श्रद्धा और विश्वास ईश्वर अनुग्रह के मार्ग
   Date24-Mar-2020

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धर्मधारा
य दि हम चाहते हैं कि आत्मीक आनंद, ईश्वरीय आनंद में हमारे रोम-रोम पुलकित हों, तो हमें अपने आराध्य में अपने इष्ट में अपने गुरु में- अपार श्रद्धा, अटूट श्रद्धा होनी चाहिए, अपार प्रेम होना चाहिए, क्योंकि श्रद्धा और प्रेम के बिना जो भक्ति है, उसका कोई लाभ नहीं, कोई अर्थ नहीं। इस संबंध में संत कबीर ने ठीक ही कहा है - प्रेम बिना जो भक्ति है,
सो निज दंभ विचार।
जिस भक्ति में प्रेम नहीं, श्रद्धा नहीं, विश्वास नहीं, वह भक्ति- भक्ति नहीं, वह जो दिखावा मात्र है। ऐसी भक्ति वैसे ही व्यर्थ है, जैसे मात्र पेट भरने के लिए उत्तम जन्म गँवाना है। दूसरी ओर श्रद्धा, विश्वास के साथ-साथ हमारी भक्ति निष्काम होनी चाहिए, तभी हमारी साधना शिखर तक पहुँचती है और हमें आत्मलाभ व परमात्मलाभ प्रदान करती है, तभी हमें आत्मज्ञान प्राप्त होता है। देखा-देखी भक्ति करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, क्योंकि हमारी भक्ति को परखने के लिए सर्वज्ञ, सर्वव्यापी परमेश्वर सर्वत्र विराजमान जो है। उसकी नजर से भला हम क्या छिपा सकते हैं? क्योंकि वह तो अंतर्यामी है। हमारे जीवन में कठिन से कठिन परिस्थितियां आ जाएं, फिर भी हमें अपनी साधना तथा अपनी भक्ति नहीं छोडऩी चाहिए, क्योंकि ये परिस्थितियां आती हैं, हमारी साधना, भक्ति की परीक्षा लेने। जब तक सांसारिक भोगों की कामना रखकर भक्ति की जाती है, तब तक मुक्ति पाने के लिए वह उतनी फलवती नहीं होती, क्योंकि हमारे आत्मस्वरूप, चेतनस्वरूप देव जो कामनारहित है, वे जगत कामना करने से कैसे मिल सकते हैं। अतएव जगत कामनाओं से दु:खी (विरक्त) होकर गुरु की भक्ति करो, ईश्वर की भक्ति करो, फिर मुक्ति के सभी कार्य सिद्ध हो जाएंगे। विरक्त ईश्वरमुक्त कर्म या विषय के किसी जाल में नहीं फँसता। देखा-देखी भक्ति का सच्चा रंग कभी नहीं चढ़ सकता, क्योंकि विपत्ति पडऩे पर ऐसा व्यक्ति भक्ति को उसी प्रकार छोड़ देता है, जैसे सर्प केंचुली को त्याग देता है।