एकाग्रता
   Date24-Mar-2020
 
prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
बा त उस समय की है, जब स्वामी 'विवेकानंदÓ शिकागो के व्याख्यान के बाद अमेरिका में प्रसिद्ध हो गए थे। वहाँ घूम-घूमकर वेदांत का प्रवचन दिया करते थे। इस सिलसिले में उन्हें अमेरिका के अंदरुनी इलाके में जाना होता था, जहां धर्मान्ध और संकीर्ण विचारधारा वाले लोग रहते थे। एक दिन स्वामीजी को ऐसे ही एक कस्बे में बुलाया गया था। एक खुले मैदान में लकड़ी के बक्सों को जमाकर एक मंच तैयार किया गया था। स्वामीजी ने उस पर खड़े होकर वेदांत, योग और ध्यान पर अपना व्याख्यान देना शुरू किया। बाहर से गुजरने वाले लोग भी उनकी बातें सुनने लगे, जिनमें कुछ चरवाहे भी थे। थोड़ी देर में उनमें से ही कुछ ने अपनी बंदूकें निकालीं और स्वामीजी की ओर निशाना दागते लगे। कोई गोली उनके कान के पास से गुजरती, तो कोई उनके पाँव के पास से। नीचे रखे बक्से तो छलनी हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद स्वामीजी का प्रवचन पहले की तरह ही धाराप्रवाह चलता रहा। वह न थमे, न उनकी आवाज ही काँपी। अब चरवाहे भी वहाँ ठहर गए। वे व्याख्यान के बाद स्वामीजी से बोले- आपके जैसा व्यक्ति हमने पहले कभी नहीं देखा। हमारी गोलीबारी के बीच आपका भाषण ऐसे चलता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अगर हमारा निशाना चूकता तो आपकी जान आफत में पड़ सकती थी। स्वामीजी ने उन्हें बताया कि जब वह व्याख्यान दे रहे थे, तब उन्हें बाहरी वातावरण का ज्ञान ही न था। उनका सारा चित्त वेदांत और ध्यान की उन गहराइयों में डूबा हुआ था। वे चरवाहे उनके प्रति नतमस्तक हो गए।