आत्मसुधार ही जीवन की सार्थकता
   Date18-May-2020

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धर्मधारा
बौ द्धिक विकास के साथ भावनात्मक परिपक्वता एवं संतुलन के लिए हम कितने सचेष्ट हैं, यह भी महत्वपूर्ण है। क्या हम छोटी-छोटी बातों पर भावुक तो नहीं हो जाते, हमारा व्यवहार थोड़े से दबाव में बिफर तो नहीं जाता, कहीं हम तुनकमिजाज तो नहीं हैं। इनका मूल्यांकन कर हम अपने भावों के संयम, संतुलन एवं विकास को साधने का प्रयास करते हैं। इसके साथ व्यावहारिक समायोजन जुड़ा होता है। क्या हम आपस में तालमेल बैठाकर किसी महत्तर उद्देश्य के लिए कार्य कर सकते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि दूसरों की भावनाओं की परवाह किए बिना अहंकेंद्रित इक्कड़पन ही अपना स्वभाव बन बैठा है। इसे सुधारकर आत्मविकास एवं विस्तार की प्रक्रिया को गतिशील किया जा सकता है। परिवार-समाज एवं गृहस्थ जीवन में आर्थिक संतुलन मूल्यांकन का एक पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या आपातकाल के लिए, अपने बच्चों की शिक्षा, परिवार जनों के स्वास्थ्य एवं भावी आवश्यकताओं के लिए आवश्यक अर्थ का संचय है या नहीं-इन सबका मूल्यांकन कर आवश्यक अर्थ-उपार्जन एवं संग्रह की रीति-नीति को निर्धारित कर अपने पुरुषार्थ का नियोजन किया जा सकता है। इसी तरह अपने व्यक्तित्व को दुर्बल बना रही कमजोरियों को पहचानना स्व-मूल्यांकन का एक अभिन्न अंग है। चिह्नित होने पर फिर इन्हें ठोक-पीटकर मजबूत किया जा सकता है। इसी तरह जीवन में सफलता के लिए आवश्यक कौशल का मूल्यांकन किया जा सकता है। सफल जीवन के लिए आवश्यक पेशेवर तकनीकी व जीवन कौशल का मूल्यांकन किया जा सकता है। जहाँ हम कमजोर पड़ रहे हैं, उनको सशक्त करने की रूपरेखा एवं कार्यक्रम बनाया जा सकता है। इन सबके साथ नित्यप्रति रात्रि को सोने से पूर्व तत्वबोध की साधना स्व-मूल्यांकन को पूर्णता देती है, जिसके अंतर्गत दिनभर के कार्यों का लेखा-जोखा लिया जाता है। पूर्व में वर्णित व्यक्तित्व एवं जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बैठकर शांत मन से विचार किया जाता है तथा उनका पुनरावलोकन किया जाता है। यदि संभव हो तो डायरी लेखन के माध्यम से उनको और स्पष्ट रूप में समझा जा सकता है।