विक्रम संवत् की शुरुआत करने वाले चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
   Date25-Mar-2020

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वि क्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से (12 जनवरी 2016) 2287 वर्ष पूर्व हुए थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। नाबोवाहन के पुत्र राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे। कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। विक्रमादित्य उज्जैन नगरी के अनुश्रुत राजा थे, राजा विक्रम अपने ज्ञान, वीरता और विद्वान नीतियों उदारशीलता के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। विक्रम और विक्रमरका के नाम से भी जाने जाते थे। विक्रमादित्य के नाम, काम और विषयों को लेकर इतिहासकार कभी एक मत नहीं रहे। कुछ महानुभावों ने विक्रमादित्य को मलेच्चा आक्रमंकारियो से भारत का परिमोचन कराने वाला भी बताया। इसके साथ ही इस महान शासक को शाकरी की उपाधि भी दी गई थी। विक्रमादित्य इतने महान थे, उनके नाम बाद के राजाओं और सम्राटों के लिए एक पदवी और उपाधि बन गया। महाराजा विक्रमादित्य का सविस्तार वर्णन भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में वर्णन मिलता है। उस वक्त उनका शासन अरब तक फैला था। नौ रत्नों की परंपरा उन्हीं से शुरू होती है। हिन्दू धर्म के शिशुओं के विक्रम नाम विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के लोकप्रिय लोक कथाओं के कारण दिया जाता है। विक्रमादित्य के महानता और उनके पराक्रम की 150 से भी ज्यादा कहानियां हैं।
विक्रमादित्य की गाथा बहुत से राजाओं से जुड़ी हुई है, जिसमें मुख्य रूप से जैन शामिल हैं, लेकिन कुछ दंतकथाओं के अनुसार उन्हें शालिवाहना से हार का सामना करना पड़ा था। विक्रमादित्य ईसा पूर्व पहली सदी के हैं। कथा सरितसागर के अनुसार वे उज्जैन के परमार वंश के राजा के पुत्र थे। हालांकि इसका उद्देश बाद में 12वीं शताब्दियों में किया गया था।
राजा विक्रम का मंदिर : विक्रमादित्य / राजा विक्रमादित्य का गुप्त वंश (240-550 सीई) के पहले काफी उल्लेख किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुप्त वंश आने के पहले विक्रमादित्य ने ही भारत पर राज किया था। इसके अलावा अन्य स्त्रोतों के अनुसार विक्रमादित्य को दिल्ली के तुअर राजवंश का पूर्वज माना जाता था। विक्रमादित्य मां हरसिद्धि के भक्त थे। उनकी एक मूर्ति हरसिद्धि के समीप है। विक्रमादित्य के साथ कई लोक कथाएं जुड़ी हुई हैं। उन्होंने मां हरसिद्धि को प्रसन्न करने के लिए अपना शीष अर्पित कर दिया था।
महान विक्रमादित्य के पराक्रमों को प्राचीन काल में ब्रिहतकथा कर गुनाध्या में बताया गया है। विक्रमादित्य के अवशेषों को ईसा पूर्व पहली सदी और तीसरी सदी के बीच देखा जा सकता है। उस काल में उपर्युक्त पिसाची भाषा आज हमें दिखाई नहीं देती।
कष्ट जानने के लिए रात में भ्रमण : राजा विक्रमादित्य के बारे यह कहा जाता है कि राजा एक श्रेष्ठ और न्यायपूर्ण शासन का व्यव्स्थाप भी थे, जनता के कष्टों को जानने और राजकाल की पड़ताल के लिए राजा विक्रमादित्य छद्मवेश धारण करके रात में भ्रमण करते थे। राजा विद्या और संरक्षक के संरक्षक भी थे।
भारी-भरकम सोना : विक्रमादित्य ने मालवा, उज्जैन और भारतभूमि को विदेशी शकों से मुक्तकर स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद किया था। राजा विक्रमादित्य की सेना में तीन करोड़ पैदल सैनिक, 10 करोड़ अश्व, 24600 गज और चार लाख नौकाएं थी। 5 करोड़ अश्वारोही सैनिक थे, 20 लाख जहाज थे।
राजा विक्रमादित्य के नवरत्न : विक्रमादित्य से संबंधित काफी कथा-श्रंृखलाएं है, जिसमे बेताल बत्तीसी काफी विख्यात है। इसके हमें संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं। इन कहानियों के रूपांतरण हमें कथा-सरितसागर में मिलते हैं। सम्राट विक्रमादित्य की राज्यसभा में नवरत्न कहलाने वाले नौ विद्वान थे। वे थे-1. धनवंतरी, 2. क्षपणक, 3. अमरसिंह, 4. शंकु भट्ट, 5. वेताल भट्ट, 6. घटकर्पर, 7. वाराहमिहिर, 8. वररुचि, 9. कालिदास (संस्कृत के प्रसिद्ध कवि)। रुद्रसागर में कुछ रत्न हैं, इन सभी के भुत से ग्रंथ काफी महत्वपूर्ण रहे हैं और आज भी भारतीय परम्परा को प्रभावित कर रहे हैं।
विशाल सिद्धवट वृक्ष के नीचे बेताल साधना द्वारा विक्रमादित्य ने अलौकिक प्राकृतिक शक्तियां प्राप्त की थी। विक्रम-बेताल की चर्चित कहानियां उनकी इस शक्ति के विषय में समुचित प्रकाश डालती हैं। विक्रमादित्य का सिंहासन अतुलनीय शक्तियों वाला सिंहासन, जो उन्हें भगवान इंद्र ने दिया था। विक्रमादित्य के पश्चात यह सिंहासन लुप्त हो गया था। यह राजा भोज के शासनकाल में मिला और इस पर उन्होंने बैठने का प्रयास किया। सिंहासन में विराजमान शक्तियों ने राजा भोज की योग्यता को परखा और अंतत: उस पर बैठने की अनुमति दी। 'सिंहासन बत्तीसीÓ में इससे संबंधित कथाएं हैं । महान योद्धा - कहा जाता है उज्जैन में विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि और भट्टि राजा विक्रमादित्य के बड़े और छोटे भाई थे। राजपाठ छोड़कर भर्तृहरि योगी बन गए। भट्टि भी माता हरसिद्धि के भक्त थे। कहा जाता है कि भट्टी और विक्रमादित्य ने लम्बे समय तक एक वर्ष को आधा-आधा साझा करते हुए शासन किया। भर्तृहरि ने शासन छोड़ दिया तब शकों ने शान की बागडोर अपने हाथ में लेकर कुशासन क्र आतंक मचाया। ईसा पूर्व 57-68 में विक्रमादित्य ने विदेशी शासक शकों को परस्त कर मालवगण के महान योद्धा बने।