शहीदों को प्रणाम, आतंकिस्तान की नींद हराम
   Date18-May-2020

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प्रभात झा
आ ज पूरा विश्व कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहा है। मानव जीवन संकट में है। संकट के इस दौर में भारत विश्व बंधुत्व के अपने मानवतावादी चरित्र के अनुकूल आस-पड़ोस सहित पूरे विश्व में समन्वय को बढ़ावा दे रहा है। भारत ने जहां कई देशों के साथ अपनी चिकित्सकीय विशेषज्ञता को साझा किया है, वहीं अपनी जरूरतों के बावजूद 123 से अधिक देशों को चिकित्सा आपूर्ति सुनिश्चित की है, लेकिन संकट के इस दौर में भी पाकिस्तान अपनी अमानवीय हरकतों से बाज नहीं आ रहा। कोरोना से लड़ाई में पाकिस्तान ने अपने नागरिकों को मरने के लिए तो छोड़ ही दिया है, वहीं आतंकवाद फैलाने की अपनी हरकत से भी बाज नहीं आ रहा है। शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 'जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से जूझ रही है, तब कुछ लोग आतंकवाद का वायरस फैला रहे हैंÓ।
3 मई को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हंदवाड़ा में आतंकियों से लोहा लेते हुए सेना की 21 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल आशुतोष शर्मा समेत 5 जवान शहीद हो गए। शहीद होने वालों में कर्नल आशुतोष शर्मा के अलावा, मेजर अनुज सूद, नायक राजेश कुमार, लांस नायक दिनेश सिंह और जम्मू-कश्मीर पुलिस के सब-इंस्पेक्टर शकील काजी शामिल हैं। वहीं 4 मई को हंदवाड़ा में हुए एक और आतंकी हमले में सीआरपीएफ के तीन जवान शहीद हो गए। गौरतलब है कि सेना ने जम्मू-कश्मीर में पांच साल बाद आतंकी मुठभेड़ में कोई कमांडिंग ऑफिसर खोया है।
पाकिस्तान भारत से पूर्व में चार-चार युद्धों में मुंह की खा चुका है। अभी हाल में बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद जरूर शांति रही, लेकिन पाकिस्तान की हरकतें फिर से बढ़ गई हैं। 30 मई 2019 से लेकर 20 जनवरी 2020 तक सीजफायर उल्लंघन की 2335 घटनाएं हुई हैं, लेकिन इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह तक सीजफायर उल्लंघन की 1200 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। कोरोना वायरस संकट शुरू होने के बाद ऐसी घटनाओं में और तेजी आई। जनवरी में ऐसी घटनाएं 367 थीं, फरवरी में 366 हुईं, मार्च में इसकी संख्या बढ़कर 411 हो गईं और अप्रैल के पहले सप्ताह तक 60 से अधिक सीजफायर उल्लंघन की घटनाएं हो चुकी थीं, लेकिन हंदवाड़ा की घटना ने एक बार फिर पूरे देश को आक्रोशित कर दिया है। देश एक बार फिर सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की बात कर रहा है। देश का सैनिक मन-मस्तिष्क से सदैव इसके लिए तैयार रहता है। परिवार, समाज, राष्ट्र सब उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े होते हैं।
भारतीय सैनिकों की शहादत की लंबी और गौरवपूर्ण गाथा है। आजादी के बाद भारत ने पाकिस्तान को चार बार हराया है, 1948, 1965, 1971 और 1999 के कारगिल युद्ध में। भारत माता की रक्षा करते हुए आजादी से लेकर अब तक देश के 35 हज़ार से अधिक सैनिक शहीद हुए हैं। आजादी के बाद पहले और 1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 1500 से अधिक सैनिक शहीद हुए थे। वहीं 1962 के भारत-चीन युद्ध में देश के 1383 सैनिक शहीद हुए थे। 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में क्रमश: 2,862 और 2,998 सैनिक शहीद हुए थे। वहीं 1999 के कारगिल युद्ध में देश के 527 सैनिक शहीद हुए थे। भारतीय सेना का एक जवान हर तीसरे दिन शहीद होकर भारत माता को अपना सर्वोच्च बलिदान देता है। एक-एक शहीद अपनी शहादत से भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परंपरा के मस्तक को ऊंचा करता है।
