आंतरिक शक्ति, संयम व नियम को संरक्षित-सुरक्षित करने वाला पर्व चैत्र नवरात्र
   Date25-Mar-2020

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आज से चैत्रीय नवरात्र आरंभ
शशिकांत 'सदैवÓ
किसी भी प्रकार की साधना के लिए शक्ति का होना जरूरी है और शक्ति की साधना का पथ अत्यंत गूढ़ और रहस्यपूर्ण है और नवरात्र कुछ और नहीं, शक्ति व साधना का ही पर्व है। हम नवरात्र में व्रत इसलिए करते हैं, ताकि अपने भीतर की शक्ति, संयम तथा नियम से सुरक्षित हो सके; उनका अनावश्यक अपव्यय न हो। संपूर्ण सृष्टि में जो ऊर्जा का प्रवाह है, उसे अपने भीतर रखने के लिए स्वयं की पात्रता तथा इस पात्र की स्वच्छता भी जरूरी है।
शक्ति को भीतर प्रवेश कराने का ही पर्व है नवरात्र। भारतीय धर्म में व्रत का विशेष महत्व है। वस्तुत: व्रत केवल धर्म से नहीं, अपितु हमारे आचरण से भी जुड़े हुए हैं। अलग-अलग व्रतों के माध्यम से हम समूची भारतीयता, धार्मिक संस्कृति और अध्यात्म के मर्म को समझ सकते हैं। हमारे पुराण कई व्रतों को मानव सृष्टि के लिए कल्याणकारी मानते हैं। नवरात्र पर रखे जाने वाले व्रतों का सर्वाधिक महत्व माना गया है। नवरात्र पर मां जगदंबा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र में आदिशक्ति की साधना और व्रत से साधकों को हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह प्रश्न विशेष रूप से उठाया जाता है कि मां के रूपों की साधना रात्रि में ही क्यों होती है? इसके पीछे एक रहस्य है, हम रात का समय सोने के लिए व्यतीत करते हैं। हम तमोगुण की मोह-निद्रा में कई काल तक सोते आए हैं। नवरात्र का संदेश यही होता है कि तमोगुण की मोह-निद्रा से मुक्त होने का अब समय आ गया है। धार्मिक ग्रंथों में भी रात्रि जागरण का विशेष विधान देखने को मिलता है। रात्रि में जागने का अर्थ है निद्रा को छिन्न-भिन्न कर देना या अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए जागकर मां दुर्गा की आराधना करना।
भगवती दुर्गा के अनेक रूप हैं। उनके विभिन्न रूपों के अनुसार उनकी उपासना पद्धतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। सामान्यत: देवी के स्वरूप को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। वे हैं- सात्विक, राजसिक और तामसिक। नवरात्र का समय तीनों ही प्रकृति की देवियों की उपासना के लिए अति उत्तम कहा जा सकता है, लेकिन नवरात्र के नौ दिनों को शक्ति के नौ स्वरूपों में विभाजित किया गया है और इन दिनों शक्ति के नौ रूप हैं- शैलपुत्री, ब्रह्मïचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
क्यों मनाते हैं नवरात्रे : वर्ष में दो नवरात्र होते हैं शारदीय और वासंती। इन दोनों ही नवरात्रों का काफी महत्व है। दोनों नवरात्र संपातों में पड़ते हैं। संपात का अर्थ है- स्थूल रूप से दिन-रात का बराबर होना या पृथ्वी का सूर्य से सम दूरी पर होना। इसी कारण इन दोनों ऋतुओं में ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसकी सही पहचान और विनियोग के लिए दोनों के शुक्ल पक्ष की प्रारंभिक नौ तिथियों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना और व्रत का विधान है। दैवी शक्ति से ओत-प्रोत होने के साथ-साथ भारत एक कृषि प्रधान देश भी है। यहां पर देश की भूमि को मातृभूमि कहा जाता है। इस कृषि प्रधान देश में जब फसल बदल रही होती है तो देवी पर्व मनाते हैं। एक वर्ष में चार नवरात्र मनाई जाती हैं, जिनमें दो गुप्त और दो जगतï् के सामने मनाई जाती है। वर्ष के चार नवरात्र शक्ति संप्रदाय के अनुसार- 1. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा चैत्र मास की नवरात्र (जिसमें चैत्री फसल होती है), वासंतिक नवरात्र। 2. आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा। 3. माघ शुक्ल प्रतिपदा। 4. अश्विनी शुक्ल प्रतिपदा शारदीय नवरात्र आश्विनी मास (ग्वार की फसल वाला समय) अर्थातï् शारदीय नवरात्र।
