जैत से श्यामला हिल्स वाया ग्रेस रिसॉर्ट्स
   Date24-Mar-2020

df13_1  H x W:
प्रसंग : शिव की चौथी पारी
महेश तिवारी
अप्रैल-मई २००४ की भीषण गर्मी में लोकसभा का चुनावी दौर था। एक अलसुबह करीब 4 बजे शिवराजजी लगभग 22 घंटे के अत्यंत कठिन चुनावी जनसंपर्क के बाद अरेरा कॉलोनी के अपने अत्यंत सामान्य से फ्लैट में पहुंचते हैं तो उस समय वहां पर बुधनी से आया हुआ एक सामान्य नागरिक को इंतजार करते हुए वे पाते हैं, जो एक अति सामान्य काम से लेकिन सिर्फ अपने 'पांव-पांवÓ वाले नेता यानी शिवराज भैया से मिलने की जिद में बैठा मिलता है। चिर-परिचित मुस्कान से मिलकर और एक मिनट में उसे संतुष्ट करने के बाद शिवराजजी से सहज जिज्ञासा में एक प्रश्न जो कि किसी भी सहायक का हो सकता था, वह मैंने भी किया कि भाई साहब जिस काम के लिए ये व्यक्ति पिछले 7-8 घंटों से आपका इंतजार कर रहा था, उसे तो अपने स्टाफ का कोई भी व्यक्ति एक मिनट में ही कर सकता था, यह आपने उन्हें क्यों नहीं समझाया, इसका जो जवाब मुझे मिला, वह आज की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण है और वह जवाब ही शिवराज को 'शिव-राजÓ बनाता है।
जवाब था- महेश, ये जो व्यक्ति मेरा इंतजार कर रहा था, ये काम के लिए नहीं, अपने नेता पर अपने हक के लिए इंतजार कर रहा था। इसने कभी मुझे पीले चावल देकर राजनीति में आने का न्योता नहीं दिया था, लेकिन जब मैंने इसे राजनीति को सेवा का माध्यम वाला भाषण दिया है तो इसका भी हक है कि ये मेरी परीक्षा 24 घंटे ले। मध्यप्रदेश में आज जब एक बार फिर सत्ता 'शिव-राजÓ में बदल रही है, तब एक ये छोटी-सी घटना का याद आ जाना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि शिवराजजी के लिए राजनीति के क्या मायने हैं। नानाजी देशमुख के राजनीतिक जीवन की आदर्श गाथा को जीने की चाहत रखने वाले शिवराजजी पर सत्ता के मदहोशी वाले दुर्गण कभी भी इसलिए हावी नहीं हो पाए, क्योंकि शिवराजजी ने जनता के उस मर्म को कभी भी अपने से दूर नहीं होने दिया, जिसके कारण 90 के दशक में एक विधानसभा का पांव-पांव वाला शिवराज भैया पूरे मध्यप्रदेश का सर्वमान्य मामा बना।
2018 में जिस दिन विधानसभा के परिणाम आए और जिस विनम्र पीड़ा के साथ शिवराजजी ने इसे अपनी व्यक्तिगत पराजय के रूप में स्वीकार किया था, उस दिन ही मप्र के करोड़ों लोगों से जो एक आह निकली थी, शायद उस आह ने ही इतनी जल्दी शिवराजजी को एक बार फिर ये मौका प्रदान कर दिया।
2018 के चुनाव काल के पूर्व पूरे मध्यप्रदेश में शिवराजजी अपनी महत्वाकांक्षी यात्रा को लेकर निकले थे तो ये सबने देखा कि पूरे प्रदेश में हर परिस्थिति में शिवराजजी के लिए एक अलग तरह दीवानगी का माहौल था। यह माहौल बाद में राजनीतिक विजय में पूरी तरह क्यों नहीं बदल पाया, इसके बहुत सारे विश्लेषण किए जा सकते हैं, लेकिन जो निर्विवाद अटल सत्य है, वह यह कि शिवराजजी का कद मुख्यमंत्री के पद से नहीं तौला जा सकता है।