हमें यहां समझना होगा कि जब कोई सेना में भर्ती होता है तो उसके मन-मस्तिष्क में वतन होता है, वेतन नहीं। वतन की रक्षा के लिए अगर शहीद भी होना पड़े तो वे पीछे नहीं हटते। परिवार की सहमति से सेना में जाता है और सैनिक बनता है। परिवार को आश्वस्त करके जाता है कि स्वयं मिट भी जाऊं, लेकिन वतन पर आंच नहीं आने दूंगा। सैनिक अपनी जन्म देने वाली मां को कहता है कि 'मैं भारत माता की रक्षा करने जा रहा हूं, तेरी रक्षा परिवार करेगा, समाज करेगा, पूरा राष्ट्र करेगाÓ। मां का आशीर्वाद लेकर निर्दोष मन से सीमा पर मातृभूमि की रक्षा के लिए चला जाता है। लक्ष्य में 'भारत माता जिंदाबादÓ और 'तिरंगाÓ होता है। मौत का डर नहीं होता। आंखों में सिर्फ भारत माता का चेहरा होता है। वह भारत और भारतीयों की रक्षा के लिए हर क्षण लड़-मरने को तैयार होता है। 'वंदे मातरमÓ सुनते ही वह रोमांचित हो जाता है। गांव का कोई व्यक्ति जब सेना में जाता है तो पूरे क्षेत्र में चर्चा होती है। उस परिवार की चर्चा होती है। उस परिवार को गर्व होता है। हर सैनिक को यह गर्व होता है कि पूरा भारत उसके साथ है। उसका परिवार, उसका समाज सब उसके साथ है।
जम्मू और कश्मीर के हंदवाड़ा एनकाउंटर में 3 मई को शहीद हुए कर्नल आशुतोष शर्मा की पत्नी श्रीमती पल्लवी शर्मा कहती हैं- 'मुझे गर्व है कि पति देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए। उनकी शहादत पर आंसू नहीं बहाऊंगी। देश के लिए कुर्बान होना सम्मान की बात है, यह उनका फैसला था, इसका पूरा सम्मान करूंगीÓ। वे यह भी कहती हैं- 'हमें उन पर गर्व है। उनकी यूनिट उनके लिए प्राथमिकता थी और वह उनका जुनून था। उनकी जगह हमारी जिंदगी में कोई भर नहीं सकता और उनका जाना हमारे लिए एक कभी न पूरा होने वाला नुकसान है, लेकिन उन्होंने अपने जवानों और नागरिकों की सुरक्षा के लिए जो किया, उस पर मुझे गर्व है।Ó कुपवाड़ा के हंदवाड़ा में ही वतन की रक्षा करते हुए शहीद हुए जवान अश्विनी कुमार यादव के पार्थिव शरीर को उनके चार साल के बेटे ने मुखाग्नि दी, जबकि छह साल की बेटी ने अंतिम सलामी दी।
28 जून 1999 को कारगिल युद्ध में शहीद हुए मेजर पद्मपानी आचार्य की मां ने उनकी शहादत पर कहा था- 'एक मां के रूप में, मैं निश्चित रूप से दु:खी होती हूं, लेकिन एक देशभक्त के रूप में, मुझे अपने बेटे पर गर्व है। मैं शायद जीवित न रहूं, लेकिन वह हमेशा जीवित रहेगा। उसने मुझसे वादा लिया था कि उसके शहीद होने पर मैं रोऊंगी नहीं।Ó शहादत की ऐसी अनेकों प्रेरणास्पद कहानियां हैं और ये सहज नहीं हैं। यह शोध का विषय है कि शहीदों की शहादत के बाद दु:ख होना स्वाभाविक है, लेकिन मातम नहीं होता, आज भारत में युद्ध विधवा का जो सम्मान है, दुनिया में कहीं नहीं है। उन्हें श्रद्धा, पवित्रता और सम्मान के साथ देखा जाता है। गांव, समाज, राष्ट्र सभी सम्मान से देखते हैं। उनका दु:ख देश अपना दु:ख समझता है।
शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा की पत्नी पल्लवी शर्मा ने जो कहा, शहीद मेजर पद्मपानी आचार्य की मां ने जो कहा, शहीद सैनिक अश्विनी कुमार यादव की छह साल की बेटी ने जो व्यक्त किया, वह नारी एवं दैवीय शक्ति की अभिव्यक्ति है। पूरे देश ने देखा, उनके चेहरे पर यह शक्ति साफ़ झलक रही थी। न बच्चे को रोने दिया, न स्वयं रोया। यह सहज घटना नहीं है। यह है भारतीय सेना और उसके परिवार का चरित्र। भारत का मस्तक ऊंचा रहे, इसके लिए सैनिक ही नहीं, उसका परिवार भी त्याग के लिए तैयार रहता है। अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए नहीं, मातृभूमि की रक्षा के लिए सैनिक बनते हैं। माटी का कर्ज उतारने के लिए शहीद की माता जोर देकर कहती है कि 'मेरा दूसरा बेटा भी देश के लिए शहीद होगा तो मुझे गर्व होगाÓ।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद)
(क्रमश:)