जीवन की समग्रता का ज्ञान अध्यात्म
   Date20-Mar-2020

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धर्मधारा
ज ब जीवन एकतरफे भौतिक विकास की चकाचौंध में उलझा हो तो इसे अध्यात्म ही संतुलन देता है, पूर्णता देता है अन्यथा एकतरफे विकास से भौतिकता के शिखर तक तो पहुँचा जा सकता है, लेकिन इसे कैसे संभालें, इसका सही नियोजन कैसे हो, यह दृढ़ता एवं सूझ अध्यात्म ही देता है। बिना अध्यात्म के जीवन अचेतन मन के अंधेरे में खो जाता है, इसके कीचड़ में ही लथपथ होकर जीवन के अर्थ की तलाश करता है। अध्यात्म अचेतन के पार सुपरचेतन अर्थात जीवन की दिव्य संभावनाओं से व्यक्ति का परिचय कराता है व उस ओर बढऩे का मार्ग प्रशस्त करता है और जीवन को समग्रता से समझने व जीने का आधार देता है। व्यक्तित्व की समग्र समझ के साथ जीवन की समग्र समझ हमें अध्यात्म ही देता है; क्योंकि जीवन के तार इस जन्म तक सीमित नहीं होते। जीवन अनंत प्रवाह का नाम है, जिसका एक अध्याय इस जीवन के रूप में दृश्यमान है। अध्यात्म जन्म-जन्मांतर के कर्म जखीरे के साथ बढ़ रही जीवनयात्रा की समझ देता है और अनंत धैर्य के साथ इसके पार निकलने की राह सुझाता है। अध्यात्म व्यक्ति को स्वत:स्फूर्त रूप में नैतिक बनाता है। यहाँ नैतिकता ओढ़ी हुई नहीं होती, बल्कि अपने विवेक के आधार पर तय होती है। किसी भी गुण के प्रति यहाँ कट्टरता का भाव नहीं रहता, बल्कि ऐसे में व्यक्ति परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को समायोजित करता हुआ अंतर्निहित मानवीय एवं दिव्य संभावनाओं को अभिव्यक्त एवं विकसित करता है। अध्यात्म व्यक्ति को धार्मिक हठवादिता व कट्टरवादिता से बचाता है। व्यक्ति को धर्म के मर्म की समझ देकर, उसे सच्चा धार्मिक बनाता है। कर्मकांडों के महत्व को वह समझता है व इनकी सीमाओं को भी। इस तरह अध्यात्म-धर्म एवं नैतिकता को सम्यक रूप में अपनाता है व व्यक्ति को एक उपयोगी नागरिक बनाकर अपने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करना सिखाता है।