निर्भया और न्याय का संघर्ष...
   Date20-Mar-2020

vishesh lekh_1  
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 की रात को जिन 6 दरिंदों ने चलती बस में पैरामेडिकल छात्रा 'निर्भयाÓ के साथ वहशीपन की पराकाष्ठा को पार किया था, वह पूरा घटनाक्रम आज भी जब किसी के जेहन में आता है, उसे झकझोर देता है, हर किसी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जब उस वीभत्स घटनाक्रम का अपने दिलोंदिमाग में कोई व्यक्ति अंदाजाभर लगाता है या फिर उस घटनाक्रम के कालखंड की चित्कार को अपने कानों में कोई गूंजता हुआ महसूस करता है, तो बरबस हर कोई यह कहने में गुरेज नहीं करेगा कि इन सभी दरिंदों को दरिंदगी की हद से भी बढ़कर जो सजा मिलनी चाहिए, वह हर हाल में दी जानी चाहिए... क्योंकि इनका कृत्य सिर्फ निर्भया की अस्मत से खिलवाड़भर नहीं था, बल्कि उसको तिल-तिलकर मारने वाली वह दरिंदगी भी इसमें शामिल है, जिसकी हम कम से कम इंसान के रूप में किसी के साथ भी ऐसी पराकाष्ठा की कल्पना सपने में भी नहीं कर सकते... यानी अपने दुश्मन को भी ऐसी दरिंदगी का शिकार न पड़े, इसका विचार नहीं कर सकते, तब 6-6 दरिंदों ने जो निर्भया के साथ किया, उसके लिए उन्हें किसी भी तरह की माफी का अधिकार नहीं और वह मिला भी नहीं... जिसमें से एक दरिंदे ने तो स्वयं फांसी लगाकर अपने पापों का प्रायश्चित कर लिया और एक नाबालिग की ढाल बनाकर अट्ठाहास करने के लिए खुला छोड़ दिया गया है... लेकिन जो चार दरिंदों अक्षय, विनय, पवन और मुकेश को शुक्रवार 20 मार्च को 5 बजे फांसी देने का मार्ग प्रशस्त हुआ, यह इस तरह के घटनाक्रमों की रोकथाम के लिए मील का पत्थर साबित होगा... क्योंकि इन दरिंदों की फांसी टालने के लिए जिस तरह का डाल-डाल पात-पात वाला खेल खेला गया, वह न्याय व्यवस्था को भी ठेंगा बताने और कानून के रखवालों के मुँह चिढ़ाने जैसा था... क्योंकि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक में जब दरिंदों ने अपनी फांसी को रुकवाने में शर्म महसूस नहीं की, तब विचार किया जा सकता है कि ये दरिंदे फांसी के फंदे से अगर बच जाते तो उसका देश में इन्हीं के चाल-चरित्र वाले असंख्य हिंसक दरिंदे भेडिय़ों की क्या बांछें नहीं खिल जाती..? इसलिए इनके प्राण-पखेरू उडऩा न केवल 'निर्भयाÓ के साथ न्याय जैसा है, बल्कि भविष्य में इस तरह के दरिंदगी की पुनरावृत्ति को रोकने में भी यह सजा किसी उपचार की भांति काम आएगी... क्योंकि इन दरिंदों को फांसी के फंदों तक पहुंचाने में निर्भया के माता-पिता ने जो धैर्य, साहस दिखाया और करीब आठ सालों तक न्याय की प्रतिक्षा में अपने को तिल-तिल जलाया है, वह निर्भया के उस संघर्ष से भी बड़ा है.., जिसमें कोई माता-पिता अपनी बेटी के साथ हुए भयावह दुराचार व दरिंदगी के लिए भारत की न्याय व्यवस्था से न्याय पाने के लिए टकटकी लगाए इतने वर्षों तक संघर्षरत रहा... उम्मीद की जानी चाहिए कि जब भारतीय शुक्रवार का सूर्योदय देखेंगे, तब तक चारों दरिंदों के प्राण-पखेरू उड़ जाएंगे... यही वास्तविक संघर्ष है, जिसे निर्भया के लिए न्याय के रूप में याद किया जाएगा...
दृष्टिकोण
कोरोना, संबोधन और कयास...
नोवल कोरोना वायस (कोविड-19) का प्रकोप लगभग पूरे विश्व को अपने शिकंजे में ले चुका है... 10 हजार लोगों की इस संक्रमण में जान जा चुकी है... भारत में ही पौने दो सौ से अधिक संक्रमित लोगों की पुष्टि हो चुकी है और मृतकों की संख्या गुरुवार को 4 हो चुकी है... ऐसे में इस संक्रामक रोग की भयावहता और लोगों में लगातार घर करते भय का विचार न केवल स्वास्थ्य विभाग, बल्कि प्रशासन से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व को भी हो चुका है, तभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना वायरस के खिलाफ भारत की इस जंग में देशवासियों को सतर्कता, जागरुकता और एकजुटता का जो संदेश समय-समय पर बयानों/भाषणों और ट्विटर के जरिए दिया, उसी की अगली कड़ी में बुधवार को जब यह समाचार सामने आया कि गुरुवार रात्रि 8 बजे प्रधानमंत्री कोरोना के इस संकट की घड़ी में देशवासियों को संबोधित करेंगे, तब प्रधानमंत्री के इस राष्ट्र संबोधन के संदर्भ में भांति-भांति के कयास लगाए जाने लगे... पक्ष-विपक्ष जहां अपने-अपने हिसाब से इस संबोधन के संबंध में तर्क-वितर्क करने लगे, कोई कहने लगा कि प्रधानमंत्री इस संबोधन के जरिए पूरे देश में लॉकडाउन (तालाबंदी) करेंगे तो सरकार की तरफ से इस तरह की किसी भी कयास व अपवाह का खंडन किया गया... बात सही भी है, यह संकट की घड़ी में और भयभीत जनता में विपक्ष द्वारा जबरिया भय पैदा करने वाला कुतर्क था.., क्योंकि प्रधानमंत्री तो राष्ट्रवासियों को इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में सजग, सतर्क और जागरूक होने के साथ ही शासन-प्रशासन के प्रयासों में सहभागी होने वाले प्रेरणादायी राष्ट्र संबोधन का संकेत कर चुके हैं...