स्वार्थी महत्वाकांक्षा कराती है दलबदल...
   Date22-Mar-2020

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
कि सी भी संस्था, संगठन, समाज या फिर राज्य या देश को चलाने के लिए विधिवत रूप से जनता द्वारा सर्वमान्य वह व्यवस्था जो नीति निर्माण से लेकर नियम-कानून को बनाने और उसे अमल में लाने के लिए जवाबदेह है... उसे हम राजनीतिक रूप से विधायिका द्वारा संचालित सरकार के रूप में देखते हैं... जब यह सरकार किन्हीं कारणों से अस्थिरता के भंवर में घिर जाए, तब इससे जुड़े सभी पक्ष या पहलू अथवा जिन्हें इसके द्वारा समय-समय पर दिशा-निर्देशित अथवा संचालित किया जाता है... वे सभी अंग अस्थिरता के कारण अपने को पंगु स्थिति में प्राप्त हो जाते हैं... जिसका दुष्परिणाम यह होता है कि न केवल निर्णय के स्तर पर, बल्कि कार्यरत शक्ति एवं विकास कार्यों से लेकर प्रत्येक पक्ष में वह जड़रूपी अकर्मण्यता आ जाती है, जो प्रत्येक कार्य को अवरुद्ध करती नजर आती है... कुछ ऐसी ही स्थिति जब एक चुनी हुई सरकार की किसी राज्य में हो जाए, तब वहां का प्रशासन एवं पूरा क्रियाशील तंत्र किस तरह से हताश-निराश या कहें असमंजस की स्थिति में आ खड़ा होता है, यह हमने मध्यप्रदेश में करीब 15-20 दिनों से चल रहे उस राजनीतिक अस्थिरता के संकट को देखा-समझा है... जिसमें चुना हुआ मुखिया भी यह तय नहीं कर पाता है कि कल या परसो वे सत्ता में रहेंगे या नहीं... इसी अदृश्य भय के कारण अनेक बार अस्थिर सरकार, उसके मंत्री-विधायक और यहां तक कि नेतृत्वकर्ता (मुख्यमंत्री) आनन-फानन में ऐसे निर्णय भी ले लेते हैं, जिन्हें सिर्फ सत्ता हाथ से फिसलने के भय के रूप में देखा जाता है... ऐसा ही कुछ निर्णय व आभास इन पंद्रह दिनों में कांग्रेस की कमल नाथ सरकार के फैसलों से होता है...
मध्यप्रदेश के इस सियासी संकट के संदर्भ में अगर संवैधानिक व्यवस्था के पहलू पर गौर फरमाएं तो यह स्पष्ट है कि जब एक चुनी हुई सरकार का करीब एक चौथाई हिस्सा सरकार के खिलाफ मैदान में खड़ा हो जाए, तब उसे अपनी संख्या बल सहित बहुमत होने का प्रमाण देना चाहिए... या तो इसका तरीका यह हो सकता है कि वे लिखित में राज्यपाल को इसके लिए आश्वस्त करे, उसकी परेड करवाए या फिर जरूरत पडऩे पर विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया जाए या फिर जब राज्यपाल बहुमत साबित करने का निर्देश दे तो उसे हाथोंहाथ शिरोधार्य करे... मध्यप्रदेश में कमल नाथ सरकार से जब 22 विधायकों ने मुँह मोड़, नाता तोड़ लिया, तब सरकार अल्पमत में स्वयमेव आ गई थी... ऐसे में इतने दिनों तक हमारे पास बहुमत है, बहुमत है का दावा अलग-अलग मंचों पर ठोंकना और उसे सिद्ध किए बिना मजबूरी में इस्तीफा देना सही मायने में संवैधानिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने जैसा ही था...
इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक अच्छी चलती हुई सरकार में जब विधायकों का एक बड़ा धड़ा मंत्री पद पाने या अनेक तरह की अनुचित मांगों की महत्वाकांक्षी सत्ता स्वार्थ की पूर्ति के एवज में पाला बदलने लगे, तब समझ में यह आ जाना चाहिए कि उन्हें जनता ने जिस विश्वास के साथ चुना था, वे उस पर खरे नहीं हैं... यह स्थिति देशभर के राज्यों और विधानसभाओं में रह-रहकर घटित हो चुकी है... जब एक बड़ी संख्या में विधायक सत्तासीन सरकार के खिलाफ जाकर दूसरे पाले में बैठ जाते हैं... बदले में उन्हें या तो मंत्री पद या फिर खरीद-फरोख्त के जरिये मोटी रकम मिलती है... या फिर विधानसभा और राजनीतिक दलों के नियम बिन्दुओं (व्हिप) का पालन न करने के कारण उनकी विधायिकी भी चली जाती है अथवा चुनाव लडऩे पर भी प्रतिबंध लग जाता है... ये सभी स्थितियां दलबदल कानून के अपराध के रूप में देखी जाती है, लेकिन इस स्थिति में सुधार के बजाय निरंतर बिगाड़ आता जा रहा है... परिणाम सामने है कि मध्यप्रदेश के ताजा सियासी संकट में भले ही कांग्रेस के 22 बागी विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति समर्पित भाव दिखाया हो, लेकिन उनकी विधायिकी ने उस संवैधानिक संकट की याद ताजा कर दी, जो सालभर पहले कर्नाटक में हुआ था... आखिर बार-बार के इस तरह के चुनाव और जनता से वादाखिलाफी की रोकथाम को व्यापक रूप से कठोर दलबदल कानून लागू किए बिना कैसे संभव है..?
