सीएए विरोधी आंदोलन देश के खिलाफ साजिश
   Date08-Feb-2020

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अवधेश कुमार
नागरिकता संशोधन कानून पर भ्रम और गलतफहमी पैदा कर भड़काने वाली पार्टियों, संगठनों, सक्रियतावादियों के लिए लेने के देने की नौबत आ रही है। उन्होंने जिस शाहीन बाग को मोदी के गले की हड्डी बनाने की रणनीति बनाई वह अब उन्हीं के लिए समस्या बन गई है। एक पक्ष 26 जनवरी को शाहीन बाग धरना का अंत करना चाहता था लेकिन उस पर अतिवादी और नियंत्रणविहीन तत्व इतने हाबी हो गए कि उन्होंने यह भनक लगते ही 29 जनवरी को भारत बंद का आह्वान कर दिया। हालांकि भारत बंद तो हुआ नहीं, लेकिन इससे शाहीन बाग को अंतहीन कथा बनाने में अतिवादियों को सफलता मिल गई। 26 जनवरी को खत्म करने की जगह भारी भीड़ जुटा दी गई। जब एक बार आप इस तरह झूठ और फरेब से लोगों को डरा कर, उकसाकर घर से निकाल देते हैं, परोक्ष रूप से पूरे अभियान का वित्त पोषण करते हैं, उनके लिए सारी सुविधायें जुटातें हैं, वहां जाकर भाषण दे आते हैं कि जब तक सरकार झुके नही ंतब तक बैठे रहो तो फिर एक समय आता है जब सूत्र आपके हाथों से निकल जाता है। उसमें भी जब भय यह पैदा किया गया हो कि अगर आपने हार मान लिया तो फिर एनआरसी द्वारा आपकी नागरिकता छीन ली जाएगी। जेएनयू, जेमेई, एएमयू सहित अन्य जगहों के अतिवादी समूहों ने इस आंदोलन को ऐसी स्थिति में ला दिया है कि कांग्रेस, आम आदमी पार्टी आदि ताली पीटने वाले बाहर से कुछ भी कहें अंदर से उनकी धड़कनें बढ़ गईं हैं। वे करें तो क्या करें।
सबसे बड़ा विस्फोट प्रवर्तन निदेशालय या ईडी द्वारा पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के खातों की जांच से आई जानकारियां हैं। ईडी ने गृहमंत्रालय को सौंपी रिपोर्ट मेें माना है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान पीएफआई और उसके सहयोगी संगठनों के बैंक खातों में लेन-देन का विस्तृत ब्योरा उसकी भूमिका को संदिग्ध बना देता है। इस दौरान पीएफआई के खातों में बड़ी मात्रा में रकम जमा की गई और निकाली गई, जो संगठन के पहले की जमा और निकासी के तरीके से बिल्कुल अलग थे। वैसे ईडी पहले से ही पीएफआइ के खिलाफ मनी लांडिंग की जांच कर रहा है। इस नागरिकता संशोधन कानून के विरोध हिंसा, आगजनी, उपद्रव के दौरान उसके व सहयोगी संगठनों के 73 बैंक खातों में 120 करोड़ रुपये जमा कराने के प्रमाण हैं और एक-दो दिन के भीतर ही उसमें से अधिकांश रकम को निकाल भी लिया गया। पीएफआई कुछ भी कहे लेकिन इसका जवाब तो उसे देना होगा कि ऐसा क्यों हुआ? हिंसक प्रदर्शनों के दौरान बैंक खातों से तो एक दिन में कई-कई बार पैसे निकाले गए। उदाहरण के लिए 12 दिसंबर को एक खाते से कुल 90 बार निकासी की गई थी। पीएफआइ के नेहरू प्लेस (दिल्ली) स्थित खाते के साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के बहराइच, बिजनौर, हापुड़, शामली, डासना जैसी जगहों के खातों में भारी मात्र में बार-बार नकदी जमा की गई। इसकी पड़ताल हो रही है। हिंसक प्रदर्शन के दिन या उससे एक दिन पहले इतनी निकासी शांति और सद्भावना स्थापित करने के लिए तो नहीं हो सकती। इसके आधार पर ईडी का यह निष्कर्ष तत्काल सच लगता है कि छह जनवरी तक सीएए के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों के लिए पीएफआई ने धन की व्यवस्था की थी। छह जनवरी के बाद की जांच अभी जारी है। वस्तुत: नागरिकता कानून विरोधी हिंसा की साजिश और उसे अमल में लाने में पीएफआई की भूमिका के बारे में कई राज्यों की पुलिस ने केन्द्र सरकार को रिपोर्ट दिया है। अब इस लेनदेन के बाद पीएफआई की समस्या तो बढ़ी है लेकिन उसके साथ उनकी भी बढ़ी है जो प्रत्यक्ष तौर पर पीएफआई से जुड़े नहीं थे लेकिन उनके खातों से पैसे गए या खातों में आए। नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी 4 दिसंबर को संसद में पेश हुआ, और इसके बाद से पीएफआई से जुड़े खातों में करोड़ों की नकदी आना और निकालना शुरू हो गया। जांच एजेंसी की जानकारी ने यह बात सामने आई है कि 4 दिसंबर 2019 से 6 जनवरी 2020 तक 15 बैंक खातों में 1.40 करोड़ रुपये जमा किए गए थे जिसमें 10 खाते पीएफआई के और पांच खाते रेहब इंडिया फाउंडेशन के थे। जमा करने के बाद 2000 से लेकर 5000 तक की राशि बार-बार निकाली गई थी। ज्यादातर जमा और निकासी धरना प्रदर्शन के दिन या उस वक्त के आसपास होती थी। जिसे तरीके का मनी ट्रेल हुआ है उससे यह साबित होता है कि विरोध प्रदर्शन की लिए ही पैसा