो रहे सड़क हादसे सिर्फ शर्मनाक ही नहीं, बल्कि अमानवीय भी हैं... ऐसे हादसे लोगों के दु:ख को पहले से ज्यादा गंभीर और गाढ़ा कर जाते हैं। शनिवार को उत्तरप्रदेश में ट्रक की टक्कर से दो दर्जन से अधिक मजदूरों की मौत हो गई... इसके पूर्व में भी बुधवार-गुरुवार को 24 घंटे से भी कम समय में अनेक दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें से तीन दुर्घटनाओं में 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं और 16 से ज्यादा लोगों की जान चली गई... सबसे दु:खद हादसा उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर-सहारनपुर रोड पर हुआ, जब रात के अंधेरे में चल रहे छह मजदूरों को एक बस ने कुचल दिया... पंजाब से बिहार के अपने गांव जा रहे इन मजदूरों का दोष क्या था..? गरमी के इन दिनों में तपती दोपहरी में सड़क पर पैदल यात्रा से बचते हुए वे रात में ही ज्यादा से ज्यादा दूरी तय कर रहे हैं, तो यह सही और स्वाभाविक है, लेकिन ऐसे बेबस लोगों को कुचलने वाले कौन लोग हैं..? कौन है, जिसे देश की हकीकत नहीं पता..? कौन है, जिसे ऐसे बुरे वक्त में भी सड़क पर चल रहे लाचार मजदूरों की चिंता नहीं है..? राजमार्गों पर चल रहे छोटे और भारी वाहनों को इस वक्त अतिरिक्त सतर्कता के साथ यात्रा करनी चाहिए... जो प्रशासन मजदूरों के पलायन को नहीं रोक सकता, वह कम से कम इन मार्गों पर वाहन चला रहे ड्रायवरों को सजग रहने के लिए पाबंद तो कर ही सकता है...