जनता-जनार्दन की भूमिका पर भी ऐसे मामले में सवाल उठते हैं, क्योंकि वह विधानसभा में कम से कम सभी को चेहरा देखकर नहीं, बल्कि पार्टी और उसके घोषणा-पत्र यानी वादों के आधार पर मतदान करती है... कांग्रेस से बागी हुए विधायकों का यह तर्क कि वे सिर्फ सिंधिया के नाम पर चुनाव जीते... इसलिए उनके साथ जा रहे हैं... यह संवैधानिक दायरे में स्वीकार तर्क नहीं है... क्योंकि अगर सिंधिया की लोकप्रियता इतनी चरम पर थी तो वे स्वयं अपने गृह क्षेत्र में लोस चुनाव क्यों हारे..? इसलिए जब कोई विधायक पार्टी से दगाबाजी करता है तो इसका खामियाजा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ता है... यह बात जनता को भविष्य में मतदान करते समय ध्यान रखनी होगी कि अल्पमत सरकार के क्या-क्या खतरे रहते हैं..?
कमल नाथ सरकार के अल्प समय में राजनीतिक अवसान के लिए कांग्रेस पार्टी के वे नेता जिम्मेदार हैं, जिन्होंने सत्ता को सिर्फ अपने स्वार्थ की सिद्धि मान लिया... भले ही कमल नाथ एक दूरदर्शी नजरिये के साथ जनहित में बड़े निर्णय ले रहे थे, लेकिन उन पर बार-बार इस बात के लगातार आरोप लगते रहे कि वे वन मैन आर्मी की भांति सारे निर्णय अपने स्तर पर करते हैं... प्रशासनिक व्यवस्था के भरोसे वे विधायकों, मंत्रियों को किनारे किए हुए हैं... इसके कारण जो धड़े कांग्रेस में अपने-अपने विधायकों की संख्या लेकर बैठे थे, वे अपने अहम् भाव को बार-बार सार्वजनिक रूप से घोषित करते रहे... यह घोषणा सही मायने में कमल नाथ को जगाने की थी... जिसमें पहली पंक्ति में दिग्विजय सिंह खड़े थे, जो हर हाल में यह अहसास कराने का मौका नहीं चूक रहे थे कि कमल नाथ की सरकार को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से वे स्वयं चला रहे हैं... यह पहली बार मप्र की सियासत में हुआ कि दिग्विजय ने जिलों के प्रभारी मंत्रियों के ऊपर अपने बेटे मंत्री जयवद्र्धन सिंह को संभाग प्रभारी मंत्री के रूप में बैठाने का खेल खेला... कभी मंत्री-विधायकों की बैठक लेने का पत्र लिखा, तो कभी मुख्यमंत्री को ही कठघरे में खड़े करने वाले बयान दिए... कमल नाथ ने कभी भी दिग्विजय की इन तिकड़मों का जोरदार तरीकों से प्रतिकार नहीं किया... कुछ ऐसा ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कमल नाथ सरकार के खिलाफ अभियान चलाए रखा... कभी दस जनपथ पर दबाव बनाकर तो कभी अपने पास विधायकों की बड़ी संख्या होना का अहम् दिखाकर... कमल नाथ सिंधिया समर्थकों को न तो साध पाए और न ही सिंधिया को संतुष्ट कर पाए... बस इन महत्वाकांक्षी नेताओं का सत्ता स्वार्थ व अहम् कमल नाथ पर भारी पड़ा...
मध्यप्रदेश के इस बड़े उलटफेर, जिसमें कि कमल नाथ की कांग्रेस सरकार सत्ता से बेदखल हो चुकी है और उसकी जगह भाजपा जगह लेने वाली है... लेकिन यहां पर स्थिति जोड़तोड़ के गुणा-भाग के आईने में देखें तो भाजपा के लिए भी कमल नाथ की भांति शेष समयावधि में तलवार की धार पर चलने जैसा ही होगा... इसलिए यहां पर भी जो असमंजस एवं सरकार आई-गई का खौफ कमल नाथ को इन 12-15 महीनों में सताता रहा, वही स्थिति भाजपा को भी कम से कम इन 24 विधानसभा सीटों का उपचुनाव होने और कम से कम भाजपा के पक्ष में आधी सीटें न आ जाए, तब तक तो बरकरार रहना है... इसलिए मप्र से राजनीतिक अस्थिरता के बादल छंटे नहीं है, यह रह रहकर डेरा डालते रहेंगे... क्योंकि महत्वाकांक्षी सत्ता का स्वार्थ कब किसे दलबदल की कगार पर लाकर खड़ा कर दे..? यह हमने मध्यप्रदेश में कमल नाथ सरकार के संदर्भ में बहुत थोड़े समय में देख लिया है...