शिवराजजी को सिर्फ राजनैतिक रूप से जानने वाले भी उनकी अत्यंत पराकाष्ठा के हद तक किए जाने वाले परिश्रम वो भी विनम्रता के साथ इसके कायल हो ही जाते हैं। 20 मार्च को जब ग्रेस रिसॉर्ट्स से भाजपा के विधायकों का काफिला भोपाल के लिए निकल रहा था, शिवराजजी के ताजपोशी की मुहर के लिए तब भी शिवराजजी के चेहरे पर जो विनम्रता दिख रही थी, यही सादगी फर्क बताती है जैत ग्राम के नर्मदा घाट की निर्मलता और ग्रेस रिसॉर्ट्स के उस मानव निर्मित तालाब के भव्यता के अंतर को।
जिन लोगों ने शिवराजजी को दीनदयाल उपाध्यायजी के एकात्म मानवतावाद पर बोलते हुए सुना होगा, उनने महसूस किया होगा कि शिवराजजी अगर कथावाचक होते तो शायद दीनदयालजी का इससे अच्छा आध्यात्मिक पक्ष कोई भी नहीं रख सकता है, जितना शिवराजजी रखते हैं। एकात्म मानवतावाद के मूल सिद्धांत यानी समाज के अंतिम व्यक्ति को मुख्यधारा से जोडऩे में सत्ता किस तरह सीधे-सीधे सहभागी हो सकती है, वो शिवराजजी बीते दौर में मुख्यमंत्री निवास में आयोजित अनेकों पंचायतों में समाज के अनेकों वंचित समाज की उपस्थिति से सीधे-सीधे दिखाई दे देती थी। मप्र भाजपा के आज तलक के इतिहास में शिवराजजी समाज के हर वर्ग तक सीधे-सीधे ना सिर्फ पहुंचकर सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित हुए वरन उनसे इस तरह जुड़े जो भाजपा में इससे पहले कोई भी नेता नहीं कर पाया था।
जब पहली बार 90 के दशक में शिवराजजी ने बुधनी विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता था, तब वहां पूरे क्षेत्र में उन्हें पांव-पांव वाले भैया के रूप में लोग जानने लगे थे, क्योंकि उस समय के अत्यंत दुबले-पतले बहुत ही सामान्य से चेहरे वाले तत्कालीन विधायक अर्थात शिवराजजी ने अपनी पैदल यात्रा के माध्यम से पूरे विधानसभा क्षेत्र को नाप डाला था। कौन जानता था कि ये पांव-पांव वाला भैया ही बाद में पूरे प्रदेश के मामा के रूप में स्थापित हो जाएगा। ये मामा की उपाधि भी अपने आप में बड़ी रोचक है। शिवराजजी जब से सांसद बने थे, तब से भाभीजी के साथ मिलकर अपनी सालभर की जमा पूंजी से कन्या विवाह करवा ही रहे थे, जैसे ही वो मुख्यमंत्री बने, उनकी ये स्वभाविक प्रक्रिया को उन्होंने बड़े पैमाने पर पूरे प्रदेश में लागू करवाया और पूरे प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मियों के मामा बन गए।
शिवराजजी के मुख्यमंत्री रहते हुए अनेक अवसर आए, जब शिवराजजी को एक प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि आम जनता ने अपने बीच के एक सामान्य नागरिक के रूप में पाया। 2016 सिंहस्थ के दौरान आई प्राकृतिक आपदा के समय किस तरह बांधवगढ़ से भागे-भागे उज्जैन पहुंचकर चाय पिलाते और बांस-बल्ली बांधकर टूटे शामियाने खड़े कर रहे वाले दृश्य हो या पेटलावद हादसे के बाद साहसिक निर्णय लेते हुए सीधे जनता के बीच जाकर बैठ जाने की चुनौती, ये पूरे प्रदेश ने देखा था। कल 23 मार्च को जब शिवराज सिंह चौहान विधायक दल के नेता चुने गए, तब आभार व्यक्त करते हुए शिवराज जब कह रहे थे कि भाजपा मेरी माँ है और फिर से मुझे दूध का कर्ज उतारने का अवसर मिला है। ये समय जश्न का नहीं, कोरोना से मिलकर लडऩे का है, आज रात से ही मैं इस काम में लग जाऊंगा। ये भावुक वक्तव्य ही एक पूरा व्रतचित्र है शिवराज के आने वाले 'शिव-राजÓ के बनने का।
(लेखक - शिवराजसिंह चौहान के पूर्व निज सचिव रहे हैं, वर्तमान में स्वदेश के संचालक हैं)