जुटाया गया और खर्च किया गया। इनमें कुछ वकीलों के खातों में भी धन स्थानांतरण का प्रमाण है। जिसमें कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंह आदि शामिल हैं। ये सब अपनी तरह से तर्क दे रहे हैं। कपिल सिब्बल बता रहे हैं कि उनके खाते में जो धन आए उसकी तिथि आंदोलन आरंभ होने के पहले की है। अब जो भी तर्क दीजिए, इस संगठन से आपका संबंध भले वकील के नाते ही रहा है यह सामने है। देश तो यह जानना चाहेगा कि आपका संबंध ऐसे संदिग्ध संगठनों से क्यों होता है? इंदिरा जय सिंह नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ हर ऐसे अभियान की भागीदार होतीं हैं। मानवाधिकार के नाम पर आग उगलने तथा उच्चतम न्यायालय का इस्तेमाल कर अपना दबदबा और भय कायम रखने वाली इंदिरा जयसिंह को भी संभव है ईडी की पूछताछ प्रक्रिया से गुजरना पड़े तो उंट के पहाड़ के नीचे आना पड़ेगा। ऐसे अनेक लोग इसके घेरे में आएंगे जिन्होंने सोचा था कि नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ मुसलमानों को भड़काकर अपना हित साधा जा सकता है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इसमें प्रमुख हैं। सबसे ज्यादा शाहीन बाग के मंच पर कांग्रेस के नेता गए। आम आदमी पार्टी ने पूरा समर्थन दिया। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बयान दिया कि हम शाहीन बाग के साथ हैं। अब ईडी ने कलई खोल दी कि पूरी साजिश रचकर पीएफआई ने देश भर में विरोध की आग लगाई। जहां जितना संभव हुआ हिंसा किया और कराया, जहां संभव नहीं हुआ वहां उग्र प्रदर्शन कराया तो फिर इनको जवाब तो देना होगा कि क्या आप इस साजिश के भाग थे? अगर नही ंतो क्या आप काठ के उल्लू थे जो मोदी सरकार से खुन्नस निकालने या अपनी राजनीति साधने या दिल्ली चुनाव में लाभ उठाने के गंदे इरादे से एक जेहादी और आतंकवादी संगठन के सहयोगी बन गए तथा देश में आग लगा दिया? शाहीन बाग के साथ आप क्यों थे अगर इसके पीछे भी पीएफआई ही था? शाहीन बाग का वित्त पोषण कहां से हो रहा है? ये सवाल किसी को नावाजिब लगतें हैं तो उसे अपने आपसे पूछना चाहिए कि विपक्ष के किसी नेता ने हिंसा की न एक बार आलोचना की न ही उसे रोकने की अपील। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वीडियो बयान जारी कर आंदोलन का महिमामंडन किया एवं उसे अपना समर्थन घोषित किया। राहुल गांधी एवं प्रियंका बाड्रा ने भी ट्वीटों एवं बयानों के माध्यम से यही किया। आम आदमी पार्टी के नेता अमानतुल्ला खान प्रदर्शन आरंभ होने के पहले से सभाएं कर लोगों को भड़काते और झूठ बोलते देखे गए कि मोदी रह गया तो एक दिन तुम्हारा बुरका पहनना बंद कर देगा, मस्जिदों में नमाज नहीं होने देगा आदि आदि। यह सब पीएफआई की योजना के अनुकूल थी। इन सबका लाभ उठाकर पीएफआई ने पूरे देश में आग लगाने की साजिश रच दी। यह जान लीजिए, पीएफआई का मुख्यालय शाहीन बाग ही है, लेकिन धरना के कारण पुलिस के लिए वहां जाकर जांच करना कठिन है। बहरहाल, अब जब देश के सामने साफ हो गया है कि यह पूरा आंदोलन साजिश का अंग था और जिस शाहीन बाग को मोदी सरकार ही नहीं देश बचाने और संविधान बचाने के आंदोलन का प्रतीक बनाया गया है वह उसी का अंग है तो जाहिर है, इसका बहुस्तरीय खामियाजा उन सबको भुगतना पड़ेगा जो इसके भाग हैं।
पीएफआई कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होगा। जो निजी तौर पर हिंसा में शामिल हए वे कानून के शिकंजे में आ रहे हैं। वो बड़े नाम जिनका चेहरा लेद-देना में उजागर हुआ वे भी सहभागी बनेंगे। सबसे बढ़कर कांग्रेस, आप और ऐसी पार्टियों से जनता को तो पूछना ही चाहिए कि महाराज, आपने ऐस क्यों किया? विरोध की राजनीति की एक सीमा होती है। ये पार्टियां तथा एक्टिविस्ट आदि मोदी विरोध के नाम पर देश विरोध तक चले गए। शाहीन बाग, जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है उसे इन लोगों ने बनाए रखा और उसके लिए जितना संभव था किया। जो है नहीं आपने उस पर विरोध भड़काकर देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने का खेल खेल दिया। आज की हालत में शाहीन बाग इनके नियंत्रण से निकल चुका है। अब वह एक ऐसी गुस्सैल भीड़ में परिणत है जिसका सामने न कोई नेता है, न प्रबंधक जिससे बात भी की जाए। वहां पत्रकार पिट रहे हैं, जो भी असहमति जताए वह शाब्दिक या शारीरिक हिंसा का शिकार हो रहा है, टीवी चैनल वालों को कहा जाता है कि पूरा लाइव दिखाओ नहीं तो जाओ यहां से। तो जो किया उसका परिणाम भुगतिए और देश को भुगतेगा ही।