आषाढ़ के माघ मास के नवरात्र गुप्त माने जाते हैं और चैत्र आश्विनी नवरात्र प्रत्यक्ष होते हैं। इन प्रत्यक्ष नवरात्रों में साधारण हो या विशेष, सभी समूह मां देवीजी की साधना करते हैं। देखा जाए तो ये चार मास ऋतु परिवर्तन के हैं। इस प्रकार सामान्य जन वर्ष में दो बार नवरात्र प्रमुख रूप से मनाते हैं। नवरात्रों में भगवती मां देवीजी की उनके नौ विशेष अवतारों के रूप में पूजा की जाती है। यह पर्व भक्ति भाव से लगातार नौ रात्रियों में देवीजी की पूजा-अर्चना और वंदना का पर्व है और दशमी तिथि का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्र हो या चैत्र पक्षीय नवरात्र हो, इन नौ पवित्र दिनों में शक्ति की पूजा का विशेष विधान है। नवरात्रों की प्रथम तीन रात्रियों में आदिशक्ति दुर्गा की अगली तीन रात्रियों में महालक्ष्मीजी की और अंतिम तीन रात्रियों में देवी सरस्वतीजी की साधना करते हैं। मन एकाग्र हो, अंत:करण शुद्ध हो, आत्मानुशासन, आत्मसंयम, सच्चा ऐश्वर्य, आंतरिक समृद्धि हो; वास्तव में धार्मिक दृष्टि से यह आत्मशुद्धि का पर्व है। इन दिनों की पूजा-पाठ-अर्चना आदि से जीवन में सुख, शांति व समृद्धि आती है। यह पर्व भौतिक तथा नैतिक शक्तियों को समान रूप से जाग्रत करने वाला महोत्सव है। मनुस्मृति में लिखा है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। नारी शक्ति को कोई भी व्यक्ति अस्वीकार तथा तिरस्कार भी नहीं कर सकता। देवी भागवत में उनके विराट स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है। उनके विराट स्वरूप के प्रदर्शन के समय आकाश उनका मस्तक, विश्व उनका हृदय, पृथ्वी जंघा, वेद वाणी और वायु प्राण थी। चंद्रमा एवं सूर्य उनके नेत्र थे, कान दिशाएं थीं, नाभि पाताल, वक्ष ज्योतिष्चक्र, मुख जनलोक तथा पलकें दिन-रात थीं। ऐसा अद्ïभुत स्वरूप तो देवी का ही हो सकता है, जो विश्व के कण-कण में व्याप्त है। वास्तव में यह शक्ति ही विश्व को जन्म देती है, उसका पालन करती है और विनाश भी इसी शक्ति के कारण होता है। ब्रह्मïा को सृष्टि का जन्म देने वाला, विष्णु को पालन करने वाला तथा रुद्र (शिव) को संहार करने वाला कहा जाता है। भले ही जन्म, पालन और संहार के लिए तीन देव हैं, मगर ये तीनों देव भी अपनी-अपनी शक्ति के साथ ही जाने और माने जाते हैं। ब्रह्मïा के साथ महासरस्वती, विष्णु के साथ महालक्ष्मी और रुद्र (शिव) के साथ महाकाली का नाम शक्ति के रूप में जुड़ा है। वैदिक साहित्य में शक्ति सृजति ब्रह्मïांडम् कहकर जिसकी ओर संकेत किया गया है, वह दुर्गा देवी ही हैं। यही देवी ऋग्वेद में अपना परिचय इन शब्दों में देती हैं, मैं स्वयं समग्र जगतï् की ईश्वरी हूं। मैं ही धनदात्री हूं। उपास्य तत्वों में मैं ही श्रेष्ठ हूं। मैं ही एकमात्र उपास्य हूं। मैं ही संपूर्ण जगतï् में हूं। मुझे तुम सर्वरूप में देख रहे हो, मगर पहचान नहीं रहे हो। नवरात्र का पर्व नैसर्गिक पवित्रता और बाल-स्वभाव के आह्वïान का पर्व है। नवरात्र का आह्वïान जितनी सुरुचि, सादगी या प्रकृति के साथ संतुलन रखते हुए किया जाए और जितने बाल-सुलभ भाव व सरल, निश्चल मन से किया जाए, उतना ही मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं। नवरात्र का संदेश हर वर्ष नवसृष्टि का संदेश लेकर आता है तथा चैत्र नवरात्र से ही नए वर्ष का प्रारंभ माना जाता है। नवरात्र प्रथा का आरंभ भारतीय पुराणों में दुर्गा, अर्थात् शक्ति के अवतरण से संबंधित कई कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख कथा के अनुसार शुंभ-निशुंभ नामक महाबली असुरों ने संपूर्ण जगतï् में अपने कुकर्मों से त्राहि-त्राहि मचा रखी थी। इन असुरों के आतंक से भयभीत होकर सभी देवता देवी पार्वती के पास पहुंचे और अपनी व्यथा का बयान किया। देवताओं की पीड़ा को जानकर देवी पार्वती के शरीर से एक कुमारी कन्या दिव्य रूप में प्रकट हुई, जिसने शुंभ-निशुंभ का वध करके पाप का नाश कर दिया। इस प्रकार जब संसार में पुन: धर्म की लहरें उठने लगीं, तब देवताओं ने नवरात्र व्रत रखे तथा मां दुर्गा का श्रद्धापूर्वक पूजन किया। बस तभी से नवरात्र प्रथा का आरंभ हुआ।
(श्री शशिकांत 'सदैवÓ की सद्य:प्रकाशित पुस्तक 'व्रत-उपवास के धार्मिक और वैज्ञानिक आधारÓ से साभार)