गृहस्थाश्रम की महत्ता
   Date20-Mar-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
ए क बार महर्षि अत्रि अपने आश्रम से चलकर एक गाँव में पहुँचे। आगे का मार्ग बहुत बीहड़ और हिंसक जीव-जंतुओं से भरा हुआ था, सो वे रात को उसी गाँव में एक सद्गृहस्थ के घर टिक गए। गृहस्थ ने उन्हें ब्रह्मचारी वेष में देखकर उनकी आवभगत की और भोजन के लिए आमंत्रित किया। अत्रि ने जब समझ लिया कि इस परिवार के सभी सदस्य ब्रह्मसंध्या का पालन करते हैं, किसी में कोई दोष-दुर्गुण नहीं है तो उन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर लिया। भोजनोपरांत अत्रि ने गृहस्थ को प्रणाम कर प्रार्थना की-'देहि मे सुखदां कन्याम् -अपनी कन्या मुझे दीजिए, जिससे मैं अपना घर बसा सकूँ। उन दिनों वर ही सुकन्या ढूँढऩे जाते थे। कन्याओं को वर तलाश नहीं करने पड़ते थे। उन दिनों नर से नारी की गरिमा अधिक थी। गृहस्थ ने अपनी पत्नी से परामर्श किया। अत्रि के वंश की श्रेष्ठता पूछी और उन्होंने पवित्र अग्नि की साक्षी में अपनी कन्या का संबंध अत्रि के साथ कर दिया। अत्रि के पास तो कुछ था नहीं, इसलिए गृहस्थ संचालन के लिए आरंभिक सहयोग के रूप में अन्न, वस्त्र, बिस्तर, थोड़ा धन और गाय भी दिए। छोटी-सी, किंतु सब आवश्यक वस्तुओं से पूर्ण गृहस्थी लेकर अत्रि अपने घर पधारे और सुखपूर्वक रहने लगे। इन्हीं अत्रि और अनुसूया के द्वारा दत्तात्रेय जैसी तेजस्वी संतान को जन्म मिला। भगवान को भी एक दिन इनके सामने झुकना पड़ा था। वस्तुत: यह कहना गलत है कि गृहस्थाश्रम साधना में किसी तरह बाधक है। प्राचीनकाल में बहुसंख्य ऋषि सपत्नीक रहकर गुरुकुल में वास कर साधना करते, शिक्षण, शोध-प्रक्रिया चलाते थे।